भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान जुझारू नजर आयी होंगी लेकिन उन्होंने कश्मीर या दूसरी जगह पाकिस्तान के हस्तक्षेप के प्रति भारत की खीज का संकेत भर दिया है। उरी में 14 जवानों की हत्या के बाद व्यापक पैमाने पर समर्थित मांग है- बदले की कार्रवाई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना द्वारा चुने गए उचित समय एवं जगह पर बदले की कार्रवाई का वादा किया है। भारत का अगला कदम क्या होगा, यह नहीं मालूम, लेकिन बदले की कार्रवाई का होना बहुत हद तक सच है। विकल्प और धीरज के बगैर इसका इस्तेमाल एक दुखद विकल्प है। हालांकि धीरज लगातार खत्म होता जा रहा है। युद्ध को विकल्प नहीं माना जाता, तो फिर रास्ता क्या है?
पाकिस्तान ने स्वीकार किया है कि उरी में हालातों को बदहाल करने में कुछ गैर सरकारी ताकतें शामिल हो सकती हैं। लेकिन पूरी दुनिया द्वारा उरी की घटना को वीभत्स करार दिये जाने के बाद पाकिस्तान ने यह बात कही है। इस्लामाबाद का कहना है कि यह सब भारत द्वारा प्रायोजित था और इसमें इस्लामाबाद का कोई हाथ नहीं है। लेकिन वह इस बारे में क्या सफाई देगा कि उरी में हमला करने वालों ने उसकी जमीन का इस्तेमाल किया। पाकिस्तान ने सारी बातों से ध्यान हटाने के लिए कश्मीर का मुद्दा उछाला है। वह चाहता है कि जो बातचीत वह शुरू करे उसमें भारत शामिल हो।
संभवतः उसकी नजर इस्लामाबद में हो रहे सार्क सम्मेलन पर रही होगी। भारत द्वारा इसमें भाग लेने से औपचारिक रूप से इनकार कर देने के बाद बैठक समाप्त हो गई क्योंकि नेपाल एवं बांग्लादेश ने इस्लामाबद में आयोजित शिखर सम्मेलन में भाग लेने में अपनी असमर्थता प्रकट की थी। जाहिर है भारत द्वारा औपचारिक रूप से ना करने के बाद इसे रदद् होना ही था।
सवाल है कि हम यहां से कहां जायें। युद्ध विकल्प नहीं है लेकिन बातचीत भी फलप्रद नहीं रही है। सुषमा स्वराज का यह भाषण कि पाकिस्तान की हरकतों से भारत ऊब चुका है और अब उसे कोई कार्रवाई करने को मजबूर होना पड़ सकता है, पाकिस्तान को एक और चेतावनी है। सबकी निगाहें नई दिल्ली की ओर है क्योंकि क्या कदम उठाना है यह उसे तय करना है। यह बात लगातार साफ होती जा रही है कि बातचीत कोई समाधान नहीं है।
भारत सिंधु जल संधि पर फिर से विचार करना चाहता है। 1960 में यह संधि जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के सेना प्रमुख मोहम्मद अयूब खान के हस्ताक्षर से हुई थी। पाकिस्तान के विदेशी मामलों को देखने वाले सरताज अजीज ने कहा है कि पाकिस्तान की भागीदारी के बगैर इस संधि पर पुनर्विचार की दिशा में किया गया कुछ भी 'युद्ध की कार्रवाई' होगी। अजीज के इस बयान ने मामले को और उलझा दिया है। इस गतिरोध के कारण कोई प्रगति नहीं हुई है। यह बात दोनों देशों के लोगों को बताई जानी चाहिए। वे लोग अपनी−अपनी सरकार से मामले को बातचीत के जरिये सुलझाने के लिए कहते रहे हैं। पाकिस्तान बार−बार कहता रहा है कि उपमहाद्वीप में किसी भी शांति के लिए कश्मीर मुद्दे पर कोई न कोई समझौता जरूरी है।
इस तरह हम लौट कर फिर वहीं आ गये। किसी न किसी तरह संबंधित पक्षों को समाधान के लिए आमने−सामने बात करनी चाहिए। लेकिन भारत और पाकिस्तान खुद यह काम नहीं कर सकते। दरअसल कश्मीरी चाहते हैं कि उनकी बातें सुनी जाएं। हाल में मैं छात्रों के निमंत्रण पर श्रीनगर गया था तो मैंने पाया कि वहां के नौजवान अपना संप्रभु एवं स्वतंत्र देश चाहते हैं। वे इस बात को महसूस नहीं करते कि भारत अपनी सीमा पर एक और इस्लामिक देश का समर्थन नहीं कर सकता। वह पहले से मौजूद पाकिस्तान से ही तबाह है। नौजवान गुस्से में हैं और वे अपनी 'आजादी' की मांग से कोई समझौता नहीं करेंगे। वे इस बात को नहीं महसूस करते कि आजादी एक आदर्श है, संभव व सहज समाधान नहीं। अगस्त 1947 में भारत छोड़ते वक्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को विकल्प दिया था कि अगर वे भारत या पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहते तो अलग स्वतंत्र रहें। जम्मू−कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने घोषणा की थी कि वे स्वतंत्र रहेंगे। चारों ओर से घिरे देश को बाहरी दुनिया से संबंध बनाये रखने के लिए भारत और पाकिस्तान, दोनों का समर्थन चाहिए था। वे किसी एक पर आश्रित नहीं रहना चाहते थे।
जम्मू−कश्मीर में मुसलमानों के बहुसंख्या में होने के कारण पाकिस्तान इसे अपने साथ रखना चाहता था। जब ऐसा नहीं हो सका, तो पाकिस्तान ने सशस्त्र सेना से असंबद्ध जवानों को यहां भेजा। इन जवानों को पाकिस्तानी सेना का समर्थन हासिल था। तब जाकर महाराजा ने भारत की मदद मांगी। भारत ने अपनी सेना भेजने के पहले शर्त रखी कि उन्हें भारत में रहना होगा। महाराजा ने इस शर्त को कबूल कर भारत में शामिल होने के शर्तनामा पर हस्ताक्षर किया।
जम्मू−कश्मीर का दो हिस्सा आजादी के खिलाफ है। हिंदु बहुल जम्मू भारत के साथ रहना चाहेगा जबकि बौद्ध बहुल दूसरा हिस्सा लद्दाख भारत का केंद्र शासित राज्य बनना चाहता है। इस तरह आजादी की मांग सिर्फ कश्मीर घाटी तक सीमित है जहां की करीब 98 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है।
भारत जब ध्रुवीकरण की कोशिश में है और सत्तारूढ़ दल हिंदु कार्ड का इस्तेमाल कर रहा है तो ऐसी हालत में इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि कांग्रेस या कम्युनिस्टों समेत कोई दूसरा दल आजादी की मांग का समर्थन करेगा। सभी राजनीतिक दल आजादी की मांग के खिलाफ हैं हालांकि इनमें से कुछ दल राज्य को और अधिकार देने का समर्थन कर सकते हैं।
बंटवारे के 70 साल बाद भी बंटवारे से उभरा जख्म अभी तक भरा नहीं है। भले ही कश्मीरियों की भावनाएं चाहे कितनी भी जायज एवं सशक्त क्यों न हों, भारत की जनता से कोई एक और बंटवारे को स्वीकार करने की अपेक्षा कैसे कर सकता है? अगर धर्म के आधार पर एक और बंटवारा होता है तो धर्मनिरपेक्ष देश का अस्तित्व उस रूप में नहीं बचा रह सकता, जैसा वह अभी है। सही है कि भारत के 25 करोड़ मुसलमान बराबरी का दर्जा वाले नागरिक हैं और उनके साथ बंधक जैसा सलूक नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन घाटी के बंटवारे के ऐसे दुष्परिणाम सामने आयेंगे जिसकी कल्पना ही भयावह है। संविधान द्वारा सभी नागरिकों को समानता की दी गई गारंटी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
कश्मीर को लेकर भारत−पाकिस्तान के बीच दो युद्ध हो चुका है। इसके अलावा कारगिल हुआ जो कि मिनी युद्ध जैसा ही था। इसके बावजूद घाटी जम्मू−कश्मीर का हिस्सा बना हुआ है। आजादी की मांग को लकेर कई हजार कश्मीरी अपनी जान गंवा चुके हैं। भारत की नजर में वे आतंकवादी थे। सुरक्षा बलों ने इन सबों को कुचल डाला। हालांकि हजारों सैनिकों को भी जान गंवानी पड़ी। अभी भी सीमा पार से कुछ आतंकवादी घुस आते हैं और कुछ जगहों पर हमला करते रहते हैं लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, जुबिन मेहता के संगीत कार्यक्रम के दिन दक्षिणी कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल की चौकी पर रॉकेट से हमला किया गया। उस दिन श्रीनगर में हड़ताल थी। लेकिन इस तरह का हमला पहले भी कई बार हो चुका है।
सुषमा की चेतावनी भी निरूत्तर रह जा सकती है। लेकिन यह चेतावनी भर है। अगली कार्रवाई में दोनों देश के बीच युद्ध हो सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि इस्लामाबाद कुछ पुनर्विचार कर रहा है क्योंकि उसने अपने राजदूत अब्दुल बसित ने माध्यम से कहा है कि उरी की घटना 'प्रायोजित' थी और पाकिस्तान का इसमें कोई हाथ नहीं था।
कुलदीप नैयर




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