सच्च मत बोलो - अच्छे दिन आ गए है ! Do not speak right - good days have come!




संजय त्रिपाठी 
पत्रकार गोरी लंकेश की हत्या लोकतंत्र और सच्चाई को दबाने का एक प्रयास है ।  सजग और सचेत लोगों को अब सच्च कहने के वजाय मुंह बंद रखना होगा, अन्यथा जो हाल महाराष्ट्र के नरेंद्र दाभेलकर और गोविंद पनसरे  तथा एमएम कलबुर्गी की हुई है वहीं हाल हमारा - तुम्हारा भी हो सकता है । गौरी लंकेश सच्चाई को दृढता और वेवाकी से रखने वाली निडर पत्रकार थी । वह उन सच्चाईयों को सामने लाने के कार्य को बखूबी अंजाम दे रही थी, जो लोगों को गुमराह करने के लिए झूठे और फरेब के तौर पर प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा था । कट्टर पंथी विचार धारा के लोग उनके लेखनी से तिलमिला जाते थे । गौरतलब है कि मंगलवार की रात आठ बजे बंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर में उनके घर पर ही तीन लोगों ने करीब से कई गोलियां मारीं और उनकी वहीं मौत हो गई। फिलहाल यह पता नहीं चल पाया है कि हत्या के पीछे कौन लोग थे, लेकिन शुरुआती जांच के मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि गौरी लंकेश की हत्या में भी ऐसे ही हथियार का इस्तेमाल किया गया, जिनसे गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की गई थी।

हालांकि कर्नाटक सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की है और इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है, लेकिन अभी भी पुलिस के हाथ खाली है। बताया जा रहा है कि जिन दो लोगों को हिरासत में लिया गया है उनसे फेसबुक पर गौरी के खिलाफ पोस्ट करने के कारण पूछताछ की जा रही है । गौरी हिंदुत्ववादी राजनीति के मुखर आलोचक और ‘ लंकेश पत्रिका ’ की संपादक थी । उन्होंने कई ऐसे संपादकीय लिखे थे, जो आरएसएस और बीजेपी के कई गुमराह करने वाले मामले का चिट्ठा खोलता था । कांग्रेसी सरकार कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा है कि जांच सीबीआई को सौंपने का विकल्प अभी खुला है । उन्होंने कहा कि कलबुर्गी, पनसरे और दाभोलकर की हत्या में भी ऐसे ही हथियार इस्तमाल हुए थे । हालांकि गौरी के घर में लगे एक सीसीटीवी कैमरे में हमले की वारदात कैद हुई है । गाड़ी से उतरकर अंदर जाती गौरी पर हेलमेट पहने एक शख्स ने फायरिंग की थी । गौरी की हत्या के विरोध में बेंगलुरू, दिल्ली सहित देश के कई शहरों में पत्रकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं । प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया ने भी कर्नाटक सरकार से रिपोर्ट मांगी है । अमेरिकी दूतावास ने भी गौरी लंकेश की हत्या को प्रेस की आजादी पर हमला बताते हुए इसकी निंदा की है । 

अभी तक के जांच में जो तथ्य सामने आये हैं, उसके अनुसार गौरी लंकेश की हत्या में कट्टरपंथी तत्वों का हाथ हो सकता है । ज्ञात हो कि गौरी लंकेश के पहले कर्नाटक में ही सांप्रदायिकता और अंधविश्वासों के विरुद्ध जमीनी स्तर पर काम करने की वजह से तर्कवादी एमएम कलबुर्गी की हत्या की जा चुकी है। गौरी लेकेश भी अपने कलम की धार से कर्नाटक में संाप्रदायिक राजनीति और आरएसएस के खिलाफ जोरदार विगुल बजाई । उन्हें कई बार धमकियां भी मिली । लेकिन उन्होंने निर्भिक होकर लिखना और सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलना जारी रखा । उनके आलोचना के घेरे में मुख्य रूप से केंद्र सरकार और बीजेपी की नीतियां थी । जाति-व्यवस्था के अन्याय और स्त्री से जुड़े सवालों सहित वे देश में जिस तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर मुखर और सक्रिय थीं, उससे स्वाभाविक ही उन लोगों या समूहों के रास्ते में बाधा पहुंच रही थी जो केवल समाज को बांटने की राजनीति करते हैं।

आज के समय में ऐसा लगता है कि लोकतंत्र एक समूह के हाथों की कठपुतली या बंदी बन गया है । जो लोग कट्टरवाद और नफरत की राजनीति करने वाले है, उनके सामने आम जनता के बीच सच्चाई लाकर उनकी हकीकत बताने का काम करने  वाले उनके लिए चुनौती बन जाते हैं । अपनी बातों को उपर रखने और पर्दा डाल कर लोगों को गुमराह करने वालों की संख्या आज कल तेजी से बढ़ रहा है । यहां तक कि इसके पीछे भी एक बहुत गहरी चाल नजर आ रही है । अब सच्च को सच्च कहने के लिए भी कई बार सोचना होगा, क्योंकि कुछ लोगों का मकसद आपके मुंह पर टेप लगाकर सिर्फ अपनी ही बात सुनाने की है । समाज को सच्च का आईना दिखाने वाले जब नहीं होगे, तब आप कैसा समाज और कैसी लोकतंत्र की कल्पना कर सकते हैं ? इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि असहमति की जो आवाजें  किसी समाज के निर्माण की वकालत करती हैं, उन्हें ही कुछ लोग दुश्मन मान कर खत्म कर देते हैं। अगर सरकार नफरत और हिंसा से राजनीति तथा देश को बचाना चाहती है तो ऐसे गुनाहगारों को शीघ्र ही सजा के मुकाम तक पहुंचाए । 
संजय त्रिपाठी 
संपादक 
सर्वोदय शांतिदूत  



Share on Google Plus

0 comments:

Post a Comment