शर्म शब्द किस तरह और कहां से आया यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बचपन से यह सुनते जरूर आ रहे है। कई बार तो लोग शर्म के जगह यह तक कहते है कि कितना बेशर्म है। अर्थात शर्म में उपसर्ग बे लगाकर बेशर्म बनाया जाता है। लोग कहते हैं कि शर्म नहीं आ रहा, तब लगता है कि हमशे कोई - न - कोई गलती हो गई है जिसे नहीं करना चाहिए या करने से पहले शर्म आनी चाहिए। शर्म के जगह कभी इसके पर्यायवाची निर्लज, बेहाया का भी संबोधन कर दिया जाता है। अक्सर बड़े लोग छोटो के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते है। नहीं करने योग्या काम कर गुजरने पर ऐसा सुनने को मिलता है और लोग शर्म से चेहरा झुका लेते है। पूरब के तरफ बेहाया का एक पेड़ होता है। कहा जाता है कि इसे उसर, पत्थरीला जैसा भूमि पर भी फेंक देते हैं तो भी यह उग आता है। यानी कि बे जोड़ हाया, तब बनता है बेहाया। हाया लोक लाज तथा शर्म को ही कहते हैं। अब देश में लाज, हाया तथा शर्म देखने को कही - कही ही मिल पाते है। हमारे देश मे आज भी इस पर चर्चा तो हो रहा। इसी का नतीजा है कि मैं यह विषय पर यह खुल्लम - खुला लिख रहा हूं। लेकिन हमारे पडोसी देश पाकिस्तान ने तो इसे खूंटी पर टांग रखा है। अभी हाल में ही वहां के प्रधानमंत्री शाहिद खाकन अब्बासी अमेरिका हवाई जहाज से गये थे। वहां एयरपोर्ट पर उनकी तलाशी पतलून निकाल कर की गई। सोशल मीडिया पर पैंट पहनते उनका तस्वीर वायरल हुआ। पाकिस्तान के आवाम को यह नगावार गुजरा, लेकिन मियां शर्म से झेपते हुए कहने लगे कि मैं अपने निजी यात्रा पर आया हूं। उन्हें शर्म तो है लेकिन आती नहीं है। हमारे यहां भी सांसद में पक्ष - विपक्ष कई बार शर्म को व्यक्त तो करते हैं, लेकिन करते नहीं है। अब तो शर्म का सिर्फ नाम ही रह गया है, लोगों में शर्म दिखाई नहीं देता। दिन - पर - दिन ऐसे मामले सुनने व देखने को मिल रहे है जिससे दूसरा तो शर्मिदा हो जा रहा है, लेकिन जिसे शर्म करना चाहिए उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। अब जरा सोचिए, केजरीवाल को इस मुकाम तक पहुंचाने वाले अन्ना एक बार फिर दिल्ली में धरना देकर चले भी गये, लेकिन उनके पूराने सहयोगियों को जरा सा भी शर्म आया। कई देश के उधोगपति व व्यवसायी करोड़ों की रकम लेकर दूसरे देश में फरार हो गए, उन्हें जरा सा भी शर्म आया। आज कल सब कुछ लीक ही हो रहा है, क्या चैकीदार को थोडा सा भी शर्म आ रहा है। सीबीएसई का एक कर्मचारी पेपर लीक मामले में पकड़ा गया है और उसे बर्खास्त किया गया है, उसे शर्म है। हर क्षेत्र में लोगों के आंखों पर धन की चर्बी चढ़ गई है, जिससे शर्म गायब हो गया है। शर्म तो आंखों से ही आती है। काश, लोकतंत्र की रक्षा के लिए थोड़ी भी शर्म आंखों में बच जाये तो आम लोगों का कुछ तो भला हो जायेगा। हम भी पाक के तरह बेशर्म न बने, कुछ तो शर्म करे।
संजय त्रिपाठी



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