भेदभावपूर्ण डीयू कट-ऑफ के खिलाफ केवाईएस का प्रदर्शन - कट-ऑफ का पुतला दहन KYS demonstration against discriminatory DU cut off - effigy of cut-off combustion



ऊँचे कट-ऑफ से डेढ़ लाख से अधिक छात्रों का भविष्य अधर में
वंचित छात्रों को उच्च शिक्षा तक पहुंचाने के लिए ज्यादा सीट, कम कट-ऑफ की मांग उठायी
सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए डेप्रीवेशन पॉइंट्स स्थापित करने की भी उठायी मांग

नई दिल्ली, ( विशेष संवाददाता )  क्रांतिकारी युवा संगठन(केवाईएस) कार्यकर्ताओं ने आज डीयू प्रशासन के ऊँचे एडमिशन कट-ऑफ निकालने के कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया| कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय परिसर में कट-ऑफ का एक सांकेतिक पुतला जलाकर उसके द्वारा वंचित छात्रों से किये जा रहे भेदभाव की भर्त्सना की| कार्यकर्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने डीयू कुलपति को संबोधित ज्ञापन सौंपकर, तुरंत इस भेदभावपूर्ण एडमिशन नीति को खत्म करने का आग्रह किया| इस प्रदर्शन में सरकारी स्कूल के छात्र भी मौजूद थे, जिनको ऊँचे कट-ऑफ के कारण उच्च शिक्षा का स्वप्न छोड़ना पड़ेगा| ज्ञात हो कि यह कट-ऑफ महंगे प्राइवेट स्कूल के छात्रों के अंकों पर निर्धारित किया गया है, जिसको शैक्षणिक रंगभेद  ही कहा जा सकता है क्योंकि कट-ऑफ के माध्यम से बहुसंख्यक छात्र, जो वंचित परिवारों से आते हैं उन्हें उच्च शिक्षा से बाहर किया जाता रहा है|
ज्ञात हो किदिल्ली विश्वविद्यालय में पढने के इच्छुक सरकारी स्कूल के छात्रों को एडमिशन लेने के लिए प्राइवेट स्कूल के छात्रों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है| इस प्रतिस्पर्धा में वो ऊँचे कट-ऑफ होने के कारण हार जाते हैं और ज्यादातर छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का यहीं अंत हो जाता है| ज्ञात हो कि सरकारी स्कूल के यह छात्र ज्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर वंचित वर्ग से आते हैं और स्लम और झुग्गी बस्ती में रहते हैं| इन छात्रों को को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी उच्च शिक्षा की ज्यादा ज़रुरत है| इसके विपरीत हर साल उन्हें कट-ऑफ के नाम पर बाहर कर दिया जाता है| कार्यकर्ताओं ने सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए 10% अक्षमता निवारण रियायत अंक (डेप्रीवेशन पॉइंट्स) को लागू करने की मांग को भी उठाया|

ज्ञात हो कि इस साल 2 लाख 20 हज़ार से अधिक छात्रों ने स्नातक के विभिन्न कोर्सों के लिए आवेदन किया है, परन्तु विश्वविद्यालय में बस 56000 सीटें है जिसका मतलब है कि करीब 1,7 0,000 छात्रों को विश्विद्यालय और उच्च शिक्षा से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा| ये वही सरकारी स्कूल के छात्र हैं जिन्होंने खास्ताहाल सरकारी स्कूल व्यवस्था में पढ़ा है| ये वही छात्र है जिनका पूरा परिवार एक कमरे के घर में रहता है| ये वही छात्र हैं जो अपने परिवार में पढने वाले प्रथम पीढ़ी हैं| ये वही छात्र हैं जो SOL में एडमिशन लेने को अभिसप्त होंगे जहाँ उन्हें साल के 10-12 दिन के क्लासेज में स्नातक करना होगा| इससे यह मिथ्या भी गलत साबित होता है कि SOL में वो छात्र दाखिला लेते हैं जिन्हें कॉरेस्पोंडेंस में पढने की इच्छा होती है| इसके विपरीत ये वो छात्र होते हैं जिन्हें कट ऑफ के नाम पर विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है|  यह एक तथ्य है की दिल्ली विश्विद्यालय ने पिछले 30 वर्षो में मात्र दो या तीन कॉलेज ही खोले है जिसकी वजह से सरकारी स्कूलों से पढ़कर आये गरीब छात्रो को उच्च शिक्षा में दाखिला नहीं मिल पाता है| कट-ऑफ के जरिये इस सीट की कमी को सरकार द्वारा छिपा लिया जाता है|  यही नहीं, बजाये की नए कॉलेज खोलकर इस सीट की कमी को पूरा किया जाए सरकार विश्विद्यालय से सम्बन्ध कॉलेजों को स्वायत्ता देने के नाम पर निजीकरण करने की कोशिश में जुटी है जिसके कारण वंचित वर्ग से आये छात्रो से उनके जीवन को बेहतर बनाने का  एकमात्र रास्ता भी छीन लिया जायेगा| एक बार यदि कॉलेज को स्वायत्ता मिल जाये तो वे ट्रस्ट जो इन कॉलेजों को चला रहे है उन्हें छात्रो से अत्यधिक फीस लेना पड़ेगा क्यूंकि तब विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दी जा रही राशि इन कॉलेजों से वापस ले ली जाएगी जो कि पूरे खर्चे का 95% है|
 ऊँचे कट-ऑफ और कम सीटें कई कारण से बेहद समस्यापूर्ण हैं| ज्ञात हो कि कम सीटों के कारण आरक्षित सीटें भी कम रहेंगी, जिस कारण दलितों को शोषण से बाहर निकालने की बात हमेशा ही एक दूर का स्वप्न रहती है| इस कारण उच्च शिक्षा में आने के इच्छुक दलित छात्र सीटें न होने के कारण अपने जातीय कामों में फंसने को मजबूर हो जाते हैं व शिक्षा के माध्यम से अपनी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से बाहर निकलने के एकमात्र विकल्प से भी वंचित हो जाते हैं| केवाईएस आने वाले दिनों में दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों की भेद-भावपूर्ण शिक्षा नीति के खिलाफ अपना संघर्ष तेज़ करेगा|



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