श्रीराम को हम भगवान कह कर पूजते हैं और उनके सामने नत मस्तक होते हैं, लेकिन जव सीता माता को भ्राता लक्ष्मण द्वारा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ कर आने की बात राम द्वारा की जाती है तो हम उसी भगवान को अपराधी के कठघरे में खड़़ा करने में नहीं चूकते। यह कैसा प्यार है इंसान का भगवान के साथ ? कह देते हें कि एक धेाबी के तायने से आहत होकर भगवान राम ने माता सीता को त्याग दिया था। और माता सीता को अपनी अग्नि परीक्षा तक देनी पड़ी थी। यह कैसा विचित्र प्यार है हमारा अपने भगवान के प्रति ? यह बात कतई सच नहीं है।
सच तो यह है कि माता सीता का जीवन बड़ा ही त्याग मयी था। उनके जीवन में बड़ा कौतुक होता रहा है। जव माता अयोघ्या आ गयीं तो माता के गर्भ स्थल में एक जीवन का उदय हो गया। तव यह जान कर भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि भ्राता लक्ष्मण तुम सीता को महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में छोड़ आओ। मैं चांहता हूं कि सीता का पोषण महर्षि के आश्रम में होना चाहिये। उन्होंने कहा कि मैंे चांहता हूं कि राष्ट्र को ऊंचा बनाना है। राष्ट्र के निर्माण में माताओं का सहयोग होना चाहिये क्योंकि उनके गर्भ से एक महान तपस्वी का जन्म होना चाहिये । जिससे राष्ट्र तपस्वियों का बने , पद की लोलुपता वालों का न हो। इस अवधारण से माता सीता को वन में महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में त्यागा गया था।
महर्षि बाल्मीकि ऐसे ऋर्षि थे जो आर्युवेद के मर्म को जानते थे। वे जानते थे कि किस मास में कौनसा अन्न, कैसा भोजन,किस प्रकार की औषधि का सेवन करना चाहिये। रामजी ने यह सब विचार कर लक्ष्मण से कहा था कि हे लक्ष्मण तुम जाओ और सीता को महर्षि बालमीकि के आश्रम में छोड़कर आओ, वहां नदी का तट है उसी पर स्वच्छ वायुमंडल में बालक को सीता जन्म देगी तो उस तपस्वी बालक से राष्ट्र का कल्याण होगा। यहां यह बतला दें कि पुरातन समय में यह परम्परा से मर्यादा थी कि बालक का जन्म ऋषि मुनियों के द्वार पर आर्युवेदाचार्यों के गृह में होता था,जहां वातावरण शुद्ध हो। वहीं पर बालक बड़ा होकर अस्त्र- शस्त्र आदि की शिक्षा पाता था।
कुछ काल के बाद आश्रम में एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम लव रखा गया। कुछ समय के पश्चात ब्रहति नाम के एक ब्रह्मचारी महर्षि सुरंधित के आश्रम में पधारे। महर्षि सुरंधति के एक कन्या थी जिसका नाम सुमित्रा था। ब्रह्मचारी और सुमित्रा ने एक दूसरे को देखा और उनके अंदर कुछ दोष आ गया। दौनों के संयोग से सुमित्रा गर्भवती हो गयी। उसने कुछ समय बाद एक बालक को जन्म दिया और वह उस बालक को जन्म देकर उसने महर्षि बाल्मीकि के आश्रम के पास एक कुशा पर दिया। सुमित्रा बालक को वहां कुश के आसन पर रख कर अपने पिता के यहां बापस चली गयी।
जव माता सीता स्वच्छ जल लेने के लिये नदी पर गयीं तो उन्हें कुशा पर विराजमान यह बालक मिल गया और उन्होंने इस बालक को अपने गले से लगा लिया। बालक को लेकर माता सीता ऋषि के पास आयीं और सारी बात उन्हें बतायी। महर्षि बाल्मीकि ने कुशा पर मिले इस बालक का नाम कुश रख दिया। इस तरह लव और कुश नाम के दो बालक माता सीता के हो गये।
सत्यपाल सिंह चैहान।




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