फना होने की इजाजत ली नहीं जाती, ये वतन की मुहब्बत है जनाब पूछकर की नहीं जाती-देश के राजधानी में जुटे शहीदों के वंशज
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नई दिल्ली, ( संवाददाता ) शहीद राजा नाहर सिंह जी का जन्मोत्सव देश की राजधानी दिल्ली में कई जगहों पर बडे ही धूमधाम के साथ मनाया गया। सर्वप्रथम शहीदी स्थल ,कोतवाली, भाई मतिदास चैक ,शीशगंज गुरुद्वारे के सामने ,चांदनी चैक पर प्रातः 9 बजे हवन का आयोजन किया जिसमें राजा नाहर के वंशजों आदि ने आहूतियां प्रदान कीं। इस अवसर पर शहीद राजा नाहर सिंह जी जीवन परिचय उनकी परधेवती दीपिका सिंह एवं डा अमृता सिंह ने विस्तार से पढकर सुनाया। डा अमृता सिंह ने बताया कि राजा नाहर सिंह जी का जन्म बल्लभगढ़ रियासत के राजघराने में 6 अप्रैल 1821 को हुआ था बचपन का नाम नरसिंह था। राजा नाहर सिंह जी 1857 की क्रांति के नायकों में से एक थे उन्हें अंग्रेजो के द्वारा धोखे से बुलाकर 9 जनवरी 1858 में इसी स्थान पर फांसी दी गई थी। देश की आजादी के लिए अनगिनत वीरों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है।
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भारतीय इतिहास में जिन शहीदों का नाम अंकित है बल्लभगढ़ रियासत के आजादी के मतवाले शहीद राजा नाहर सिंह का नाम हरियाणा ही वरन् पूरे देश के इतिहास में अमर रहेगा। प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जिसे 1857 की महान क्रांति के नाम से जाना जाता है, इसमें बल्लभगढ़ रियासत के राजा नाहर सिंह अग्रणी कं्रातिकारियों में से एक थे, जिन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को दिल्ली का शासक स्थापित करने तथा राजधानी की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। दीपिका सिंह ने कहा कि भारतमाता के इस परमवीर सपूत राजा नाहर सिंह को 9 जनवरी 1858 को लालकिले के सामने चांदनी चैक में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध विद्रोह के आरोप में फंासी पर लटकाया गया था। उनके साथ उनके विश्वस्त साथियों गुलाब सिंह सैनी, खुशहाल सिंह एवं भूरा सिंह को भी फंासी दी गई थी। राजा नाहर सिंह के संघर्ष की कथा खून तथा आंसूआंें से भरी पडी है, मात्र 35 वर्ष की अवस्था में 9 जनवरी 1858 को फांसी के बाद उनका पार्थिव शव उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया। अंग्रेजों को भय था कि कहीं उनके पार्थिव शव को देखकर उनकी रियासत के लोग भडकर शोला न बन जायें और अंग्रेजों पर कहर बनकर टूट पढें।
कार्यक्रम संयोजक हरपाल सिंह राणा ने बताया के ब्रिटिश हुकूमत से 134 दिन तक आजाद दिल्ली का इतिहास राजा नाहर सिंह के बलिदान की याद दिलाता है राजा नाहर सिंह ने दक्षिण दिल्ली की लोहे की दीवार बनकर किसी भी अंग्रेज को दिल्ली में घुसने नहीं दिया था। आगरा से आती हुयी ब्रिटिश सेना की टुकडियों को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया था। उनका बलिदान अनूठा एवं असीम प्रेरणादायक है।
इस कार्यक्रम में शहीद भगत सिंह जी के वंशज जगमोहन सिंह जी (पंजाब), शहीद बहादुर शाह जफर के वंशज मोहम्मद सैफ खान जी उत्तर प्रदेश, शहीद सुखदेव जी के वंशज अनुज थापर जी हरियाणा, ठाकुर दुर्गा सिंह जी के वंशज विजय सिसोदिया जी उत्तर प्रदेश, शहीद उधम सिंह जी के वंशज ज्ञान सिंह उधम पंजाब, शहीद मंगल पांडे जी के वंशज रघुनाथ पांडे जी बेंगलुरु,शहीद रामकृष्ण खत्री जी के वंशज उदयन खत्री जी लखनऊ, शहीद चंद्रशेखर आजाद जी के वंशज सुजीत आजाद लखनऊ, शहीद राजा नाहर सिंह जी के वंशज डॉ अमृता सिंह जी गाजियाबाद, शहीद महाराजा नाहर सिंह जी के वंशज नरवीर सिंह फरीदाबाद से आये एवं उन्होंने देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों के प्रति अपने उद्गार प्रकट किये। उसके बाद चांदनी चैक के सामने आर्य समाज मंदिर में राजा नाहर सिंह के जीवन पर आधारित एक डाक्यूमैन्टरी फिल्म का प्रसारण किया गया। जिसका निर्देशन
अमुवि अलीगढ के मुस्तजाब मलिक ने किया है इस फिल्म की निर्माता डा अमृता सिंह है।
अंत में डा अमृता सिंह ने राजा साहब की शान में एक शेर सुनाया ‘ फना होने की इजाजत ली नहीं जाती, ये वतन की मुहब्बत है जनाब पूछकर की नहीं जाती।
उसके बाद 11.30 बजे से सी-4 जनकपुरी नई दिल्ली में स्थित महाराजा सूरज इंस्टीट्यूट में भी फिल्म का प्रसारण किया गया। यहां पर कार्यक्रम संयोजक एसपी सिंह ‘पूर्व आयकर आयुक्त’ एवं अध्यक्ष-महाराजा सूरजमल एजूकेशनल सोसयटी एवं प्रो जयपाल सिंह रहे। यहां पर राजा नाहर सिंह जी के चित्र पर माल्यार्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। तत्पश्चात् हवन का आयोजन किया जिसमें राजा नाहर के वंशजों आदि ने आहूतियां प्रदान कीं। कार्यक्रम में विमलेश सिंह, प्रीती चैधरी, दीपिका सिंह, डा अमृता सिंह, स्वराज्य सिंह, प्रदीप सिंह, प्रशांत ठाकुर, आदि लोगांे ने राजा के साहब के बारे में अपने अपने विचार प्रकट किये। अंत में डा अमृता सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करके सभी अतिथियों का आभार प्रकट किया।


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