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| अजय कुमार |
भारतीय राजनीति का एक छिपा हुआ सिद्धांत यह भी है कि अगर आपका अपना फायदा न हो तो दूसरे का नुकसान तो किया ही जा सकता है। शायद इसी थ्योरी पर मुलायम सिंह यादव आगे बढ़ रहे हैं। उन्हें इस बात का अच्छी तरह से अहसास है कि अगर उन्होंने पुत्र अखिलेश के सामने सरेंडर नहीं किया तो उनका जो बुरा हुआ सो हुआ अखिलेश के लिये भी सत्ता की राह मुश्किल हो सकती है। मुलायम खेमा जानता है कि अखिलेश विकास का लाख ढि़ंढोरा पीटें, लेकिन यूपी में चुनाव सिर्फ विकास के सहारे नहीं जीते जा सकते हैं। यहां जातपात का भी गणित देखना होता है और जब बात जातिवादी सियासत की चलेगी तो कम से कम मुसलमानों का भरोसा अखिलेश से अधिक मुलायम पर होगा। मुलायम ने एक नहीं अनेकों बार यह साबित किया है कि मुसलमानों के दिल में रहते हैं। कहने को आजम खान जैसे मुस्लिम नेता अखिलेश के साथ हैं, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजम के विवादास्पद बयानों से जितना हिन्दू वोटर आहत होते हैं, उतने ही मुस्लिम नेता भी आजम के नाम से चिढ़ते हैं। आजम भले ही अपने आप को मुसलमानों का नेता मानते हों, लेकिन मुसलमानों ने आजम को कभी यह रूतबा नहीं दिया। मुलसमान वोटर अगर यह समझता है कि बाप−बेटे की लड़ाई में उनका अहित हो सकता है तो वह बसपा की तरफ जाने से भी नहीं हिचकिचायेगा। 2007 में मुस्लिम मतदाता ऐसा कर भी चुके हैं। अबकी बार मायावती ने मुसलमानों को टिकट देने में भी खूब दरियादिली दिखाई है। इतने टिकट तो दलितों को नहीं मिले जितने मुसलमानों में बांट दिये गये।
सपा का मजबूत वोटर यादव भी पूरी तरह से नेताजी का साथ नहीं छोड़ता दिख रहा है। इस बात की बानगी मुलायम के गृह जनपद इटावा में सपा जिला कार्यालय पर कब्जे की जंग के दौरान देखने को मिली। यहां अखिलेश गुट की मुलायम−शिवपाल खेमे के नेताओं के जर्बदस्त विरोध के चलते दाल नहीं गल पाई। कहा जाता है कि मुलायम ने अखिलेश को आगाह भी किया था कि जो लोग उनके साथ खड़े हैं, वह सब के सब उनके प्रति वफादार नहीं हैं। सत्ता जाते ही इसमें से काफी लोग मुंह मोड़ सकते हैं। इस बात का अहसास अखिलेश को भी है लेकिन उनके सामने मजबूरी यह है कि वह अब इतना आगे निकल चुके हैं जहां से लौटना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। अखिलेश को लेकर अगर मुलायम ने एक भी विवादास्पद बयान दे दिया तो पूरे चुनावी समर के दौरान अखिलेश सफाई देते रह जायेंगे। फिर वह चाहे कांग्रेस से हाथ मिलायें या फिर रालोद से, सत्ता हासिल करना उनके लिये आसान नहीं होगा। अखिलेश गुट के कहने पर सपा के जो खाते बैंक द्वारा फ्रीज किये गये हैं, उसे भी संभवतः अब आसानी से खुलवाया नहीं जा सकेगा क्योंकि अगर इन बैंक खातों से मुलायम गुट के हित नहीं सधेंगे तो वह इसका प्रबल विरोध करने से चूकेंगे नहीं। इस बात का अहसास शिवपाल यादव बैंकों को खातों का संचालन रोकने संबंधी पत्र लिखकर करा भी चुके हैं। ऐसे में चुनाव के लिये धन जुटाना दोनों ही गुटों के लिये आसान नहीं होगा।
यह तय मानकर चलना चाहिए कि भले ही अखिलेश में युवा जोश कूट−कूट कर भरा हो, मगर मुलायम का अनुभव भी कम मायने नहीं रखता है। वह अपने सियासी दांव से समय−समय कई धुरंधरों को जमींदोज कर चुके हैं। बात अगर पुत्र की न होती तो शायद अभी तक मुलायम ऐसे कई तीर छोड़ चुके होते जो उनके सियासी तरकश में पड़े हुए हैं। भले ही अखिलेश अपने को विकासवादी बता रहे हों, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि बाप−चचा से बगावत करने वाले अखिलेश ने अपनी बढ़ी हुई ताकत की नुमाइश करने के चक्कर में कई दागियों को गले लगा लिया है, जिनसे पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा। इसीलिये शायद नेताजी के मुंह लगे अमर सिंह मीडिया के सामने यह कहते देखे गये कि जो लोग नेताजी ओर शिवपाल के साथ खड़े होते समय दागी थे तो वह अखिलेश खेमे से जुड़ने के बाद बेदाग कैसे हो सकते हैं। अभी तो बात साइकिल चुनाव चिन्ह पर ही अटकी हुई है, लेकिन जब यह पूरी तरह से तय हो जायेगा कि सपा परिवार में सुलह नहीं हो सकती है, तब अखिलेश के लिये निर्विवाद रूप से टिकट बांटना आसान नहीं होगा, जिसको टिकट नहीं मिलेगा वह पलटी मारकर मुलायम खेमे में जाने में देरी नहीं करेगा। अगर अखिलेश गुट और कांग्रेस के बीच समझौता हो जाता है तो इससे भी अखिलेश गुट के कुछ नेता टिकट न मिलने की दशा में अपना कैरियर बचाये रखने के लिये पाला बदल सकते हैं। इसके अलावा कई छोटे−छोटे मुस्लिम राजनैतिक दल और नेता भी हैं जो अखिलेश के साथ दाल नहीं गलने पर मुलायम की समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन कर सकते हैं। इसमें अतीक अहमद जैसे नेताओं, पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल जैसे दलों के अलावा कौमी एकता दल का भी नाम शामिल हो सकता है जिसको लेकर बाप−बेटे के बीच तलवारें खिंची हुई हैं।
हालात यह हैं कि समाजवादी परिवार में चल रही कलह का असर प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं पर भी दिखने लगा है, जो प्रत्याशी अखिलेश और शिवपाल दोनों की लिस्ट में शामिल हैं, उन्हें तो खास दिक्कत नहीं है, लेकिन जिन जगहों पर दोनों ने अलग−अलग प्रत्याशी उतारे हैं, उनकी परेशानी काफी बढ़ी हुई है। अखिलेश या मुलायम खेमे से चुनाव लड़ने जा रहे प्रत्याशियों की परेशानी यह भी है कि जिस समय बड़े नेताओं के साथ उन्हें चुनावी मैदान में होना चाहिए, उस समय वह लखनऊ में पड़े हुए हैं। जिन प्रत्याशियों का नाम अखिलेश और मुलायम दोनों गुट की चुनावी लिस्ट में है उनको तो कोई खास परेशानी नहीं आ रही है, लेकिन जिनका नाम एक गुट की लिस्ट में है और दूसरे की लिस्ट से नाम गायब है, वह पसोपेश में हैं। दोनों ही गुटों के कुछ ऐसे ही प्रत्याशियों को हाल फिलहाल में कहते सुना गया कि एक लिस्ट में नाम होने के बाद भी उन्होंने कोई चुनाव प्रचार नहीं शुरू किया है।
इसी तरह शिवपाल यादव की पहली लिस्ट में उम्मीदवार घोषित किए गए प्रत्याशी बताते हैं कि जनता के बीच किसके नाम पर जाएं, यह समझ में नहीं आ रहा है। टिकट की आस लगाए बैठे कई मौजूदा विधायक भी कहते हैं कि अगर यही स्थिति रही, तो चुनाव लड़ना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि बूथ लेवल तक का कार्यकर्ता पसोपेश में है। विवाद के चलते प्रत्याशी बैनर−पोस्टर तक नहीं छपा पा रहे हैं। उन्हें यही नहीं पता है कि पोस्टर में कौन चेहरे और क्या चुनाव चिन्ह दिखाना है।
लब्बोलुआब यह है कि एक तरफ सुलह की कोशिश हो रही है तो दूसरी तरफ सपा परिवार में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। अखिलेश गुट ने यह मन बना लिया है कि वह अलग रहकर ही चुनाव लड़ेंगे, परंतु ध्यान इस ओर भी दिया जा रहा है कि सपा में बंटवारे का ठीकरा उनके सिर न फोड़ा जाये, इसीलिये सुलह की कोशिशों का ड्रामा किया जा रहा है। 06 जनवरी को मुलायम ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस बुलाकार सुलह−समझौते के ड्रामे का पटाक्षेप करने का मन बना भी लिया था, लेकिन आजम के कारण यह पत्रकार वार्ता बाद में रद्द कर दी गई थी। इसके बाद अमर सिंह ने पत्रकारों से अनौपचारिक भेंट के दौरान अखिलेश और उनके गुट के नेताओं की नीयत पर इशारों ही इशारों में कई सवाल खड़े किये थे। इस मौके पर अमर के साथ शिवपाल यादव भी मौजूद थे।




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