By नीरज कुमार दुबे
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रतिपादन किए जाने के बाद से ही गुट-निरपेक्षता भारत की विदेश नीति की आधारशिला रही है। गुट-निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत ने निरंतर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि यह आंदोलन सहयोग और रचनात्मक कार्यकलापों के आधार पर आगे बढ़े लेकिन अब लगता है कि वर्तमान राजग सरकार ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन से दूरी बनाने का निर्णय किया है। यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि इस वर्ष होने वाले गुट-निरपेक्ष सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नहीं जा रहे हैं। 1961 में इस आंदोलन की स्थापना के बाद से यह दूसरी बार होगा कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में नहीं जाए। इससे पहले 1979 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन की बैठक में हिस्सा नहीं लिया था।
यह सही है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार नीतियों में बदलाव जरूरी है लेकिन यदि बदलाव के पीछे सही 'तथ्य और तर्क' नहीं हों तो सवाल भी उठते हैं। सरकार के इस फैसले के पीछे माने जा रहे तीन कारणों में पहला यह कहा जा रहा है कि राजग सरकार वर्षों से सरकार दर सरकार चली आ रही नीतियों की समीक्षा कर यह जानने की कोशिश कर रही है कि इससे देश को क्या लाभ हुआ। संभव है कि गुट-निरपेक्ष सम्मेलन के लिए भारत सरकार ने जो फैसला किया है वह इसी समीक्षा रिपोर्ट पर ही आधारित हो। इसके अलावा इस फैसले के पीछे एक और बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि चूँकि गुट-निरपेक्ष आंदोलन को अमेरिका के खिलाफ माना जाता है इसलिए मोदी सरकार इससे दूरी बना रही है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के साथ भारत के संबंध सुधारने की बहुत पहलें की हैं और इस क्रम में रूस जैसे पारम्परिक मित्र को किनारे कर दिया गया है। मोदी के बैठक में नहीं जाने का तीसरा कारण यह है कि बैठक अमेरिका के दुश्मन देश माने जाने वाले वेनेजुएला में आयोजित की जानी है। चौथा कारण जोकि दबे स्वरों में बताया जा रहा है वह यह है कि मोदी नेहरू द्वारा स्थापित विदेश नीति को बदल कर अपने द्वारा स्थापित नीतियां लाना चाहते हैं।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह गुट-निरपेक्ष आंदोलन की पहली बैठक है। इसमें नहीं जाने का फैसला कर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर निगाह रखने वाले समीक्षकों का काम और बढ़ा दिया है। इस सम्मेलन में निश्चित रूप से भारतीय प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर अटकलों का दौर रहेगा। भाजपा सूत्रों की मानें तो कुछ वरिष्ठ नेता भी सरकार के इस फैसले से हैरान हैं क्योंकि बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी गुट-निरपेक्ष आंदोलन की दो बैठकों में भाग लिया था। गौरतलब है कि इस साल भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। माना जा रहा है कि राजग सरकार देश की छवि 'संतुलन बैठा कर चलने वाले देश' से बदल कर 'अगवा ताकत' के रूप में करना चाहती है।
माना जाता है कि अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच चले शीतयुद्ध के समय स्थापित गुट-निरपेक्ष आंदोलन की आज की उभरती विश्व व्यवस्था में बड़ी भूमिका है। गुट-निरपेक्ष आंदोलन खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण तथा वैश्विक अभिशासन की संस्थाओं में सुधार जैसी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के समक्ष विद्यमान समकालीन चुनौतियों के संबंध में विकासशील देशों की चिंताओं को भी अभिव्यक्त करता है। यह आंदोलन पारंपरिक उत्तर-दक्षिण विभाजन के अंतर को भी पाटने का प्रयास करता है। गुट-निरपेक्ष आंदोलन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता स्थायी मानी जाती रही है और अमेरिका-ईरान के बीच जब संबंधों में तनाव एकदम चरम पर था तब भी मनमोहन सिंह ने तेहरान सम्मेलन में भाग लेकर इस आंदोलन के प्रति देश की प्रतिबद्धता बरकरार रखी थी।
अप्रैल 1955 में जब गुट-निरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत हुई थी तो तत्कालीन संस्थापक नेताओं का उद्देश्य यह था कि किसी भी एक देश का पक्ष लेने की बजाय विकासशील और अविकसित देशों को एक मंच पर लाया जाए। देशों को इस मंच से जोड़ने का क्रम लगातार जारी रहा और साल 2012 तक इसमें 120 सदस्य हो चुके थे। लेकिन अब 2016 में इसका एक संस्थापक सदस्य ही इससे दूरी बनाता हुआ नजर आ रहा है। बहरहाल, अब देखने वाली बात यह होगी कि मोदी सरकार की ओर से विदेश नीति में किये जा रहे बदलाव क्या सार्थक परिणाम दे पाते हैं?
- नीरज कुमार दुबे




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