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| संजय त्रिपाठी |
जिस हाल में आज कांग्रेस खड़ी है, उसके लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सत्ता के दौरान 2012 से 2014 तक पार्टी व सरकार को घमंड़ी होने का दोषी माना है । उनके शब्दों में घमंड ही कांग्रेस की सरकार को ले डूबी । कहा भी जाता है - ‘ जब नाश मनुष्य पर छाता है, पहले विवके मर जाता है । ’ वही हालात आज - कल बीजेपी के मंत्रियों की होती जा रही है । बडबोले मंत्रियों का खमियाजा मोदी सरकार को भी भुगतना पड़ सकता है । अभी हाल ही में मोदी के मंत्री अल्फोंस के बेतुके बोल ने राजनीति में सरगर्मी मचा रखा हैं । पेट्रौल- डीजल के लगातार बढ़ती कीमतों के कारण लोगों में बढ़ती नाराजगी को पलीता लगाने का काम मोदी सरकार में नए केद्रीय पर्यटन राज्यमंत्री बने अल्फोंस कनन्नाथानम ने अपने बयान से किया है । उन्होंने कहा - जो लोग कार और बाइक चलाते है,, वह भूखे नहीं मर रहे होते हैं । वह महंगा ईंधन खरीदने की क्षमता रखते हैं । वह भुगतान कर सकता है और उसे करना ही होगा । पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला पैसा गरीबों के कल्याण के लिए निवेश किया जायेगा । ऐसे तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है, क्योंकि पहले से ही सरकार ने अलग - अलग मदों में कई उपकर लगा रखे हैं ।
याद होगा कि मोदी ने सरकार बनाने के साथ ही तेल पुल के नाम पर सीधे ही कर संग्रह की घोषणा कर दी थी । तब अन्र्तराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बहुत कम थी । उन्होंने उस समय कहा था कि हम एक विशेष कोष बना रहे हैं जिसके तहत ग्राहको से दो रूपए प्रति लीटर वसूल कर जमा करेगें जो तेल की कीमते बढ़ने पर परेशानियों का सामना करने के बजाय उसे संतुलित किया जा सके । लेकिन वह कर लगातार बढ़ता ही रहा है । आज जब बाजार में तेल की कीमत सबसे नीचले स्तर पर है, फिर भी पेट्रौल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं । आखिर सरकार स्पष्ट क्यों नहीं कर रही है कि ऐसी स्थिति में लगातार कीमत क्यों बढ़ रहे हैं ? पिछले शनिवार को देश में सबसे महंगा पेट्रौल महाराष्ट्र के परभणी में 81.30 रू0 और डीजल अमरावती में 63.71 रू0 प्रति लीटर पर बिका ।
हैरत है कि अल्फोंस ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से केवल आम वाहन चालकों पर असर नहीं पड़ता। इससे ढुलाई, सार्वजनिक परिवहन और फिर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ती हैं। अभी जब विकास दर ने नीचे का रुख किया हुआ है और महंगाई ऊपर चढ़ रही है, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें उनसे पार पाने में मुश्किलें ही पैदा करेंगी। मंत्री पद का निर्वाह करने वाले एक व्यक्ति से ऐसे अतार्किक बयान की अपेक्षा नहीं की जाती। पेट्रोल - डीजल की कीमत बढ़ने के कारण ही हर स्तर पर महंगाई बढ़ती है । समाज का हर तबका इससे जुड़ा हुआ है, यह सिर्फ कार और बाइक वालों पर ही प्रभाव नहीं डालता बल्कि महंगाई बढ़ाने में अहम भूमिका भी निभाता है ।
एक समय था जब वर्तमान केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह पेट्रौल - डीजल की बढ़ती कीमत को लेकर अपने हाथ में पोस्टर लेकर जंतर - मंतर पर यूपीए सरकार के खिलाफ धरना देते हुए कहा था कि पेट्रौल और डीजल की कीमत पर गरीब और अमीर का जीवन निर्भर है । आज यह मोदी सरकार क्यो भूल रही है ? मोदी के नवनियुक्त मंत्री ने यह भी भुला दिया कि यूपीए सरकार के समय जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ने की वजह से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का फैसला किया गया था, तब भाजपा ने किस तरह संसद में हंगामा किया था। उससे पहले का वह वाकया भी शायद उन्हें याद न हो जब अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद परिसर में बैलगाड़ी पर बैठ कर जुलूस निकाला था। पेट्रोल और डीजल से मिलने वाले राजस्व का कितना हिस्सा अब तक गरीबों के उत्थान के लिए उपयोग किया गया है, इसका कोई जवाब शायद उनके पास नहीं होगा।
आज सरकार के कई तरह से लोगों से कर वसूली के मामले में आम जनता व व्यवसायी इस कदर परेशान है जो मोदी सरकार को भी कांग्रेस के तरह ही घमंडी बता रहे है । मोदी के कई मंत्री और सांसद अपने बड़बोले बयान के कारण सरकार को संकट में डाले रखते हैं । याद करें यूपीए का वह दौर जब उसके पांच सीपाहसालार सिर्फ अपने बेतुके बयान से कांग्रेस की छीछालेदर करने में कोई कसर नही छोड़े । आखिर सरकार पेट्रौल - डीजल को जीएसटी के अंदर क्यों नहीं लाती । हालांकि पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कह चुके हैं कि सरकार महंगे पेट्रोल - डीजल पर कुछ नहीं कर सकती। जीएसटी में लाना ही इसका समाधान है ।
अब प्रश्न उठता है कि क्या सरकार पेट्रौल - डीजल के दाम को नियंत्रित करने का कोई प्रयास कर भी रही है या नहीं ? सरकार ने पिछले साल जून में ही पेट्रोल के दाम को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया था, लेकिन क्या इससे कंपनियों को मनमानी करने की छूट नहीं मिली है? क्या सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले टेक्स पर पुनः विचार करके उसकी कीमतों को कम नहीं कर सकती ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आम आदमी के लिए बहुत मायने रखते हैं। इंतजार इस बात का है कि सरकार की तरफ से इन सवालों के जवाब कब मिलेंगे?
संजय त्रिपाठी
संपादक
सर्वोदय शांतिदूत




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