खुल्लम - खुला : यंग्य -‘ अप - शब्दों ’ का क्रेज Up - Words' craze

ज कल ‘ अप शब्दों ’ यानी गाली - गलौज का बहुत ही महत्व बढ़ गया है । रातों - रात चमकना है तो अपने से बड़े के लिए ‘ अपशब्दों ’ या गाली - गलौज का बौछार कर दें , फिर देखें किस तरह मीडिया आपको क्षितिज का सितारा बना देती है। हमारे देश के इलेक्ट्राॅनिक या प्रिट मीडिया को यह महारत हासिल है कि जितनी गलती करेंगे , उतनी जल्दी से आप चमकेगें । विश्वास नही ंतो आप पांच से सात वर्ष पीछे मुड़कर देख लें । गली - मुहल्ले में जिसकी चर्चा न थी , वह रातों - रात देश के सभी दिशाओं में छा गया । लेकिन आप ऐसा न कर बैठे । यह अधिकार हमारे देश के सिर्फ विधायक और सांसद को ही मिला हुआ है । कुछ प्रसिद्ध और नामचिन लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं ।
    खासतौर से बचपन में हम लोग अड़ोसी - पडोसी औरतों की ‘ अपशब्दों ’ की बछौर बड़े मजे ले - लेकर सुनते थे । हमारे गांव में सुबह - सुबह ही दो ऐसे परिवार थे , जिनके यहां बच्चे , बुढ़े , जवान घुमते - घुमते जरूर पहुंच जाते थे । वहां पर प्रात: काल में ही वह ‘ शब्द ’ सुनने को मिलते थे , जिसे लेकर हम लोगों का पूरा दिन आसानी से पास हो जाता था । अगर आज के समय में वे ‘ शब्द ’ सुनने को मिलते है तो शर्म से कान में अंगुली तक डालना पड़ जाता है । लेकिन बचपन में हमलोग चटकारे ले - लेकर उसकी आपस में व्याख्या करते थे । अ .....हा ........ अहा ....... गाली में भी क्या रस है । देखा जाए तो इसमें सातों रस का आनन्द आप प्राप्त कर लेते हैं । गाली देने वाला और गाली खाने या लेने वाला वह आनन्द की अनुभुति नहीं कर पाता है , जो आनन्द वहां  सुनने वालों को मिलता है । हम लोग भी बचपन में इस आनन्द को प्राप्त करने के लिए बहुत ही यत्न करते थे । खास कर गांव के उन दो घरों से गाली से जो आनन्द प्राप्त होते थे , वह दूसरे अन्य घरों से नहीं मिल पाता । इसके लिए उन दोनों पड़ोसी घरों में किसी एक के यहां सुबह बेला में उसके आंगन में एक या दो पत्थर फेंक देते थे और कुछ समय बाद उसका आनन्द लेने के लिए सड़क पर आ जाते थे । धीरे - धीरे आधी गांव ही सड़क पर आ जाती थी । कभी एक घर के दरवाजे के सामने रात में ही फूल , काली मिर्च , काला डोरा, पिला सरसों , सिंदूर  और थोड़ा सा अक्षत डाल देते थे । हमारे लिए दिन भर के लिए आनन्द का सामान इक्टठा हो जाता था ।
    गाली की गरिमा भी बहुत महान है । यह इंसान को ऊंचा उठाता है , चमकाता है , बनाता है , उंची पद दिलाता है , कई दिनों तक चर्चा कराता है , आंदोलन का रूप बनाता है , पैसा भी कमवाता है , इसका सबसे बड़ी और खास गुण यह चुनाव जीताता है । फिर आप बताइए हम कैसे ‘ गाली ’ को गलत कह सकते हैं । जो देता है वह तो चमकता ही है , गाली खाने या लेने वाला इसे कई स्तर पर अलग - अल्रग शैली में प्रस्तुत कर अपना डूबता नाव आसानी से बचा लेता है । इसके साथ ही  अपने कुल - खनदान और संबंधियों को बार - बार बरगला या भावुक कर लड़ने - मरने के लिए तैयार कर अपना माहौल बनाता है ।
    आप माने या न माने गाली की सार्थकता मर्द पर उतना नहीं है , जितना औरतों के लिए । मर्दो के गाली के दो - चार ही पर्यायवाची शब्द ही मिल पाते हैं , लेकिन औरतों की गाली की पर्यायवाची शब्द ईश्वर के नाम के तरह ही अनन्त हैं । यह भी याद रखें भूल कर भी औरतों को गाली न दे , क्योंकि यह तो ‘ देश की बेटी - बहन ’,समाज की बेटी - बहन का अपमान है । हर बेटी - बहन किसी कि ‘ बुआ ’ भी हो सकती है । वह आम इंसान , मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री भी हो सकता है । जिस ‘ बुआ ’ का भतीजा मुख्यमंत्री हो तो उसे बुआ की गाली पर सोचना तो पड़ेगा ।
    अरे - भाई गाली सुन - सुनकर इतना मुस्कुरा क्यों रहे हो ? इस मुस्कुराने का कारण मैं भी जानता हूं , पहले इसकी चर्चा से ही आनन् द मिलता था , अब तो इस पर पांच लाख से एक करोड़ रूपए तक इनाम भी मिल रहा है । गाली देने वाले के शरीर का कोई भी अंग लाओं और उसके तुलना में इनाम भी ले जाओ । इसमें जीभ और गला की कीमत सबसे ज्यादा है । चलो मैं भी इसी प्रयास में लगता हूं । राम - राम ............... ।

Share on Google Plus

0 comments:

Post a Comment