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| संजय त्रिपाठी |
इतिहास में आजादी के बाद पहली बार आम बजट सबसे अलग रहा। मोदी सरकार ने चुनाव पूर्व आखिरी पूर्ण बजट को दो हिस्सों में बांट दिया हैं। वहीं रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने का वादा तो किया गया है, लेकिन एक दशक में 12 प्रतिशत महिलाओं की हिस्सेदारी घटी है। आम बजट में देश में निर्मित कोई सामान सस्ता या मंहगा नहीं हुआ। क्योंकि जीएसटी के बाद अब ऐसा होगा भी नही। 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू हुआ। और तब से जीएसटी काउंसिल ही कीमते तय करवाती है। इसे संसद की मंजूरी की जरूरत भी नहीं है। और इस व्यवस्था में बदलाव के लिए संविधान संसोधन करना होगा। हालांकि पेट्रो उत्पाद , शराब, बिजली व रियल एस्टेट जीएसटी से बाहर है। सरकार के पास बजट के लिए सिर्फ कस्टम ड्यूटी ही बची है । जो सिर्फ विदेशी सामान पर लगती है। जैसे कि इस बजट में टीवी और मोबाईल पर लगाई है।
किसी समय में बजट की सुर्खियां बनने वाली पेट्रसेल - डीजल की कीमतें काफी समय से अब तेल कंपनियों के जिम्मे है। पिछले साल से तो इनकी कीमते रोज बदल रही है। हालांकि सरकार ने पेट्रो उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी लगाते हुए पिछले साल 2.42 लाख करोड़ करोड़ रूपए हमसे कमा लिए। फिर भी जिस तरह प्रमुख तेल कंपनियांें पर सरकार का ही नियंत्रण है, ठीक वैसा ही जीएसटी काउंसिल के अध्यक्ष वित मंत्री अरूण जेटली ही हैं। जेटली का बजट सीधे - सीधे दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखा। पहला हिस्सा गांव - गरीब और किसान को खुश करने पर समर्पित रहा। क्योंकि गुजरात चुनाव में इन्हीं वर्गो की नाराजगी भाजपा को झेलनी पड़ी थी। दूसरा हिस्सा मिडिल क्लास का था जिसे कोई फायदा नहीं दिया।
पहले हिस्से में जेटली बजट ने ओबामाकेयर के तर्ज पर आयुष्मान भारत, 50 करोड़ लोगों को 5 लाख का बीमा दिया। इसमें 40 फीसदी आबादी कवर होगी तथा 24 नए मेडिकल काॅलेज भी खोले जाएंगे। खरीफ की फसल के लिए लागत से डेढ़ गुना होगा न्यूनतम समर्थन मूल्य। 8 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए जायेंगे। 4 करोड़ घरों को बिजली दी जायेगी। रबी की तरह खरीफ फसलों की एसएसपी उनकी उत्पादन लागत से डेढ़ गुना होगी। आलू, प्याज, टमाटर की कीमतों में उतार - चढ़ाव से बचाने के लिए आॅपरेशन ग्रीन लांच किया गया।
दूसरे हिस्से में मिडिल को कोई टैक्स छुट नहीं, कुल बचत 177 रूपए सालाना रहा। 40 हजार का स्टैंडर्ड डिडक्शन देकर 34200 की छूट वापस ली। शिक्षा - स्वास्थ्य सेस 3 से बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया गया। छुट और सेस मिलाकर 5 लाख आय पर सालाना 177 रूपए बचेंगे। बजट में होम लोन की चर्चा तक नहीं की गई। शेयर्स में लाॅग्स टर्म कैपिटल गेन पर 10 प्रतिशत टैक्स लगाया गया। बेशक बजट के जरिए लोगों को लुभाने का प्रयास नहीं किया गया, पर कुछ प्रावधानों को लेकर एतराज हो सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में उपकर तीन से बढ़ा कर चार फीसद किया जाना और शेयर बाजार में एक लाख रुपए से अधिक के लंबी अवधि के निवेश पर लाभ को करयोग्य बना दिया जाना कुछ लोगों को खटक रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरी के नाम पर बरसों से उपकर वसूला जा रहा है।
ताजा प्रावधानों से इन क्षेत्रों में स्थिति कुछ बेहतर होने की उम्मीद बनी है। इसी तरह शेयर बाजार में लंबी अवधि के निवेश को इसलिए बढ़ावा दिया जाता है कि उससे कंपनियों की स्थिति मजबूत होती और देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ता है। पर उसे भी करयोग्य बना दिया गया है। हालांकि इससे शेयर बाजार में गिरावट दर्ज हुई, पर यह चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। इन सबके बावजूद राजकोषीय घाटा बढ़ने का ही अनुमान है। पर उम्मीद है, इससे सरकार महंगाई रोकने, लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाने, रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने के अपने लक्ष्य के करीब पहुंच सकेगी।
बेरोजगारी के मुद्दे पर आलोचना झेल रही सरकार ने इस बजट में रोजगार के अधिक से अधिक अवसर पेदा करने पर जोर दिया। वित मंत्री ने कहा कि अगले वित वर्ष में 70 लाख लोगों को नैकरी देने का लक्ष्य है । रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015 - 16 की रिपोर्ट के मुताबिक , पिछले एक दशक में नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी 12 फीसदी घटी है। वहीं अगले वित्त वर्ष में सिर्फ 6 लाख नौकरियां बढ़ने का ही अनुमान है। एक दशक में नौकरियों में पुरूषों की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी घटी है। 15 प्रतिशत महिलाओं को 8 प्रतिशत पुरूषों के काम के बदले नहीं मिला है वेतन। इस बजट के माध्यम से सरकार की कवायद चुनावी साल मे मास्टर स्ट्रोक खेलने की है।
संजय त्रिपाठी




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