'एक समान कर' से देशवासी बँधे एकता के राष्ट्रीय सूत्र में By तरुण विजय In the national formula of unity, the 'nation tax'




 तरुण विजय
अगर क्षण सही पकड़ लिया तो नेतृत्व कामयाब है वरना लकीर के फकीर तो आते हैं और बिना पद छाप छोड़े चले जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में जगे तो प्रार्थना साधना हो जाती है वरना जप सारा दिन करते रहो उसे सिर्फ जपना ही कहा जाता है। नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली ने जीएसटी विधेयक पारित करवाकर देश के मुहूर्त को पकड़ लिया और कर की चोरी से ग्रस्त भारत कर पर्व मना बैठा।

हर नई चीज के प्रति आशंकाएं, दुविधाएं, संदेह बने ही रहते हैं। विमुद्रीकरण के बारे में भी ऐसा ही कहा गया। जनता ने उसे पूरे दिल से स्वीकारा क्योंकि उसे लगा कि बेहद अमीर भ्रष्ट लोगों के खिलाफ यह करारा वार है। संभवतः बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले नेता थे जिन्होंने विमुद्रीकरण का समर्थन किया। उन्होंने सही वक्त पर जनता के मन को भांपा। मैंने पहले भी कहा कि नीतिश कुमार ने राजनीतिक जोखिम लेकर क्षण पकड़ा और नशाबंदी लागू की। आज निरंतर बौने होते जा रहे विपक्ष में सबसे कद्दावर और राष्ट्रीय छवि वाले कोई नेता उभरे हैं तो वह सही काम के लिए अपने जिद्दीपन और क्षण पकड़ने की कुशलता के लिए जाने गए नीतिश कुमार हैं।

जैसे धर्म के ताने बाने देश के एक छोर को दूसरे से बांधते हैं- अरुणाचल में परशुराम कुंड और द्वारिका में कृष्णा, कश्मीर में अमरनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम, वैसे ही भारत का संविधान देश की एकता का बड़ा सूत्र है। हम कहीं भी रहें, कुछ भी करें, अहर्निश हम सबको संविधान के तले ही काम करना होता है- वही हमें बांधता है और जो भी संविधान के प्रति अवमानना का भाव लेकर चलता है उसे देश अस्वीकार करता है। भारत में मुद्रा और कर प्रणाली भी सबको इसी संविधान के अंतर्गत एक राष्ट्रीय सूत्र में बांधती है। विमुद्रीकरण के बाद की स्थिति हमने देखी ही है। मीडिया और विपक्षी जनसंपर्क दफ्तरों में तनिक हायतौबा हुई पर अन्ततः पूरा देश एकता के मौद्रिक सूत्र में बंध गया। कर प्रणाली का कुछ ऐसा विद्रूप एवं विखंडन वादी स्वरूप रहा कि लोग कर देने से बचना अपनी नागरिकता का बेहतर पक्ष मानने लगे- दुरूह प्रणाली, कर अधिकारियों का सताने वाला व्यवहार और इतनी जटिलता कि ईमानदार तौबा कर ले।

यदि पूरा देश एक है, जन एक है तो कर प्रणाली भी क्यों नहीं एक जैसी होनी चाहिए? एक कहावत थी कि भारत में हर दो कोस पर पानी और दस कोस पर भाषा बदल जाती है। क्या वैसा ही कर प्रणाली के लिए चल सकता है कि प्रदेश की सीमा लांघते ही कर प्रणाली बदल जाए? इसका गलत प्रभाव व्यापार, उद्योग तथा पूंजी निवेश पर होता रहा है। केवल भारतीय व्यापारी ही नहीं, विदेशी पूंजी निवेशक भी बरसों से जीएसटी विधेयक पारित होने का इंतजार कर रहे थे।

विमुद्रीकरण और चुनावों में शानदार विजय के बाद जीएसटी विधेयक पारित कर नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली ने दुनिया में भारत के सशक्त उद्देश्य केंद्रित और निर्णायक नेतृत्व की धमक बैठा दी है। राज्यसभा में जिस विपक्ष ने इस विधेयक का तथाकथित विरोध करते हुए कुछ संशोधन पारित करवा लिये वह हास्यास्पद और खिसियाने लोगों की खीझ मात्र है।

सब जानते हैं कि यह कदम राष्ट्र के चरम हित में है फिर भी इसे पारित करते में भारतीय विधि निर्माताओं यानी कि सांसदों को सत्रह वर्ष का समय लगा। अपना वेतन बढ़ाने या अपने नेता पर डाक टिकट छपवाने में तो वे इतना लम्बा समय नहीं लगाते। अब सोचिए कि सन् 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी ने एक उच्च स्तरीय समिति बनायी थी जिसे जीएसटी यानी वस्तुओं और सेवाओं पर कर का आदर्श ढांचा और उसे लागू करने के लिए निम्नतम स्तर तक की प्रणाली एवं व्यवस्था का प्रशासनिक शिल्प देने की जिम्मेदारी दी गयी। यह सब हो गया। अटल जी के बाद कांग्रेस नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी और 28 फरवरी 2006 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने सदन में घोषित किया कि जीएसटी प्रणाली 1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में लागू कर दी जाएगी।

पर उन्होंने क्षण पकड़ा नहीं मुहूर्त गंवा दिया। कांग्रेस नीत शासन के पूरे दस साल देश ने ठहरे हुए पानी के मानिंद गंवा दिए। हर दिन घोटाले, आपसी झगड़े, लूट की बंदरबांट, नेतृत्व की दिशाहीनता और नीतियों पर अनिर्णय से गुजरता रहा। यह देश भले, भद्र, तेजस्वी नागरिकों का देश है पर सदा नेतृत्व ही उसे फेल करता रहा।

अब जीएसटी एक नयी कर प्रणाली से आर्थिक उछाल को बल देगा। केंद्र और राज्य सरकारों में राजस्व के वितरण का जो ढांचा सर्वानुमति से तय हुआ है उससे राज्यों की हजारों करोड़ रुपए अतिरिक्त आय होगी, प्रशासनिक बोझ कम होगा, सार्वजनिक योजनाओं के लिए उन्हें अपनी पैसा मिलेगा, केंद्र की ओर नहीं देखना पड़ेगा।

विश्व में सबसे कम संख्या में करदाता भारत में हैं। केवल 3.7 करोड़ करदाता जिन्होंने रिटर्न भरे, उनमें से 2.94 करोड़ या तो कर देने की सीमा रेखा यानी 2.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष से अपनी आय कम दिखाते हैं या कम से कम कर देने वाले वर्ग 2.5 लाख से 5 लाख रुपये प्रति वर्ष आय से खुद को रखते हैं। जबकि यही नागरिक साल में दो करोड़ कारें खरीदते हैं, 1 करोड़ 25 लाख विदेश यात्रा पर जाते हैं, लेकिन कर नहीं देना चाहते।

जीएसटी आम आदमी की जिंदगी से कर का भय हटाएगा ओर कुल जमा गरीबी उन्मूलन में इसका सबसे बड़ा असर होगा। जीएसटी से तुरंत व्यापार में वृद्धि होगी, राज्य सरकारों का राजस्व बढ़ेगा और बहुत बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर खुलेंगे। सरलीकृत कर प्रणाली से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश बढ़ेगा तथा देश की विकास दर में वृद्धि होगी।

विकास के लिए यदि जोखिम और कठोर निर्णय लेने का साहस नहीं तो नेतृत्व समाज और देश को विफल करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिम्मत और हौसले से आर्थिक मोर्चे पर जो कठोर निर्णय लिए हैं, वे भारत के भविष्य के लिए शुभ हैं।

 तरुण विजय




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