किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए कोई चुनावी मुद्दा नहीं है लाइलाज इंसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार) - japani fever encephalitis is not topic of campain in UP





महाराजगंज: छटे चरण में पूर्वांचल के 9 जिलों की 49 सीटों पर मतदान होना है. सरकारी आकड़े के मुताबिक  पूर्वांचल में हर साल इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से लगभग 600 मौतें होती हैं पर यह मुद्दा किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. इंसेफेलाइटिस अगर किसी बच्चे को हो जाए तो या तो बच्चे की मौत हो जाती है और या फिर पीड़ित ज़िंदगी भर के लिए विकलांग हो जाता है. हम ऐसे ही एक बच्चे से मिलने गोरखपुर से 54 किलोमीटर दूर महाराजगंज गए. बच्चे का नाम राजन है. 17 साल का राजन पिछले 13 साल से बिस्तर पर है. 2004 में उन्हें इंसेफेलाइटिस हुआ था. तब से वह कोमा में है. राजन के सिरहाने बैठी उनकी मां रोज़ अपने बेटे की हालत देखकर रोती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक  राजन अब कभी ठीक नहीं हो सकते. राजन की मां मालती हमें बतातीं हैं कि "राजन ना तो चल सकता है न बोल सकता है. किसी भी अंग में कोई हलचल नहीं होती. इंसेफेलाइटिस पूर्वांचल की बड़ी समस्याओं में से एक है.

 पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस का पहला मामला 1977 में सामने आया. इंसेफेलाइटिस का कोई सफ़ल इलाज नहीं है. 2014 में इंसेफेलाइटिस पर राष्ट्रीय प्रोग्राम बना, लेकिन अब तक लागू नहीं हुआ. सरकारी आकड़ों के मुताबिक हर साल 600 मौतें होता है. बच्चे सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं

पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक सभी प्रचार में जुटे हैं. लेकिन इस बीमारी को किसी दल या नेता ने प्रमुखता से पेश नहीं किया.

हर साल सैकड़ों बच्चों को मौत की नींद सुला देने वाले इंसेफेलाइटिस की समस्या का निवारण किसी दल के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है इसलिए गोरखपुर के डॉ आरएन सिंह ने लोगों के साथ मिलकर इंसेफेलाइटिस को ख़त्म करने के लिए जनता का घोषणा पत्र तैयार किया है. वह प्रचार करने वाले हर नेता को अपना बनाया हुआ घोषणा पत्र बांट रहे हैं. इंसेफेलाइटिस पूर्वांचल में धान के खेतों में होने वाले एक मच्छर से होता है. ज्यादातक मामले अप्रैल से लेकर जुलाई तक सामने आते हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि नेताओं के पास कब्रिस्तान से लेकर श्मशान और बिजली तक के मुद्दे हैं. अगर ये राजनीति करने वाले ज़रा सी मेहनत कर समय से बच्चों को इंजेक्शन लगवा दें तो न जाने कितने ही बच्चों की ज़िंदगी बच सकती है.


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