भगवान कृष्ण के अनेक रूप हैं उनमें से एक रूप अर्जुन के गुरू के रूप में हंै। वे जहां एक गौ रक्षक (सेवक) के रूप में हैं वहीं वे निष्काम कर्म योग की शिक्षा देते दिखाई देते हैं तो अगले ही पल महाभारत के युद्ध के निर्णायक के रूप में दिखायी देते हैं। लेकिन हम इस अंक में कृष्ण के जीवन के उस रूप की चर्चा करेंगे जिसमें वे एक तत्व ज्ञानी के तौर पर अर्जुन को समझाते हैें।
एक बार की बात है कि अर्जुन और कृष्ण दोनों द्वारिका में समुद्र के तट पर बैठे थे । तब अर्जुन ने कृष्ण से पूछा कि भगवन मुझे समुद्र की लहरों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि समुद्र काफी प्रदूषित हो गया है। तब कृष्ण ने अपने जवाब में कहा कि हे अर्जुन तुम जानते हो कि इसका मूल कारण क्या है ? अर्जुन ने कहा मैं नहीं जानता। कृष्ण ने कहा कि तुम यह जानते हो कि राष्ट्रवाद कितना प्रदूषित हो गया है ? अजुर्न ने कहा कि हां भगवन मैं यह जानता हूं।
कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन जिस समय राष्ट्रवाद की परम्परा अक्षम्य हो जाती है, उस समय प्रायः वातावरण अशुद्ध हो जाता है। उन्होंनें अर्जुन से पूछा कि क्या तुम्हें यह जानकारी है कि जिस समय विश्व संग्राम होता हे तो उस समय रक्त भरी क्रंाति आती है। उस समय प्रकृति के सभी लक्षण परिवर्तित हो जाते हैं। अर्जुन ने फिर कहा कि हे भगवन मैं इसे नहीं जानता। कृष्ण ने कहा कि यह समुद्र उस समय प्रदूषित होता है जब देवताओं के ऋण से उऋण नहीं होते। देवताओं के श्रण से उऋण होना जरूरी है। यह मानव हर समय दुर्गंध ही दुर्गंध करता है सुगंधि नहीं करता। कहीं दूषित विचारों से तो कभी पदार्थ को अशुद्ध बनाके। जव सुगंधि नहीं की जाती तो संुगंधि समाप्त हो जाती है , चारों ओर दुर्गंधि ही दुर्गंधि हो जाती है। इससे समुद्र में भी अशुद्धिवाद आ जाता है। अर्थात समुद्र का जो जलप्रवाह है उसमें दूषितवाद की तरंगें ओत - प्रोत हो जाती हैं। हे अर्जुन आज जो तुम्हें दूषित तरंगें नजर आ रही हैं उससे जाहिर होता है कि संग्राम होना र्है आैर जो समाज का दूषितवाद है उसे नष्ट होना हैं।
उस समय श्री कृष्ण ने अपनी यौगिक सत्ता के द्वारा अपने मन को अर्जुन के अंतःकरण में प्रवेश कर दिया और कहा कि यह जो मन को मोह हो गया है उसे शांत करो और युद्ध करो।
सत्यपाल सिंह चैहान।




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