भिंडरवाले बनने की राह पर चल रहा था गुरमीत राम रहीम By कुलदीप नैय्यर Gurmeet Ram Rahim was walking on the road to becoming Bhinderwala





 कुलदीप नैय्यर

बाबा गुरमीत राम रहीम भिंडरवाले बनने की राह में था। वह भी यह सुनिश्चित करता था कि कोई उसे चुनौती नहीं दे। लेकिन वह एक कागजी शेर साबित हुआ। जब सीबीआई अदालत के न्यायाधीश जगदीप सिंह ने फैसला सुनाया तो बाबा खुली अदालत में रो पड़ा और न्यायाधीश से कड़ी सजा नहीं देने की भीख मांगने लगा। रिपोर्ट के मुताबिक बाबा के इस तरह औंधे हो जाने से उनके अनुयायी भी हैरान रह गए।


लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि बाबा को मानने वाले बहुत बड़ी सख्ंया में हैं। यह परेशान करने वाली बात नहीं थी कि उसे दो साध्वियों, जो डेरा में उसकी अनुयायी थीं, के बलात्कार के लिए सजा दी जा रही थी। इससे यही पता चलता है कि अनुयायी कितने अनजान और भोले−भाले हो सकते हैं कि वे बाबा की ओर नेतृत्व तथा निर्देश के लिए अंधा हो कर देखते थे? भिंडरवाले भी अनुयायियों की विशाल संख्या के कारण इतना शक्तिशाली हो गया था कि सरकार ने उससे अपनी नजर हटा ली थी जो कुछ वह करता था।

अब जब फैसला आ गया है और बलात्कार के मामले में उसकी सजा की मियाद की घोषणा हो चुकी है, इसकी संभावना है कि डेरा के कई गुप्त रहस्य बाहर आएंगे। सीबीआई कोर्ट पहले से ही बाबा के खिलाफ हत्या के अभियोगों की सुनवाई कर रहा है और जल्द ही उस पर फैसला देगा। डेरा के पुरूष अनुयायियों के बधियाकरण के दूसरे मामले में भी चल रहे हैं। यह सब बाबा की मानसिकता और अधिकारियों की मिलीभगत के संकेत देता है।

भिंडरवाले और राम रहीम में कुछ समानताएं हैं। अगर पहला कांग्रेस पार्टी का पैदा किया हुआ था, दूसरे को हरियाणा में सारी पार्टियों, जिसमें भारतीय जनता पार्टी भी शामिल है, का समर्थन प्राप्त था। भिंडरवाले की तरह बाबा उग्रवादी नहीं होगा, लेकिन उसके उद्देश्य एकदम स्पष्ट थे क्योंकि उसने अपने हितों के लिए राजनीतिक कृपा का इस्तेमाल किया। अन्यथा, वह इतनी संपत्ति जमा नहीं कर पाता और इंग्लैंड तथा अमेरिका समेत दुनिया भर में 132 डेरों का निर्माण नहीं कर पाता।

सन् 1977 में अकाली जनता पार्टी की सरकार आने के बाद पंजाब में अकाली अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे और कांग्रेस का आधार उखाड़ रहे थे। उसी समय संजय गांधी और जैल सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने अकालियों से मुकाबला करने के लिए भिंडरवाले को चुना और उसका समर्थन किया। जब तक इंदिरा गांधी ने यह महसूस किया कि वह भस्मासुर बन चुका है और उसके जाने का वक्त आ गया है, वह इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर अकाल तख्त से निकालने का काम सरासर भारतीय सेना को करना पड़ा।
  
टैंक का इस्तेमाल करने के पहले सेना ने श्रीमती गांधी की अनुमति चाही और मध्य−रात्रि में उन्हें नींद से जगाया। श्रीमती गांधी जून 1984 में गर्भगहृ में सेना भेजकर एक भारी भूल कर गईं। भिंडरवाले को मार दिया गया, लेकिन ब्लूस्टार आपरेशन के खिलाफ गुस्से ने चार महीने बाद उनकी जान ले ली।

इसी के समान, बाबा गुरमीत राम रहीम को भाजपा के नेताओं द्वारा प्रोत्साहित किया गया क्योंकि यह पार्टी की वोट बैंक की राजनीति के लिए सुविधाजनक था। बाबा ने 2014 के लोकसभा चुनावों और उसी साल हरियाणा विधान सभा चुनावों, दोनों में भाजपा का समर्थन किया। उसने पंजाब में कैप्टन अमरिदंर सिंह के खिलाफ भगवा पार्टी को समर्थन दिया, लेकिन यह जीत के लिए काफी नहीं था। यह अफवाह भी थी कि शपथ−ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को छोड़कर उनकी पूरी कैबिनेट सिर झुकाने के लिए बाबा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा में उपस्थित हुई।

लेकिन ऐसा नहीं है कि बाकी पार्टियों की अपराध में भागीदारी नहीं थी। सन् 2009 में डेरा−प्रमुख ने कांग्रेस को समर्थन दिया था जो 2007 में यूपीए सरकार की ओर से बाबा को दी गई जेड प्लस की सुरक्षा का वापसी−उपहार था। यह साफ था कि बाबा इतना शक्तिशाली हो गया था कि उसकी निजी सेना की ओर से चुनौती मिलने पर राज्य उसके सामने एकदम कमजोर हो गया। हरियाणा सरकार ने फैसला आने के पहले धारा 144 लगाने में जानबूझकर घपला किया, हत्यारों को निमंत्रण दे दिया, उन्हें कब्जा करने के लिए कहा।

जाहिर है कि फैसले के पहले ही खुफिया रिपोर्ट थी। और दोनों राज्यों पंजाब और हरियाणा तथा चंडीगढ़ प्रशासन को संकट की चेतावनी दी गई थी क्योंकि डेरा समर्थक पंचकुला में जमा हो रहे थे और बाबा के खिलाफ फैसला आने की स्थिति में ताकत की आजमाइश करने की तैयारी कर रहे थे। हालांकि पंजाब ने अपने हितों की सुरक्षा के सारे जरूरी उपाय किए। लेकिन इस आश्वासन के बावजूद कि वह किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए अच्छी तरह तैयार है, समर्थकों को सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने और लोगों की हत्या करने से रोकने में हरियाणा सरकार विफल रही। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश के बाद ही हरियाणा सरकार की नींद टूटी और उसने आगे नुकसान से बचने के लिए तैयारी की। 

जब इतिहास अपने को दोहराता है तो असलियत में यह कोई सबक नहीं लेने की व्यवस्था का मजाक उड़ाता है। तीस लोगों की जान गंवाने और सार्वजनिक संपत्ति की जिम्मेदारी कौन लेगा? लेकिन भाजपा नेतृत्व ने मुख्यमंत्री खट्टर को छूने के लिए कुछ नहीं किया है क्योंकि उन्हें आरएसएस का समर्थन मिला हुआ है। लेकिन भारत में समस्या यह है कि बाबाओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए? हो सकता है वे वोट−बैंक मुहैया कराते हों लेकिन वे शासन को भरपाई नहीं होने वाला नुकसान पहुंचाते हैं।

लोकतंत्र का तकाजा है कि मतदाता और पार्टी में सीधा सपंर्क हो। बीच में बाबा आ जाते हैं और समानांतर सत्ता बन जाते हैं। जब मतदान पेटी को किसी और ताकत से रोक लिया जाता है, लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। इसलिए लोगों के मत से चलने वाली व्यवस्था में बाबा के लिए कोई स्थान नहीं है। वे मंदिरों में महंत की तरह हैं। उन्हें दखल देने की जितनी इजाजत दी जाएगी, स्वतंत्र अभिव्यक्ति उतनी ही कम होगी। 

धर्म एक निजी मामला है। आसाराम, नित्यानंदों, राम रहीमों से तब तक कोई समस्या नहीं है जब तक वे आध्यात्मिक विचारों पर चलते हैं और उसका उपदेश देते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब वे धोखाधड़ी और अवैध गतिविधियों में शामिल हेाते हैं और बलात्कार और हत्या तक चले जाते हैं। इन सारी चीजों को बुरी शक्ल मिल जाती है जब उन्हें अपने फायदे के लिए राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिल जाता है।

 कुलदीप नैय्यर



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