‘ बिहार ’ तो विहार ही है 'Bihar''s dalliance with


                                                               संपादकीय 

खिर जिसने भी जब ‘ बिहार ’ राज्य का नाम ‘ बिहार ’ रखा होगा, जरूर उसने भी कुछ सोच कर ही रखा होगा । इतिहास में इसे ‘ मगध ’ के नाम से पढ़ा और सुना गया है । यहां के शासक और उनके शासन स्तर तथा शिक्षा के विषय में प्राचिन काल से पढ़ते और सुनते आ रहे हैं । जब भी इसके पुराना इतिहास का अवलोकन करते हैं तो गर्व होता है , सीना चैड़ा हो जाता है । लेकिन जब वर्तमान इतिहास सामने आता है तब स्वतः ही सर झुक जाता है । मगध से इसका नाम ‘ बिहार ’ कैसे हुआ यह प्रश्न दिमाग को मथता रहता है । अपनी सोच से इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इसका नाम ‘ बिहार ’ इस लिए रखा गया होगा,  क्योंकि प्राचिन समय से ही ‘ बुद्ध ’ के ज्ञान प्राप्ति का स्थल होने के कारण विदेशी भ्रमणकारी ज्यादा संख्या में यहां आते थे । रमणीय, स्वच्छंद, मनोहर शान्ति स्थल का भ्रमण भी ‘ विहार ’ कहलाता है । इसी कारण कलांतर में ‘ विहार ’ का नाम ही ‘ बिहार ’ हो गया होगा । लेकिन क्या अब आज का बिहार ‘ विहार ’ करने योग्य स्थान है । 80 के दशक से इस राज्य में अधिकांश नेता बाहुबली, बदमाश, हिस्ट्रीशीटर, गुंडा ही बने हैं । जिस पर जितनी मुकदमों की संख्या ज्यादा होती है उससे उतना ही ज्यादा लोग डरते हैं । उस बाहुबली की जीत की गरांटी भी उतनी ही ज्यादा होती है । बिहार के बदमाशों को सभी पार्टियां टिकट देने के लिए लालायित रहती है, क्योंकि उस प्रत्यासी की जीत पक्की होती है जो प्रसिद्ध हिस्ट्रीशीटर है । बिहार में चुनाव जीतने के लिए प्रत्यासी को अपनी ‘ बायोडाटा ’ में मुकदमों की संख्या, गाड़ियों की संख्या, शाॅर्प शूटर और गनर बदमाशों की संख्या, धन - बल का उल्लेख करना या मौखिक बतना जरूरी होता है । अब ऐसे में नेता या मंत्री के साथ शाॅर्प शूटर नही ंतो क्या विद्वान देखा जाएगा । खामो-खा हो - हल्ला मचाने के जगह आजादी के बाद जय प्रकाश नारायण का युग छोड़ कर ‘ बिहार ’ के इतिहास पर तो एक नजर जरूर डाल लेना चाहिए । अब तो कमो - वेश पूरे देश की यही स्थिति कही जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । यहां कि जनता भी फिल्मी स्टाइल में नेताओं की छवि व एक्शन देखने के लिए उत्सुक रहती है । सिर्फ इतना ही नहीं उसी को वोट देकर विजयी भी बनाती है । (एक बात का उल्लेख सिर्फ जताने के लिए कर रहा हूू, इससे मेरा उदेश्य सिर्फ दर्शाना है कोई और मकसद नहीं । ) मान लिजिए आज के दौर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ( नंगे बदन, धोती की लगोटी ) एक बार ‘ बिहार ’ के चुनाव में प्रत्यासी बन जाए तो उन्हें भी हार का मुंह ही देखना पड़ेगा । ‘ चल पड़े जिधर दो डगमग में , चल पड़ा कोटी पग उसी और ’ यह आज के समय में सिर्फ पढ़ने के लिए ही बचा है । अब तो वोटर तुरंत कह देता है कि जिसकी हालत ऐसी है वह भला चुनाव क्या जीतेगा । ग्लैमर की दुनिया है, जो दिखता है वही बिकता है । बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या के फरार आरोपी मो. कैफ उर्फ बंटी को देखा गया है । अज कल इस वायरल फोटो की चर्चा जोरों पर है । शहाबुद्दीन जिस दिन जेल से बाहर निकले थे उस दिन भी वह उनके काफिला में देखा गया था । जब गुरू शहाबुद्दीन  लालु यादव के साथ रहे है, उनके पार्टी के सांसद रहे हैं और आज भी पार्टी के नेता है । वह भी चंदाबाबू के तीन बेटों के हत्यारे समेत कई मामलों के अभियुक्त हैं, तब उनके शिष्य मो. कैफ का लालु यादव के बेटे के साथ देखा जाना कौन सी बड़ी हैरत की बात है । अरे भाई यह ‘ बिहार ’ है । आज कुछ ज्यादा ही कलम घसीट दिया । कही राजदेव रंजन के बाद अगला नंबर मे.....................

                                                                                    tripathi.sanjay290@gmail.com

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