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| संजय त्रिपाठी |
‘‘ मुख में जीभ, शक्ति भुज मे, जीवन में सुख का नाम नहीं ।
वसन कहां, सुखी रोटी भी , मिलती सुबह व शाम नहीं ।। ’’
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां सन् 84 में हाई स्कूल में पढ़ने को मिला था । उस समय किसानों की ऐसी दशा पढ़ आखों से आंसू आ गए थे । आज किसानों की दयनीय हालात देख कर दिल कांप उठता है । 21 वीं सदी के तरफ हम बढ़ रहे हैं, लेकिन किसानों की हालत आज भी बद् - से - बद्त्तर ही है । कृषि प्रधान देश भारत में किसानों की आत्महत्या में बढोतरी चिन्ता का विषय बनता जा रहा है । आज भारत विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा होने के लिए ललायित है, लेकिन जिससे देश को विकास का धार मिलना है वह कृषि मरणांसन के तरफ बढ रहा है । दिन - पर - दिन किसानों की आत्महत्या की संख्या बढ़ रही है, लेकिन केंद्र सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही । 2010 से अब तक करीब 77 हजार किसान खेती कार्य को त्याग दिए हैं ।
मध्यप्रदेश में सोमवार को भी फिर तीन किसानों ने खुदकुशी कर ली । इससे पांच दिन पहले भी तीन किसानों ने आत्महतया की थी । आखिर यह खुदकुशी की कड़िया कब तक जुड़ती रहेगी ? क्या कोई इन काल के गाल में समाते जा रहे किसानों की सुध भी लेगा या इसी तरह देश के किसान खुदकुशी - दर - खुदकुशी करते रहेगें । मध्यप्रदेश में एक सप्ताह के अंदर 6 किसानों की खुदकुशी का मामला बेहद गंभीर है क्योंकि हाल ही में वहां किसानों के आंदोलन से उभरे तल्ख सवालों के प्रति सरकार की लपरवाही साफ झलक रही है । लंबे समय से किसानों की मांगों को सरकार अनदेखी करती आ रही है, लेकिन जब किसान अपनी मांग को लेकर सड़क पर उतरे तो गोलिया चलाकर उन्हें चुप करने का प्रयास किया गया । इसमें भी छह किसानों को पुलिस की गोलियां हमेशा के लिए चुप कर दी । इस घटना के बाद जनता में फैल रही गुस्सा को देखते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कई घोषणाएं की और उपवास रख किसानों के घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया । कुछ दिनों के भीतर ही छह किसानों की मौत यह स्पष्ट कर देता है कि राज्य सरकार को इन किसानों के प्रति कितनी हमदर्दी है और इनकी समस्याओं को लेकर कितनी चिंता । अब सवाल यह उठता है कि राज्य में या तो किसान आत्महतया कर ले या पुलिस की गोली से मारे जाए ।
सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि एक तरफ किसान अलग - अलग तरीकों से जान गवां रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में भाजपा के बरिष्ठ नेता कैलास विजयवर्गीय यह कह रहे हैं कि ये मोतें कर्ज से नहीं, बल्कि परिवारिक परेशानियां या अवसाद के कारण हुई हो सकती हैं । राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के आंकड़े के अनुसार मध्यप्रदेश में पिछले 9 सालों के दौरान ग्यारह हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं । तब प्रश्न यह उठता है कि क्या इन सभी मौतों की वजहें निजी या परिवारिक हालात ही मान लिया जाए ? यह गैरजिम्मेदारी और संवेदनहीनता का ही उदाहरण है । इससे पहले भी जब मंदसोर में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से छह किसनों की मौत हो गई थी, तब भी सतारूढ भाजपा और प्रशासन ने गोली चलाने की घटना से इंकार करती रही । लेकिन जब यह मामला दबाना और छिपाना मुश्किल हों गया तब सरकार ने स्वीकार किया कि पुलिस ने गोली चलाई थी ।
सभी जानते हैं कि ये हालात किसी अचानक उपजी समस्या का नतीजा नहीं हैं। सालों से घाटे में जाती खेती, बढ़ते कर्ज का बोझ और फसलों के लिए उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाने जैसी कई समस्याओं से दो-चार हो रहे किसानों का गुस्सा आखिरकार सड़क पर फूटा। लेकिन सरकार ने इसके जवाब में जो कदम उठाया यह किसी से छिपा हुआ नहीं है । चुनाव से पहले किसानों के मुद्दों को जोर - शोर से हल करने की बात मंचों के माध्यम से कहे गए, लेकिन जब किसान इसकी याद दिलाने के लिए सड़क पर निकले तो उनका स्वागत गोलियों से किया गया । सबसे दुखद पहलू यह है कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने साफ लहजे में कहा कि किसानों की कर्जमाफी की व्यवस्था राज्य सरकारें अपने स्तर पर करें । उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि केंद्र सरकार किसानों का ऋण माफ करने पर विचार नहीं कर रही है । सरकार के समक्ष किसानों का कर्ज माफ करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है । इधर किसानों की कर्ज माफी की मांग विभिन्न राज्यों से उठ रही है । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य में भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) की सरकार बनने पर किसानों का ऋण माफ किए जाने का वादा किया था ।
भाजपा शासन में पहली बार किसानों को कर्ज माफी का टाॅफी देकर बहलाने का काम नहीं किया गया है, बल्कि इससे पहले भी उन्हें कई बार वोट व अपने फायदे का मोहरा बनाया गया है । महाराष्ट्र के विदर्भ में किसानों को नया मंत्र देते हुए पूर्व भाजपा अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने उस समय नारा दिया था कि - ‘ मिर्ची - धान छोड़ो, गन्ना उगाओं ........ ज्यादा पाओ। ’ इसके पीछे विदर्भ भंडारा के उमरेड ताल्लुका में पूर्ति साखर कारखाना ( शुगर फैक्टरी ) लगने के बाद यह नया मंत्र दिया गया था । यानी जो किसान उस समय खुले बाजार में मिर्ची और धान बेचकर दो जून की रोटी का जुगाड़ किसी तरह कर पा रहे हैं, वह गन्ना उगाकर कैसे पूर्ति साखर कारखाने से मजे में दो जून की रोटी पा सकते हैं, इसका खुला प्रचार भंडारा में उस दौरान किया गया । आप देख सकते है कि विदर्भ के किसानों को गडकरी के चार कारखानों के कारण पानी को लेकर किस तरह के संकेट झेलने पड़े हैं । हमेशा से किसानों को कई तरह से नेताओं के दोहरी मार ढेलने पड़े हैं । याद होगा 2006 का वह मामला जब विलासराव देशमुख महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री रहते हुए एक विवादास्पद सूदखोर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने दी, जो उस समय के कांग्रेस के एक विधायक के पिता है । देखा जाए तो भारत में किसान आत्महत्या 1990 के बाद पैदा हुई स्थिति है । सबसे पहले ये खबर महाराष्ट्र से आई । इसके बाद प्रतिवर्ष दस हजार से अधिक किसानों के आत्महत्या की रपटे दर्ज की गई है । एक आंकड़े के मुताबिक 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की । भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है तथा मानसून की असफलता के कारण नगदी फसलें नष्ट होना किसानों के द्वारा की गई खुदकुशी का मुख्य कारण माना जाता है । हालांकि मानसून की विफलता, सूखा, कीमतों में बृद्धि, ऋण का अधिक बोझ आदि परिस्थितियां समस्याओं के एक चक्र की शुरूआत करती है । यह भी देखा गया है कि बैंकों, महाजनों, बिचैलियों आदि के चक्र में फंसकर भारत के विभिन्न हिस्सों के किसानों ने आत्महत्या की है । बाद में उसी दौरान आंध्रप्रदेश से भी आत्महत्या की खबर आने लगी । शुरूआत में लगा कि अधिकांश आत्महत्याएं महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कपास उत्पादक किसानों की है । लेकिन महाराष्ट्र के राज्य अपराध लेखा कार्यालय से प्राप्त आंकड़ों को देखने से स्पष्ट हो गया कि पूरे महाराष्ट्र में कपास सहित अन्य नगदी फसलों के किसानों की आत्महत्याओं की दर अधिक रही है । यह भी देखा गया कि अत्महत्या करने वाले केवल छोटी जोत वाले किसान ही नहीं थे, बल्कि मध्यम और बडें जोत वाले किसान भी थे । उस दौरान राज्य सरकार ने इस समस्या पर विचार करने के लिए कई जांच समितियां बनाई । भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य सरकार द्वारा विदर्भ के किसानों पर व्यय करने के लिए 110 अरब रूपए के अनुदान की घोषणा की । इसके बाद के बर्षो में कृषि संकट के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ से भी किसानों की आत्महत्या करने की खबरे आने लगी । सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई थी । इन 5 राज्यों में 2009 से 2011 के बीच 17,368 आत्महत्याएं दर्ज हुई थी । सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझतले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा । देश में हर महीने 70 से अधिक किसान खुदकुशी कर रहे हैं । अधिकारिक तौर पर वर्ष 1995 से अब तक 2, 85,000 किसानों ने आत्महत्या की है ।
मध्यप्रदेश में किसानों का सरकार के खिलाफ सड़कों पर आना, महाराष्ट्र में तेज होता किसान आंदोलन, तमिलनाडु के किसानों का दिल्ली में नंगे बदन कई दिनों तक प्रदर्शन करना । साथ ही देश के कई प्रदेशों में किसान आंदोलन की सुगबुगाहट इस बात का द्योतक है कि देश के किसानों में अपनी लगातार बिगड़ती जा रही आर्थिक दशा को लेकर अंदर ही अंदर भयंकर आक्रोश व्याप्त हो रहा है । खासतौर से यह आक्रोश सरकार और नेताओं के खिलाफ ही दिख रहा है । सर्वोच्च न्यायालय ने देश में किसानों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए हाल ही में केंद्र सरकार को ऐसी घटनाओं पर विराम लगाने के लिए एक रोडमैप बनाने का निर्देश दिया था । मुख्य न्यायधीश जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सिर्फ मरने वाले किसान के परिवार को मुआवजा देना काफी नहीं है । आत्महत्या के कारणों को पहचानना और उनका हल निकालना जरूरी है । न्यायालय ने किसानों की हालात का जिक्र करते हुए कहा की अभी तक किसान बैंक से कर्ज लेता है और न चुकाने की स्थिति में वो आत्महत्या कर लेता है । सरकार किसान को मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है । लेकिन इसका हल मुआवजा नहीं है । आप ऐसी योजना बनाए जिससे किसान आत्महत्या करने के बारे में न सोचे । अगर बम्पर फसल होती है तो भी किसान को फसल के उचित दाम क्यों नहीं मिलते हैं । मध्यप्रदेश में आंदोलन के बाद लगातार छह किसानों के खुदकुशी करने के पीछे कर्ज और कर्ज न चुकाने का दबाव मुख्य रहा है । आंध्र प्रदेश में सूदखोरों का मुद्दा इतना छाया कि राज्य सरकार को सूदखोरी कानून पहले से होने के बावजूद सूदखोरी नियमन अध्यादेश 2010 में बनाना पड़ा । अगर समय रहते केंद्र सरकार उसी समय कर्ज, सूदखोर और बिचैलिए को लेकर कोई ठोस रणनीति बनाती तो शायद किसानों को इस तरह हताश नहीं होना पड़ता । किसानों के विरोध का दायरा अब और ज्यादा फैलता जा रहा है । एक तरफ सरकार कारपोरेट कंपनियों को कई तरह की राहतो का तोहफा दे रही है, वहीं किसानों के कर्ज माफी के सवाल पर पल्ला झाड़ती नजर आ रही है । आखिर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य या स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने से क्यों कतरा रही है ।
मतलब साफ है कि किसान की बरबादी तो होनी ही है । ऐसे में किसान गोली खा कर जान देने या खुदकुशी करने के लिए मजबूर ही तो है ।
संजय त्रिपाठी
tripathi.sanjay290@gmail.com




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