संसदीय गरिमा तार - तार By संजय त्रिपाठी Parliamentary dignity wire - wire



 
 
                                                               संपादकीय 
संसद के शीतकालीन सत्र के 18 दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गई । अब भी गतिरोध दूर होने का दूर तक कोई संकेत नहीं मिल रहा है । आज राष्ट्रपति का पीड़ा उभर कर सामने आया, वहीं कल बीजेपी के ‘ चाण्यक्य ’ लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी व्यथा को व्यक्त करते हुए सिर्फ संसदीय कार्यमंत्री को ही दोषी नहीं ठहराया,  बल्कि लोकसभा अध्यक्ष पर भी उंगली उठाया ।  उन्होंने गुस्से में इतना तक कह डाला कि शीतकालीन सत्र को अनिश्चितकाल तक स्थगित कर दिया जाए । 
नोटबंदी पर संसद में उठा हंगामा शांत होन का नाम ही नहीं ले रहा है । सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी - अपनी बात पर अड़े हुए हैं । एक तरफ विपक्ष की मांग है कि प्रधानमंत्री मोदी सदन में आकर इस मसले पर अपनी जवाब दे, तो दूसरी ओर सत्ता पक्ष इस पर चर्चा करने पर जोर दे रहा है । देश की आज की स्थिति और उस पर संसद की भूमिका को समझने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी हालात से चिंतित होगा । आज राष्ट्रपति भी इस मुद्दे पर असहज नजर आए । उन्होंने रक्षा संपति संगठन की एक बैठक में अपनी चिंता को जाहीर करते हुए कहा कि संसद को बाधित किया जाना कतई स्वीकार नहीं है । संसदीय स्वतंत्रता का गलत फायदा नहीं उठाना जाना चाहिए ।  बहुमत को गतिरोध पैदा करने में शामिल नहीं होना चाहिए । लेकिन बहुमत अभी बहुमत नारे लगाने, संसद की कार्यवाही बाधित करने और ऐसी परिस्थितियां पैदा करने में जुटा है कि संसद ना चलने पाए । उनहोंने यहां तक कहा कि ईश्वर के लिए अपना काम करे , आप संसद में कामकाज चलाने के लिए हैं । संसदीय प्रणाली में गतिरोध कतई स्वीकार नहीं है । नेताओं का चुनाव इसलिए नहीं होता कि वे संसद में धरना पर बैठे। राष्ट्रपति की यह पीड़ा भी संसदीय प्रणाली में पैदा हुए गतिरोध का ही नतीजा है । उनके पीड़ा भी तीन सप्ताह संसद की कार्यवाही बाधित होने के कारण ही उजागर हुई है । दो वयोबृद्ध नेताओं की यह टिप्पणी वास्तविक में हमारे संसदीय व्यवस्था की तार - तार होती गरिमा के तरफ इशारा कर रहा है । 
भारतीय राजनीति में आडवाणी के कद और अनुभव के मध्येनजर उनकी बातों को हल्के में नहीं लेना चाहिए । उन्होंने दोनों पक्षो को जिम्मेदार ठहराते हुए ऐसी स्थिति पर खीन्नता प्रकट कर यह साफ संकेत दिया है कि इस तरह का व्यवहार संसद के गरिमा के अनुरूप नहीं है । उन्होंने विपक्ष के पक्ष में सहमति नहीं जताई है, लेकिन सत्ता पक्ष को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है । अब तक संसद की कार्यवाही बाधित होती है तो विपक्ष को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है । मगर इस बात की अनदेखी कर दिया जाता है कि विपक्षी दलों  को किसी बात पर अडने के पीछे कारण क्या है , साथ ही इसके लिए सत्ता पक्ष की कोई जवाबदेही बनता है या नहीं । फिलहाल नोटबंदी की अचानक घोषणा के बाद से समूचे देश में जो संकट खड़ा हुआ है उसके लगातार गहराते जाने के मद्देनजर विपक्ष की इस मांग को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री इस मसले पर सदन में बयान दें। इस मांग के पीछे आधार यह हो सकता है कि जब मुद्रा से संबंधित नीतिगत फैसले की घोषणा करना पारंपरिक रूप से रिजर्व बैंक का काम माना जाता रहा है, तो प्रधानमंत्री के स्तर से यह निर्णय और इसकी घोषणा होने की नौबत क्यों आई! 
आज पूरे देश में अचानक नोटबंदी के बाद अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है । करीब 95 लोगों को यह नोटबंदी अब तक लील गई है । बैक में जमा अपना पैसा निकालने के लिए लोग दर -दर की ठोकरे खाने के लिए मजबूर हैं । लोगों के पास नगदी न होने के कारण समूचे बाजार का कारोबार चैपट हो गया है । कई छोटी फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं और कुछ बंद होने के मुहाने पर खड़ी हैं । मजदरों की छटनी की जा रही है, लोग शहर जिस उम्मीद से आए थे अब मायूस होकर एक बार फिर गांव के तरफ लौट रहे हैं । बैंको में लगातार मनमानी जारी है । अभी भी बहुत लोग हैं जिनका पुराना 500 और 1000 का नोट बैंक में जमा नहीं हो पा रहा है क्योंकि वहां भारी भीड़ लगी हुई है । सबसे बुरा हाल स्टेट बैंक आॅफ इंडिया का है । ऐसी स्थिति में यह सवाल संभाविक है कि बिना तैयारी के नोटबंदी का फैसला आखिर सरकार लाई क्यों ? अगर लाई तो इन समस्याओं से नपटने के लिए सरकार अब क्या कर रही है । भ्रष्ट तरीके से कमाया हुआ धन पर काबू पाने के कार्य से कोई भी असहमत नहीं होगा । लेकिन जो हालात आज पैदा हुए है वैसी स्थिति में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों का यह दायित्व बनता है कि संसद की गरिमा को ध्यान रखते हुए इसे चलाया जाए , साथ ही उपजी समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाए । 
संजय त्रिपाठी 

     





Share on Google Plus

0 comments:

Post a Comment