| नरेन्द्र कुमार शर्मा |
"क्या आपने ईश्वर को देखा है?’’ जिज्ञासु ‘नरेन’ ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से नि‘संकोच पूछा। उसी सहनता से स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भी उत्तर में हां कहकर नरेन को चैंका दिया। मुझे भी दिखाओगे.....? नरेन और उत्साहित होकर पूछा। रामकृष्ण जैसे शायद इसी पल की प्रतीक्षा कर रहे थे तुरंत ही बोले- क्यों नहीं...... ठीक ऐसे ही जैसे मैं और तुम पास-पास है, ईश्वर को भी पास से देखा जा सकता है...... परन्तु आस्थावान बनना होगा। और यहीं से शिष्य नरेन का प्रशिक्षण शुरू हो गया। यद्यपि स्वामी रामकृष्ण को नरेंद्र में छिपी अद्भुत प्रतिभा का ज्ञानतो उसके पड़ोसी घर में होने वाले आनन्दोत्सव में ही हो गया था तभी वे नरेन्द्र को अपने आश्रम दक्षिणेश्वर आने के लिए कह आए थे। और नरेन्द्र भी एक जिज्ञासु पर्यटक की भांति अपने कुछ मित्रों के साथ दक्षिणेश्वर जा पहुंचे थे। जहां स्वामी रामकृष्ण को नरेन्द्र की विविध तरह से परीक्षा लेना भाता था वहीं नरेन्द्र नाथ भी समय-समय पर रामकृष्ण द्वारा बताए गए आध्यात्मिक सत्य की परीक्षा लेने से नहीं चूकते थे। नरेन्द्रनाथ के पिता की 1884 में मृत्यु हो जाने पर परिवार की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई थी। नरेन्द्र ने अपनी कठिनाई स्वामी रामकृष्ण के सम्मुख रखी तो उन्होंने कह दिया- माँ मुझे ज्ञान दो.... माँ मुझे ज्ञान दो...। वे एक संतृप्त भाव से बाहर लौटे तो स्वामी रामकृष्ण निर्विकार भाव से मुस्करा रहे थे.... फिर बोले नरेन्द्र क्या मांगा माँ से? नरेन्द्रनाथ आश्चर्य में थे और बोले- मैंने ज्ञान मांग लिया है इस समय इसी की आवश्यकता थी यहीं से नरेन्द्रनाथ अपने गुरू के प्रति पूर्ण समर्पित हो गए और स्वामी परमहंस भी असीम धैर्य के साथ अपने युवा शिष्य (नरेन्द्र) की क्रांतिकारी मुमुक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर उसे सन्देहों के दायरे से बाहर निकालते रहे। युवा नरेन्द्र को गुरू के आध्यात्मिक मार्गदर्शन तथा सहायता की अपेक्षा गुरू के प्रेम ने ज्यादा प्रभावित किया। श्री परमहंस की इच्छा थी कि नरेन्द्र दक्षिणेश्वर आश्रम के शिष्यों का नेतृत्व करें। एक दिन नरेन्द्रनाथ ने गुरू के समक्ष अपने लिए निर्विकल्प समाधि लगाने का आशीर्वाद मांग लिया इस पर गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस चैंके और क्षुब्ध होकर बोले- ये क्या......? मैं तो सोचता था तुम एक दिन विशाल वट की तरह विस्तार करके दुनियां के असंख्य लोगों को झुलसाने वाले दुःखों से छुटकारा दिलाकर आश्रय प्रदान करोगे। परन्तु तुमने केवल अपना ही कल्याण चाहा। मुझे तुम्हारे ऊपर लज्जा आती है...। गुरू की इस चेतावनी मात्र से नरेन्द्र सिहर उठे। उन्होंने अपना विचार बदलकर गुरू के आदेश की इच्छा व्यक्त की जिस पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा- अभी वह काम नहीं हुए हैं जिनके लिए तुम्हारा (नरेन्द्र का) जन्म हुआ है। अपने महाप्रयाण से चार दिन पूर्व गुरू रामकृष्ण परमहंस ने अपने परम शिष्य नरेन्द्रनाथ को अपनी दिव्यशक्ति स्थानांतरित कर दी और कहा- आज से तुम विवेकानन्द हो गए हो... जाओ.... राष्ट्रहित में, मानव हित में कार्य करो बहुत लोगों को तुम्हारी आवश्यकता है.... मेरे पास अब कुछ शेष नहीं है।
गुरू की आज्ञा शिरोधार्य कर स्वामी विवेकानन्द देश में अशिक्षा, अज्ञानता तथा अन्य रूढियों को समाप्त करने के उद्देश्य से भ्रमण पर निकल पड़े। कश्मीर से कन्या कुमारी तथा पूरब से पश्चिम तक वे जन साधारण में जागरूकता लाने के लिए प्रयास रत रहे। अपनी यात्रा में बनारस, लखनऊ, आगरा, वृन्दावन, ऋषिकेष आदि प्रमुख स्थानों पर होकर पुनः बारांगोर पहुंचे। अपने अगले प्रयास में उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मैसूर, केरल तथा मद्रास के ऐतिहासिक एवं तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। सभी स्थानों पर उन्हें प्राचीन भारत का गौरवशाली दर्शन हुआ, चाहे वह सांस्कृतिक रहा हो चाहे आध्यात्मिक रहा हो अथवा राजनैतिक रहा हो। वे अनेक राजाओं रियासतदारों से मिले इनमें खेतडी के महाराजा अजीत सिंह उनके परम मित्र बन गए। पूना, बंगलौर, बेलगांव तथा मैसूर होते हुए वे त्रिवेन्द्रम व कन्याकुमारी पहुंचे। अपने अनेक अनुयायियों एवं मित्रों के सहयोग से वे विदेश यात्रा पर चले गए। उन दिनों विदेश यात्रा भी वर्जनीय थी इसे अशुभ माना जाता था। परन्तु स्वामी विवेकानन्द एक युगदृष्ट्रा थे। विदेशों में जापान, चीन, कनाडा, शिकागो व बोस्टन गए। इन स्थानों पर उद्योगों को देखकर उन्हें भारत की याद आयी कि क्यों न हमारे भारत के लोग भी इतने परिश्रमी हो, उन्हें भी तकनीकि जानकारी हो... वे भी पढ़े वे भी आगे बढ़े... और उन्होंने रास्ते से ही पत्र लिखकर अपने मित्रों एवं अनुयायियों को अपनी भावनाओं एवं पीड़ा से अवगत कराया।
शिकागो में एक धर्म, संसद का आयोजन किया गया। भारत के प्रतिनिधि के रूप में प्रतापचंद मजूमदार, विपिनचंरद गांधी, श्रीमती एनीबेसेंट तथा श्री चक्रवर्ती वहां आमंत्रित थे। बहुत कठिनाईयों तथा प्रयासों के बाद स्वामी विवेकानंद को धर्म-प्रतिनिधि के रूप में धर्म-संसद में प्रवेश मिल सका। इनसे पूर्व भारतीय प्रतिनिधि अपनी तैयारी के साथ मंच पर बोले थे लोगों ने उनकी सराहना की थी। स्वामी विवेकानन्द की कोई विशेष तैयारी नहीं थी परन्तु जब स्वामी विवेकानन्द की बोलने की बारी आयी तो धर्मसंसद का बहुत बड़ा हॉल लोगों से खचाखच भर चुका था। स्वामी जी गेरूए वस्त्रों में चेहरे पर ओजस्वी भाव लिए मंच पर पहुंचे तो लगा कि लोग उन्हें सुनेंगे भी या नहीं। कोई इनके गैरिक वस्त्रों की चर्चा कर रहा था तो कोई उनके व्यक्तित्व की। स्वामी जी ने कुछ पल के लिए सभा को अपने विशाल नेत्रों से मृदुल भाव से निहारा... लोग सम्मोहित से लगे सभा शान्त हो गई। स्वामी जी ने बोलना शुरू किया- मेरे प्यारे अमेरिकी- भाईयों एवं बहिनो...! सम्बोधन मात्र से ही तालियों की गडगड़ाहट से हॉल देर तक गूंजता रहा। फिर श्रोता इतने मंत्रमुग्ध हुए कि स्वामी विवेकानन्द को सभी सत्रों में पूरी तरह सुना गया। उन्होंने विश्वबन्धुत्व का सन्देश ही दिया था और जोर देकर कहा- अब से सभी धर्म ध्वजाओं पर नए नारे लिखवा दो, इनमें युद्ध नहीं- सहायता, ध्वंस नहीं- सृजन भेद नहीं- सामंजस्य तथा द्वन्द नहीं शान्ति आदि।
स्वामी विवेकानन्द मानते थे कि अज्ञान अनपढ़ एवं भूखी जनता को धर्म की शिक्षा देना कोरी मूर्खता है खाली धर्म प्रचार से मठों में पूजा पाठ से दीन दुखियों की सेवा नहीं हो सकती। निर्वस्त्र को वस्त्र एवं भूखों को रोटी की आवश्यकता है न कि धर्मोपदेशों की। और ये आवश्यकताएं केवल उद्योग करने से उद्योगों को विकसित करने से, शैक्षिक ज्ञान बढ़ाने से तकनीकी विस्तार से ही पूरी हो सकेगी। आज के परिपेक्ष्य में स्वामी विवेकानन्द के विचार प्रासंगिक हैं। आज का विकासशील भारत स्वामी जी का सपना था। गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने स्वामी के विषय में कहा था यदि भारत के विषय में जानना है तो स्वामी विवेकानन्द का अध्ययन कर लेना चाहिए क्योंकि उनमें सब कुछ सकारात्मक है। इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कहा था- मैंने उनके कार्यों को ध्यान से देखा है और जब उन्हें ध्यान से देखा है तब से मेरा देश प्रेम हजार गुना बढ़ गया है। सदैव राष्ट्रहित में सोचना और भारतीय युवाओं की प्रगति उनका चिंतन था आभूषण था।
नरेन्द्र कुमार शर्मा



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