पत्थरबाजों से सख्ती से निपटना होगा ! By संजय त्रिपाठी Stoneers will have to deal strictly!



 संजय त्रिपाठी 
आज जम्मू और कश्मीर में जो हालात  है वास्तविक में यह केद्र सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है। खासतौर से यह भारतीय फौज की प्रतिष्ठा धूमिल करने की एक गहरी चाल है । फौज द्वारा इन पत्थरबाजों पर जवाबी कार्रवाई मानवाधिकार का उल्लंधन कहा जायेगा, लेकिन अब पानी सर के उपर से गुजरने लगा है । ऐसे में केंद्र सरकार को कोई ठोस कदम उठाना पड़ेगा, जिससे घाटी का माहौल शांत हो सके । अगर समय रहते इस ला-इलाज बीमारी को काबू नहीं किया गया तो यह अपना प्रभाव पूरे भारत में फैलाना शुरू कर देगा और अंत में देश के एक हिस्से का बड़ा आॅपरेशन करना हमारी मजबूरी बन जायेगी । 
‘ धरती का स्वर्ग ’ कहे जाने वाला कश्मीर आज ‘ नरक ’ से भी बद्त्तर बन गया है । जहां 1990 से पहले सैलानियों की भरमार होती थी, वहां आज लोग आने से डरते है । भारत का यह अभिन्न अंग जिस पर देश गर्व करता था, आज लहूलुहान पड़ा है । यहां के युवा अलगाववादी  व कट्टरपंथियों के बहकावे में आकर देश के मुख्यधारा से जुड़ने के वजाय अपने हाथों में पत्थर थाम लिए हैं । पहले जम्मू- कश्मीर के निवासी अपनी कलाकृतियों व उत्पादनों से लोगों को अपने तरफ आकर्षित करते थे । यहां का सबसे बड़ा यह व्यवसाय था जिससे इनकी अच्छी रोजी रोटी का जरिया सुलभ हो जाता था । कहा जा रहा है कि आज यहां के लोगों को अपनी रोजी - रोटी चलाने के लिए पत्थरबाजी का रास्ता चुनना पड़ता है । अलगाववादी और कट्टरपंथी नेताओं ने युवाओं, छात्रो और अब हिजाब में छिपी लड़कियों को भी गुमराह कर उनसे भारत के फौजियों पर पत्थर फैंकने का काम सौंप दिया है । इसके लिए बकायदा इन्हें एक रकम दी जाती है । जानकार लोगों की माने तो यहा भारत के खिलाफ हर कार्यवाई करने जैसे भारत विरोधी नारा लगाने, पाकिस्तानी झंण्डा फहराने, जूलुस में शामिल होने तथा फौजियों पर पत्थर फेंकने जैसे कार्यो के लिए अलग - अलग रकम तय किया गया है । यहां के लोग उन रकम को पाने के लिए भारत के खिलाफ हर कार्रवाई करने को तैयार है । 
केद्र सरकार को ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई ठोस नीति बननी होगी साथ ही कुछ ऐसी कदम भी उठानी होगी जो नियम से अलग जा कर हो । देश की रक्षा के लिए फौज है । फौज अपनी शक्ति कुछ नापाक इरादों के खिलाफ घरेलू जंग में ही समाप्त कर देगी, साथ ही उसे कई तरह के अपमान के घुट भी पीने होगें तब ऐसी हालात में वह देश की रक्षा कैसे कर पायेगी । गुमराह लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए क्या उपाय करना होगा, इस पर सरकार चिंतन करे और फिर उस पर अमल करें, लेकिन विश्व स्तर पर हमारे फौजियों की गरिमा पर आंच नहीं आनी चाहिए । सभी जानते हैं कि हुर्रियत नेताओं की फितरत है कि वे कश्मीरी लोगों को भड़का कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में बाधा डालने का प्रयास करते हैं। यह भी छिपी बात नहीं है कि वे पाकिस्तान के इशारे पर घाटी में अशांति बनाए रखना चाहते हैं। मगर इस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनसे बातचीत जारी रख कर घाटी का माहौल सामान्य करने में मदद मिलती है। इस पर भी हमें आगे बढ़ना चाहिए, पर देश की अस्मिता और सम्प्रभुता को गिरवी रख कर नहीं । 
कभी - कभी सरकार को अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए ऐसे निर्णय भी लेने पड़ते हैं, जिससे मानवता भी थरर्रा जाती है । इसका उदाहरण जपान का हिरोशिमा और नागासाकी है । लंका पर चढ़ाई के दौरान भगवान राम को तीन दिन तक समुन्द्र से रास्ता मांगने के लिए याचना करनी पड़ी थी, लेकिन मूढ समुन्द्र को याचना की भाषा समझ में नहीं आई । हमारे हुक्मरानों को भी यह समझना होगा कि अब जम्मू - कश्मीर के आवाम और उनका सरपरस्त बन रहा पाकिस्तान को याचना या रण किससे समझाना होगा । यहां मैं डा. राजेश्वर उनियाल की पंक्तियां उद्धृत कर रहा हूं - 

”बहुत उड़ा चुके शांति के कबूतर
अब चलो कुछ हथगोले बनाएं
बात करता है पड़ोसी जिसमें
उसे उसी भाषा में समझाएं
नहीं हौंसले ये टूटेंगे
नहीं बर्बाद यों होंगे
अगर वो रात फिर आई
तो सरहदें हम बदल देंगे।”

 संजय त्रिपाठी 




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