गीता जयंती (18 दिसम्बर) पर विशेष
| नरेन्द्र कुमार शर्मा |
‘‘मैं कौन हूँ? देह क्या है?’’ क्या देह के साथ मेरा कोई आदि अन्त है? देह त्याग के बाद क्या मेरा अस्तित्व रहेगा? देह त्याग के बाद मुझे अन्ततः कहां जाना होगा? आदि प्रश्न जिज्ञासा के रूप में... समस्या के रूप में जन साधारण के मन में भी घूमते रहते हैं। गीता में इन सब प्रश्नों को अर्जुन के माध्यम से पूछा गया है और उनका समाधान स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन के रूप में समग्र मानव जाति को समझाया है। देह में स्थित और देह त्याग कर जाते जीवात्मा की गति का यथार्थ वैज्ञानिक एवं तर्क संगत वर्णन गीता शास्त्र में हुआ है। देह त्यागकर जीवात्मा अपने कर्मानुसार विभिन्न योनियों में विचरण करता है। आत्मा अक्षय ज्ञान का स्रोत है ज्ञान शक्ति हो क्रियाशक्ति का उदय होता है तब प्रकृति का जन्म होता है। प्रकृति के तीन गुण- सत, रज और तम का निर्माण होता है। सत और रज की अधिकता धर्म का कारण बनती है, वहीं रज और तम की अधिकता आसुरी शक्ति को पैदा करती है। गीता का सार यही है कि तुम संसार के कर्मको अपने स्वभावानुरुप करते चलो। स्वभाव गत कर्म करना सरल है जबकि दूसरे के स्वभावानुरुप कर्म करना जटिल है। जीव जिस प्रकृति को लेकर जन्मा है उसके प्रकृति के अनुरूप उसका जीवन सरल होता है।
भगवद्गीता को ‘गीतोपनिषद’ भी कहा जाता है। यह वैदिक ज्ञान का सार भी है और वैदिक साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपनिषद है। भगवद्गीता का मर्म समझने के लिए हम एक दैनिक व्यवहार का उदाहरण लेते हैं माना हमें कोई दवा लेनी है तो उस दवा को हम चिकित्सक के परामर्श अथवा उस पर लिखे निर्देश के अनुसार ही ले सकते हैं। मनमाने ढंग से दवा लेने पर लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है। ठीक इसी प्रकार भगवद्गीता को समझने के लिए उसके वक्ता द्वारा दिये गए निर्देशों के अनुसार ही हमें इसे स्वीकार करना चाहिए, इसे ग्रहण करना चाहिए तभी हम इसे समझ पायेंगे और भगवद्गीता के वक्ता भगवान श्रीकृष्ण हैं, गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर उनका उल्लेख भगवान के रूप में ही हुआ है और प्रायः भगवान शब्द किसी महापुरुष किसी विशेष देवता आदि के लिए किया जाता है। श्रीकृष्ण तो महापुरुष के रूप में देखे जाते हैं परन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं जैसा कि आदि शंकराचार्य, रामानुचार्य, मध्वाचार्य, निम्वार्क स्वामी महाप्रभु चैतन्य तथा भारत के मनीषियों ने भी माना है और गीता में तो भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को पुरुषोत्तम भगवान कहा है अनेक ग्रन्थों में भी श्रीकृष्ण को परम पुरुषोत्तम भगवान कहा गया है अतरू उन्होंने जिस प्रकार गीता का सार बताया है, गाया है, हमें उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। भगवान ने अर्जुन को सूचित करते हुए कहा है
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवान हमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाक वे अब्रवीत।।
कि भगवद्गीता की यह योगपद्धति सर्वप्रथम सूर्य देव को बताई गयी। सूर्य ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया। इस प्रकार यह योग पद्धति गुरु शिष्य परम्परा के अनुसार चलती रही परन्तु कालान्तर में यह क्षीणतर हो गयी जिससे एक प्रकार से इसका लोप हो गया। इसे पुन जीवित करने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण ने अपने सखा अपने शिष्य अर्जुन को सुनाया वह भी महाभारत के युद्ध क्षेत्र में। गीता का यह गूढ़ ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसलिए दिया कि वह भगवान का भक्त है, मित्र है साक्षात शिष्य है अर्थात भगवद्गीता केवल भगवद्भक्तों के लिए है या जिनमें अर्जुन जैसे गुण (समर्पण, भक्ति, अशंका, पराक्रम) हों वे ही भगवद्गीता को अच्छी प्रकार भली प्रकार समझ सकते हैं। इसे समझने में कुतर्क एवं शंका सबसे बड़ी बाधा है। दूसरे शब्दों में कहें कि भगवान के प्रति समर्पण भाव का होना उन्हीं का चिन्तन करना ईश्वर के प्रति आस्थावान बनाता है।
भगवद्गीता का मुख्य उददेश्य मनुष्य को भौतिक संसार के अज्ञान से उबारना है। प्रत्येक व्यक्ति अनेक प्रकार की कठिनाइयों से घिरा रहता है उनसे निकलने के लिए छटपटाता रहता है। किसी मार्गदर्शन की इच्छा रखता है ठीक उसी प्रकार अर्जुन के समक्ष भी युद्ध कठिनाई का ही रूप था परन्तु अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण का आश्रय लिया और भगवद्ज्ञान के रूप में कठिनाई का समाधान भी पाया। आज भी हर मनुष्य में अर्जुन विद्यमान है और वह भौतिक त्रासों से चिन्तित है। इस प्रकार के अनेक सुझाव अनेक हल हमें गीता द्वारा प्राप्त हो जाते हैं। गीता भक्तों ज्ञानियों ध्यानियों और योगियों को कत्र्तव्य कर्म से छूट नहीं देती। बल्कि साधु और साधक यदि स्वयं को तनिक भी श्रेष्ठ मानते हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि उनकी जिम्मेदारी जन-साधारण से अधिक है। श्रेष्ठ जनों का आचार व्यवहार सबके लिए अनुकरणीय होना चाहिए। गीता में कत्र्तव्य पालन पर बहुत जोर दिया गया है। लोक कल्याण तथा लोक संग्रह दुष्ट दमन तथा सेवा कार्य ये सभी ईश्वर की आराधना हैं, परमात्मा तथा मोक्ष की प्राप्ति करने में सहायक है। ईश्वर की पूजा तथा सेवा दोनों का मिश्रण संतुलित होना चाहिए तभी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है ‘‘मामनुस्मर युध्य च’’ मुझे याद करता रह और युद्ध भी कर।
वस्तुतरू गीता का ज्ञान एक योग ही है इसमें, भक्तियोग ज्ञान योग कर्मयोग बुद्धियोग आदि का समन्वय है परन्तु यदि सभी योगों को भगवान कृष्ण को अर्पण कर दें और स्वयं को कत्र्तापान से हटा लें तो वही निष्काम कर्मयोग बन जाता है। भारतवर्ष की तो पहचान स्वरूपा श्रीमद्भगवदगीता आज विश्वभर के अनेक देशों में विधि विधान से पढ़ी और समझी जाती है अभी पिछले सप्ताह कुछ समाचार संस्थाओं के द्वारा ज्ञात हुआ कि इटली में श्रीमदभगद्गीता को एक विशेष एवं विराट रूप देकर विशेष सम्मान दिया गया है। इस गीता का आकार 2-7 मीटर तथा भार लगभग 800 किलोग्राम है पृष्ठ को पलटने के लिए 5 से 6 व्यक्तियों को लगना पड़ता है इसके बनाने में कुछ करोड़ की धनराशि व्यय की गयी है। वास्तव में यह एक बड़ा प्रयास है भगवद्गीता को जीवन्त रखने का परन्तु इसके अतिरिक्त यह विश्व का एकमात्र ग्रन्थ है जिसकी जयन्ती मनाई जाती है। गीता अज्ञान, दुख, मोह, क्रोध, लोभ, काम जैसी सांसारिक बाधाओं से मुक्त् िका मार्ग प्रशस्त करती है इसके पाठन से मनन-चिंतन से जीवन में श्रेष्ठता का भाव आता है। प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को गीता जयन्ती होती है। इस दिन पर्व को सभी गीता प्रेमी को मनाना चाहिए। इस दिन गीता का अध्ययन गीता का श्रवण सामथ्र्यानुसार गीता का वितरण करना चाहिए। गीता विचार गोष्ठी, गीता वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करना चाहिए और संभव हो तो गीता का पूजन एवं पठन-पाठन का संकल्प भी लेना चाहिए।
नरेन्द्र कुमार शर्मा
राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक



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