आज कल ‘ अप शब्दों ’ यानी गाली - गलौज का बहुत ही महत्व बढ़ गया है । रातों - रात चमकना है तो अपने से बड़े के लिए ‘ अपशब्दों ’ या गाली - गलौज का बौछार कर दें , फिर देखें किस तरह मीडिया आपको क्षितिज का सितारा बना देती है। हमारे देश के इलेक्ट्राॅनिक या प्रिट मीडिया को यह महारत हासिल है कि जितनी गलती करेंगे , उतनी जल्दी से आप चमकेगें । विश्वास नही ंतो आप पांच से सात वर्ष पीछे मुड़कर देख लें । गली - मुहल्ले में जिसकी चर्चा न थी , वह रातों - रात देश के सभी दिशाओं में छा गया । लेकिन आप ऐसा न कर बैठे । यह अधिकार हमारे देश के सिर्फ विधायक और सांसद को ही मिला हुआ है । कुछ प्रसिद्ध और नामचिन लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं । गाली की गरिमा भी बहुत महान है । यह इंसान को ऊंचा उठाता है , चमकाता है , बनाता है , उंची पद दिलाता है , कई दिनों तक चर्चा कराता है , आंदोलन का रूप बनाता है , पैसा भी कमवाता है , इसका सबसे बड़ी और खास गुण यह चुनाव जीताता है । फिर आप बताइए हम कैसे ‘ गाली ’ को गलत कह सकते हैं । जो देता है वह तो चमकता ही है , गाली खाने या लेने वाला इसे कई स्तर पर अलग - अल्रग शैली में प्रस्तुत कर अपना डूबता नाव आसानी से बचा लेता है । इसके साथ ही अपने कुल - खनदान और संबंधियों को बार - बार बरगला या भावुक कर लड़ने - मरने के लिए तैयार कर अपना माहौल बनाता है ।
आप माने या न माने गाली की सार्थकता मर्द पर उतना नहीं है , जितना औरतों के लिए । मर्दो के गाली के दो - चार ही पर्यायवाची शब्द ही मिल पाते हैं , लेकिन औरतों की गाली की पर्यायवाची शब्द ईश्वर के नाम के तरह ही अनन्त हैं । यह भी याद रखें भूल कर भी औरतों को गाली न दे , क्योंकि यह तो ‘ देश की बेटी - बहन ’,समाज की बेटी - बहन का अपमान है । हर बेटी - बहन किसी कि ‘ बुआ ’ भी हो सकती है । वह आम इंसान , मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री भी हो सकता है । जिस ‘ बुआ ’ का भतीजा मुख्यमंत्री हो तो उसे बुआ की गाली पर सोचना तो पड़ेगा ।
अरे - भाई गाली सुन - सुनकर इतना मुस्कुरा क्यों रहे हो ? इस मुस्कुराने का कारण मैं भी जानता हूं , पहले इसकी चर्चा से ही आनन् द मिलता था , अब तो इस पर पांच लाख से एक करोड़ रूपए तक इनाम भी मिल रहा है । गाली देने वाले के शरीर का कोई भी अंग लाओं और उसके तुलना में इनाम भी ले जाओ । इसमें जीभ और गला की कीमत सबसे ज्यादा है । चलो मैं भी इसी प्रयास में लगता हूं । राम - राम ............... ।


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