‘माॅब लिंचिंग’ कौन जिम्मेदार ? By संजय त्रिपाठी Who is responsible for 'mb lining'



मैं कभी भी माॅब लिंचिंग का समर्थक नहीं हूं। मैं कभी भी कानून हाथ में लेने के पक्षधर नहीं हूं। कभी भूल कर भी ‘ भीड़तंत्र’ के अनैतिक कार्यो का समर्थन नहीं कर सकता। कभी संविधान से अलग नहीं जा सकता। जाति - समुदाय के नाम पर देश बांटने वालों के साथ खड़ा भी नहीं हो सकता। जो पार्टी जाति - धर्म की राजनीति करती हो उसका साथ नहीं दे सकता। मैं भारतीय संविधान को मानने वाला, कानून का पालन करनेवाला और देश से प्यार करने वाला एक सच्चा भारतीय नागरिक हूं। मेरा भगवान से ज्यादा संविधान में आस्था है, मानव का हितैशी होने के साथ ही समाजप्रिय और देश प्रथम का हिमायती हू। यहीं कारण है कि कई वर्षो तक राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के शाखा में जाता तो रहा, हमेशा ध्वज प्रणाम भी करता रहा लेकिन कुछ उनके विचारों से मेरा मेल नहीं खा पाता। संघ को एक दृष्टि में मैं देश के सभी सामाजिक संस्थाओं से सर्वश्रेष्ठ पाता हूं, लेकिन संघ का जो मुख्य उद्देश्य है उसमें मैं फिट नहीं बैठ पाता और उसी कारण मैं दूर भागता हू। साथ ही यही एक कारण है कि आज तक मैं एक ही पार्टी का समर्थक बन कर रह गया।  वह है कांग्रेस। इस देश का नागरिक हूं, वोटर हूं तो किसी न किसी को वोट तो देना ही है, लेकिन जब मैं अपने विचारों के माध्यम से मंथन करता हूं तो मुझे सभी पार्टियों से अच्छा कांग्रेस ही दिखती है। कांग्रेस जाति - मजहब, संाप्रदायिकता, कट्टरपन, धार्मिकता जैसे  मुद्दों की राजनीति नहीं करती यही कारण है कि मैं सिर्फ वोटर के रूप में इसका समर्थक हूं। जब भी बीजेपी के तरफ से धर्म या समुदाय को लेकर एक तरफा मुद्दे उठाये जाते है, तब मेरा कलम इसके खिलाफ स्याही उगलता है। सभी के जेहन में यह बैठ गया है कि बीजेपी यानी हिन्दुवादी पार्टी। बीजेपी के बरिष्ठ नेता लालकृष्ण अणवाणी की रथ यात्रा ने बीजेपी को हिन्दुओं का समर्थक पार्टी बना ही दिया , लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव ने इस पर पूरी तरह हिन्दुवादी होने का ठप्पा लगा दिया। मेरे विचार में हमारा संविधान धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है, ऐसे में कोई देश को धर्मप्रधान कैसे बना पायेगा? दूसरा जिसे हम देश से अब अलग नहीं कर सकते उसके खिलाफ जहर उगलने से ही क्या फायदा होगा? इन्हीं मुद्दों पर मैं अलग रहता हूं और जब भी हमारे विचार से अलग कोई पहल की जाती है जो भारत के संविधान से हट कर  है तो मुझे लिखना ही पड़ता है। पाठक भी सोच रहे होंगे कि शीर्षक से अभी तक अलग मैं क्यों हूं? तो आइए अब भूमिका छोड़ कर कुछ उस मुद्दे की बात की जाय जिसपर आज लिख रहा हू। माॅब लिंचिंग की पहली घटना अखलाख से शुरू होकर आज कई दर्जन लोगों को अपना शिकार बना चुकी है। कई तरह के माॅब लिंचिंग के मामले सामने आये जिसमें अलग - अलग ट्रेक स्पष्ट देखा गया। गोतस्कर, गोहत्या से शुरू होकर बच्चा चोरी व अन्य मामलों के अफवाह फैलाकर भीड़ द्वारा पीट - पीट कर हत्या करने के दर्जनों मामले सामने आ गये। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा और केंद्र व राज्य सरकारों को ठोस कदम उठाने का आदेश दिया। लिंचिंग एक बर्बर अपराध है और कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। हालांकि इसका सभी समुदाय के लोग शिकार बने है। लेकिन कुछ लोगों का तर्क है कि इसका शिकार सबसे ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोग हुए है। इस तरह की घटना केंद्र में बीजेपी के सरकार बनने के बाद ही सामने आया है, ऐसे में सभी इसके लिए बीजेपी और आरएसएस को ही जिम्मेदार मानते है। मैं भी अपने कई संपादकीय में इन्हें ही जिम्मेदार ठहराया हूं। लेकिन 30 जुलाई को अलवर में एक दूसरी घटना ने पूरी तरह मेरा भी सोच बदल दिया। हम सब इसके लिए खासतौर से बीजेपी, आरएसएस, बंजरंग दल जैसे हिन्दुवादी संगठन को ही देाषी ठहराते आ रहे है, और ठहरा भी रह है, लेकिन कभी भी हम लोग दूसरे पक्ष के द्वारा की जा रही उकसाव पर ध्यान नहीं देते। जरा गौर करे पिछले दिनों अलवर जिले में रामगढ़ के ललावंडी में अकबर उर्फ रकबर की भीड़ द्वारा पीट - पीट कर हत्या करने के मामले को हम सभी ने घोर निन्दा की। रोज इसे धृणित कार्य बताते हुए मीडिया ने खुब हो हल्ला मचाया। ऐसे में हमें हो - हल्ला मचाना भी चाहिए, क्योंकि इस तरह कानून को हाथ में लेना देश का विकास नहीं विनाश का द्योतक है। परन्तु 30 जुलाई को अलवर जिले के ही गोविन्दगढ़ की घटना को क्या एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय को उकसाना नहीं कहा जायेगा? इस जिले में अभी पहला मामला शांत भी नहीं हुआ कि गोविंदगढ़ कस्बे के बड़बरा रोड़ पर मकान में गोकशी कर मीट बेचने की घटना हो गई। पुलिस ने इस मामले में तीन औरतों को 40 किलो मीट के साथ गिरफ्तार किया। श्रवण मास के पहले सोमवार को हुई इस घटना ने एक बार फिर ‘माॅब लिंचिंग’ के मुकाम पर लाकर हमें खड़ा कर दिया। वास्तविक में माॅब लिंचिंग के लिए सिर्फ एक को दोषी ठहराया जाय तो अब मेरे नजर में अच्छा नहीं होगा। दूसरे को भी समझना होगा कि जिस कार्य के विरूद्ध आज लोग हैं, उसे मैं क्यों कर रहा हूं ? यह तो एक तरह से एक पक्ष को उकसाने जैसा कार्य हुआ। कुछ लोग ऐसे भी है जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर माॅब लिंचिंग को बढ़ावा दे रहे है। ऐसे में पुलिस को और ज्यादा सतर्क होना होगा। जब भी प्रशासन कमजोर होता है जनता फैसला का निर्णय अपने हाथों में ले लेती है। ऐसे में माॅब लिंचिंग की जिम्मेदारी प्रशासन के कंधों पर ही डाला जाता है। 

संजय त्रिपाठी     



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