हमारा जमीर कब जगेगा ? By संजय त्रिपाठी When our conscience will awaken?

 
                                                                      संपादकीय 

आज के दौर में हम कितने स्वार्थी होते जा रहे हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है कि पशु से बद्तर इंसान की जिंदगी होती जा रही है । आखिर क्यों हमारी भारतीय संस्कृति और नैतिक आदर्श का दिन - पर - दिन पतन होता जा रहा है । हमें सिर्फ जी लेना, आगे बढ़ जाना और खा लेना ही जिम्मेदारी नहीं है इससे इतर भी हमारा कुछ कर्तव्य है और उसे हमें निभाना होगा । आज बेटों के लिए मां - बाप पहाड़ बनते जा रहे हैं, इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए ? बेटे कि निचता या पत्नी का स्वार्थ ? वास्तविक में कौन जिम्मेदार है । बेंगलूरू में रहने वाली एक महिला से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौजुदा केस में महिला ने अलग रहने का दबाव इसलिए डाला कि पति के इनकम का पूरा इस्तेमाल कर सके । उसने पति पर अवैध संबंधों का भी गलत आरोप लगाया । पत्नी ने अलग रहने के लिए जो हरकत की है, वह क्रुएलिटी के दायरे में आता है । कोर्ट ने यह भी कहा है कि पति पर परिवार छोड़ने का दबाव डालना तालाक का आधार है । कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाते हुए पति को तलाक देने का आदेश दिया । पति- पत्नी, सास - ससुर, मां - बेटों के मामले अब इतने पेचिदे होते जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के दहलीज तक पहुच रहे हैं, क्योंकि हम सभी तंग दिल हो गए हैं । हमारी आगे बढ़ने की चाहत हमें परिवार और समाज से विमुख कर दिया है । क्या हमरी चाहत इतनी बढ़ गई है जिसमें मां - बाप , भाई - बहन, परिवार और समाज तथा देश का कोई महत्व नहीं रह गया है । हमें यह गंभीरता से सोचना होगा कि हम किस तरफ आगे बढ़ रहे हैं, अपने नौनिहालों के समक्ष क्या मिशाल पेश कर रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए यह भी कहा है कि पत्नी अगर बिना ठोस वजह के पति पर अपने परिवार से अलग होने का दबाव डालती है तो यह पति को परेशान करने जैसा होगा । पत्नी खुदकुशी की धमकी देती है या जान देने का प्रयास करती है तो इसे क्रुरता माना जायेगा । माता- पिता की देखभाल बेटा करे, यह भारत में  हिन्दू कल्चर का हिस्सा है । पैरंट्स बेटों को पढ़ाते हैं, परवरिश करते हैं । ऐसे में बेटे की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह बुढ़ापे में पैरंट्स की देखभाल करे, चाहे पैरंट्स की आर्थिक स्थिति कैसी भी क्यों न हो । आमतौर पर पत्नी से परिवार में रहने और उसका अभिन्न अंग बनने की उम्मीद की जाती है । आखिर इस तरह की टिप्पणी करते समय जज भी एक संयुक्त परिवार की क्या सपना बुन रहे होगे । आज हम लोगों को एक बार जरूर संयुक्त परिवार के जीवन पर नजर दौड़ानी चाहिए, अगर हम कभी संयुक्त परिवार का हिस्सा रहे हो तो । जरा सोचे क्या मिलता था संयुक्त परिवार में और आज सब कुछ पा कर भी हमने क्या खो दिया ? एक रिश्तों- नातों की डोर हमें किस तरह बांध कर रखती थी ? कैसे हम परिवार के साथ स्वालंम्बी होते थे ? क्या वह अब हैं ? जो बच्चे संयुक्त परिवार के बिखरने के बाद जन्म लिए हैं, उनके सोच और अपनी सोच की तुलना कीजिए । आप देखेगे कि उनके अंदर बचपन से ही सेल्फीस की भावना प्रबल दिखाई देती है । उनके नजर में परिवार के किसी भी सदस्य का कोई महत्व नहीं है । यह उनकी कमी नहीं, बल्कि हम बड़ों की नैतिक पतन होने के कारण है । बड़े बुढ़े कहते हैं कि महाभारत काल में राजा परिक्षित महर्षि बेद व्यास के साथ एक दिन रथ पर सवार हो कर नगर भ्रमण को निकले । कुछ दूर जंगल के तरफ जाने के बाद वे देखते हैं कि पांच कुंओं के बीच में एक बड़ा कुंआ से पानी निकल रहा है और वह पांचों कुंओं को लबालब भर दे रहा है । इधर से वे आगे चले गए लेकिन उनका ध्यान इस तरफ नहीं गया कि क्यों ऐसा हो रहा है । लेकिन जब वापस लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि अब पांचों कुओं से पानी निकल रहा है और पांचों मिलकर बीच के कुंए को नहीं भर पा रहे हैं । उनके मन में यह जिज्ञासा जगी कि इसका कारण क्या है । फिर अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उन्होंने महर्षि बेद व्यास से इसका कारण पूछ लिया । महर्षि ने उन्हें बताया कि अब ऐसा समय आ रहा है कि एक बाप तो अपने कई बेटों का पालन - पोषण कर  देगा, लेकिन कई बेटे एक बाप का पेट नहीं भर पाएंगे । कहानी सच्ची हो या दंतकथा लेकिन इसका उदेश्य निर्मल है। मां-बाप घर में शोभा देते हैं बृद्धाआश्रम में नहीं ।
                                                                                                                             संजय त्रिपाठी   
                                                                                                       tripathi.sanjay290@gmail.com   

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