क्‍यों शक्ति की मां रूप में पूजा होती है - Significance of worshipping nav durga

नवरात्र शक्ति महापर्व पूरे भारतवर्ष में बड़ी श्रद्धा व आस्था के साथ मनाया जाता है. भारत ही नहीं पूरे विश्व में शक्ति का महत्व स्वयं सिद्ध है और उसकी उपासना के रूप अलग-अलग हैं. समस्त शक्तियों का केन्द्र एकमात्र परमात्मा है परन्तु वह भी अपनी शक्ति के बिना अधूरा है. सम्पूर्ण भारतीय वैदिक ग्रंथों की उपासना व तंत्र का महत्व शक्ति उपासना के बिना अधूरा है.

शक्ति से तात्पर्य है ऊर्जा यदि ऊर्जा को अपने अनुसार चलाना है तो उस पर आधिपत्य करना पड़ेगा मतलब या तो शक्ति को हराकर या तो शक्ति को जीतकर उसे हम अपने पराधीन कर सकते हैं. परन्तु यह होना जनमानस से संभव नहीं था इसलिए भारत में उससे समस्त कृपा पाने के लिए मां शब्द से उद्धृत किया गया. इससे शक्ति में वात्सल्य भाव जाग्रत हो जाता है और अधूरी पूजा व जाप से भी मां कृपा कर देती है. इसलिए सम्पूर्ण वैदिक साहित्य और भारतीय आध्यात्म शक्ति की उपासना प्रायः मां के रूप में की गई है. यही नहीं शक्ति के तामसिक रूपों में हाकिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी आदि की पूजा भी तांत्रिक और साधक मां के रूप में करते हैं. मां शब्द से उनकी आक्रमकता कम हो जाती है और वह व्‍यक्ति को पुत्र व अज्ञानी समझ क्षमा कर अपनी कृपा बरसती हैं.

भारत में शक्ति की पूजा के लिए नवरात्र का अत्यधिक महत्व है. नवरात्र में प्रायः वातावरण में ऐसी क्रियाएं होती हैं और यदि इस समय पर शक्ति की साधना, पूजा और अर्चना की जाए तो प्रकृति शक्ति के रूप में कृपा करती है और भक्तों के मनोरथ पूरे होते हैं. नवरात्र शक्ति महापर्व वर्ष में चार बार मनाया जाता है क्रमशः चैत्र, आषाढ़, अश्विन, माघ. लेकिन ज्‍यादातर इन्‍हें चैत्र व अश्विन नवरात्र के रूप में ही मनाया जाता है. उसका प्रमुख व्यवहारिक कारण जन सामान्य के लिए आर्थिक, भौतिक दृष्टि से इतने बड़े पर्व ज्यादा दिन तक जल्दी-जल्दी कर पाना सम्भव नहीं है. चारो नवरात्र की साधना प्रायः गुप्त साधक ही किया करते हैं जो जप, ध्यान से माता के आशीर्वाद से अपनी साधना को सिद्धि में बदलना चाहते हैं.


नवरात्र को मनाने का एक और कारण है जिसका वैज्ञानिक महत्व भी स्वयं सिद्ध होता है. वर्ष के दोनों प्रमुख नवरात्र प्रायः ऋतु संधिकाल में अर्थात् दो ऋतुओं के सम्मिलिन में मनाए जाते हैं. जब ऋतुओं का सम्मिलन होता है तो प्रायः शरीर में वात, पित्त, कफ का समायोजन घट बढ़ जाता है. परिणामस्वरूप रोग प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है और बीमारी महामारियों का प्रकोप सब ओर फैल जाता है. इसलिए जब नौ दिन जप, उपवास, साफ-सफाई, शारीरिक शुद्धि, ध्यान, हवन आदि किया जाता है तो वातावरण शुद्ध हो जाता है. यह हमारे ऋषियों के ज्ञान की प्रखर बुद्धि ही है जिन्होंने धर्म के माध्यम से जनस्वास्थ्य समस्याओं पर भी ध्यान दिया.


शक्ति साधना में मुख्य रूप से नौ देवियों की साधना, तीन महादेवियों की साधना और दश महाविद्या की साधना आदि का विशेष महत्व है. नवरात्र में दशमहाविद्या साधना से देवियों को प्रसन्न किया जाता है. दशमहाविद्या की देवियों में क्रमशः दशरूप- काली, तारा, छिन्नमास्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगला मुखी (पीताम्बरा), मातंगी, कमला हैं. प्रत्येक विद्या अलग-अलग फल देने वाली और सिद्धि प्रदायक है. दशमहाविद्याओं की प्रमुख देवी व एक महाविद्या महाकाली हैं. दशमहाविद्या की साधना में बीज मंत्रें का विशेष महत्व है. दक्षिण में दशमहाविद्याओं के मंदिर भी है और वहां इनकी पूजा का आयोजन भी किया जाता है. दशमहाविद्या साधना से बड़ी से बड़ी समस्या को टाला जा सकता है.

आप किसी देवता की पूजा करते हैं परन्तु आपने शक्ति की आराधना नहीं की तो पूजा अधूरी मानी जाती है. श्रीयंत्र पूजा शक्ति साधना का एक बड़ा ही प्रखररूप है. शक्ति के बिना शिव शव हैं ऐसा प्रायः धर्मशास्त्र में कहा गया है. यही नहीं शक्ति का योगबल विद्या में भी बड़ा महत्व है, बिना शक्ति जगाए योग की सिद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती है.

ज्योषिय आधार पर ऐसा माना जाता है कि यदि व्यक्ति नौ देवियों की नौ दिन तक साधना करता है तो उससे उस साधक के नौ ग्रह शांत होते हैं. ये सब मां शक्ति की कृपा स्वरूप होता है. यही नहीं काल सर्प दोष, कुमारी, दोष, मंगल दोष आदि में मां की कृपा से मुक्त हुआ जा सकता है. भारतीय ऋषियों के वैदिक ज्ञान के विश्लेषण और विश्व के व्यवहारिक पहलू का विश्लेषण से ऐसा कहना तर्क संगत है कि शक्ति (नारी) की पूजा बिना हम और हमारे कर्मकांड अधूरे हैं.

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