संपादकीय
आज भारत लहूलुहान है । आज एक बार फिर भारत के जवानों को अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी गर्म खून से उरी की धरती को सींचना पड़ा है । घाटी में आतंक के 26 साल में यह सेना पर सबसे बड़ा हमला है । सेना कैंप पर आतंकी हमले में 17 जवान शहीद हुए हैं। तम्बुओं में से रहे 14 जवान तो जिंदा ही जल गए । 20से ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए हैं । लगातार हमारे जवानों की खून की होली खेली जा रही है, और हम सिर्फ बातों से उनके परिवारवालों के आंसू पोछने का काम कर रहे हैं । क्या हमारी इन नौजवानों के प्रति यही कर्तव्य रह गया है । जरा याद करे 5 दिसम्बर 2014 का वह दिन जब कश्मीर के इसी क्षेत्र में हमारे 10 जवानों को इसी तरह अपनी कुर्बानी देनी पड़ी थी । पठानकोट वायु सेना स्टेशन, गुरूदासपुर और पूंछ में भी हमारे जवानों को इसी तरह शहादत देनी पड़ी थी । क्या हम और हमारे देश के राजनीतिज्ञ इतने स्वार्थी हो गए हैं जो सिर्फ अपने जवानों के बलिदान से ही देश की भूमि को लाल करते रहेंगे । देखा जाए तो आज की सरकार भी सिर्फ कांग्रेस के तरह ही झूठी दिलसा से ही हमें खुश रखना चाहती है, जवानों के परिवारवालों के जख्मों पर सिर्फ मलहम लगाने का काम कर रही है । अगर अब भी खून में उबाल नहीं आ रहा तो यह समझ लेना चाहिए की हमारा , हमारे देश और राजनेताओं का खून पानी बन कर नसों में दौड़ रहा है । हमने पूर्व के आतंकी हमलों से भी कोई सबक नहीं लिया है । वे बार - बार हमारे देश में धुसकर हमें हमारे जवानों को मार रहे हैं । हम हर बार सिर्फ दांत पिसकर ही दिखाते हैं - उन्हें नहीं छोडेंगे, इसका जवाब उन्हें दिया जायेगा । लेकिन कुछ दिन बाद सब खत्म हो जाता है । आखिर इसका जवाब हम कब देगें यह आज तक नहीं पता चल पाया । हमारे देश के नेता सिर्फ घडियाली आंसू बहाकर खेद प्रकट करेंगे, जवानों के ताबूतों पर फूल - मालाएं चढ़ाएंगे और उन्हें तोपों से सलामी दी जायेगी । फिर शुरू होगा मुआवजे और सरकारी नौकरी से जवानों के परिवारवालों के पीड़ा को शांत करने का प्रयास । लेकिन क्या उस औरत जिसकी सुहाग उजड़ गई, जिसके माथे की सिंदूर और हाथों की चुड़िया टूट गई, जिस माॅ की गोद सुनी हो गई, जिस बहन से कलाई छिन गई उसे कभी पूरा किया जा सकेगा । फिर कुछ दिन बाद उनकी कुर्बानी को भूला दिया जायेगा । अरे - सिर्फ लोगों को दिलासा मत दो बल्कि ऐसा काम करों जिससे देश का गौरव बढ़े, नापाक पाकिस्तान को एक ऐसी सबक मिले जिसके बाद वह कभी भारत के तरफ आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत न कर सके । जरा यह भी सोचे - देश का जवान देश की रक्षा के लिए जीता है और हंसते - हंसते देश पर प्राण न्यौछावर कर देना चाहता है । लेकिन जब सोए और अचानक में उसकी मौत हो तो उसे मरते समय भी कैसा लगता होगा । जवान तो घात लगाकर आतंकी हमले में भी मर रहे हैं तो क्यों नहीं पड़ोसी देश को सबक सिखाकर ही मरे । इसलिए अब समय आ गया है कि हमें अपने पडोसी देश पाकिस्तान को यह दिखा दे कि अब और हम बर्दाश्त नहीं कर सकते । लात का भूत बात से नहीं मानता । 51 के उम्र में भी यह कलम पकड़ने वाला हाथ अब बंदुक उठाने को भी तैयार है, सिर्फ उस समय का इंतजार है ।



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