जितने भी महापुरूश हुए हैं उनका जन्म कहीं पर्वतों में हुआ कहीं कारागार में। भगवान कृश्ण का जन्म किसी उॅचे भवन में नहीं हुआ था बल्कि उनके मामा कंस के कारागार में हुआ। महाराजा कंस उग्रसेन के पुत्र थे जो बड़े अभिमानी तथा क्र्रूर षासक थे। एक बार नारद जी से कंस ने पूंछा था कि महाराज मेरी मृत्यु कैसे होगी तो उन्होंने बताया दिया था कि जो तुम्हारी सबसे लाडली बहन देवकी है उसके गर्भ से सातवे स्थान पर एक पुत्र होगा वही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। यही बिचार कर कंस ने देबकी और उनके पति वासुदेव को अपने कारागार में डाल दिया था। कि मैं देवकी के पुत्र के होते ही मार डालूंगा तो मेरी मृत्यु कैसे होगी ?
इसीलिये कंस एक-एक करके देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुई 6 संतानों की हत्या अपने सेवकों से कराता गया। लेकिन जव सातवे गर्भ की स्थापनपा माता देवकी के गर्भ में हुई तो महाराज कंस के अत्याचारों के कारण समाज में बड़ी क्रांति आयी अैार चारों ओर देवकी के सातवें गर्भ से पैदा होने वाले बालक को बचाने के लिये समाज में चिंता होने लगी। चारों ओर देवकी के अजन्मे बालक की रक्षा के लिये प्रभु से प्रार्थना होने लगी और उसे बचाने के लिये उपाय सोचे जाने लगे। इस प्रार्थना का असर हुआ । तय यह हुआ कि जिस दिन बालक का जन्म होवे उसे लेकर यमुना पर आ पहुंचे और बालक की अदला बदली कर लें।
एक बार जव माता देवकी की यषोदा से मुलाकात हुई तो यषेादा ने देवकी से कहा ‘भेाजक प्रचेः अक्रतानम् पुत्रोः गर्तानि पुत्र अन्य कृतानि अकतिति’ अर्थात उन्होंने कहा कि मैं गर्भवती हूं। मेरे यदि पुत्री होगी तो मैं तुम्हें अर्पित कर सकती हूं और तुम अपने पुत्र को मेरे यहां अर्पित कर देना। दौनों का इसी तरह का संकल्प हो गया था। जव कारागार में कृश्ण का जन्म हुआ तो प्रभु की कृपा से कारागार के सभी सेवक गहरी निद्रा में सो गये और देवकी और वासुदेव के सभी बंधन खुल गये। बालक कृश्ण के जन्म होते ही वासुदेव उसे एक स्वच्छ पात्र में लेकर यमुना की ओर गये तथा बालक को यषोदा के यहां छोड. आये । लौटते हुए वे यषोदा के यहां जन्मी कन्या को अपने साथ ले आये। सुवह होते ही कृश्ण को बालक के पैदा होने की सूचना दी गयी। कंस आया और उसने देवकी से पूंछा कि पुत्र हुआ है या पुत्री। पुत्री के जन्म लेने की सूचना के बाबजूद भी कंस ने उसे अपने हाथों में लिया और उसकी हत्या कर दी।
अगले दिन कंस महाराज के यहां नारद आये और देवर्शि नारद ने पूछा कि कहिये भगवन कैसे हैं, तो कंस ने कहा कि देवकी के यहां कन्या हुई थी ,मैंने स्वयं उसे नश्ट कर दिया। देवर्शि नारद बोले कि हे महाराज कंस आपकी मृत्यु का कारण तो पैदा हो गया है और वह यषोदा माता के यहां चला गया है। वह नश्ट नहीं हो सकेगा। तव कंस ने नाना क्षत्रियो को इकट्ठा किया और कहा कि जाओ उसे नश्ट करके आओ। लेकिन वह कैसे नश्ट हो सकता हैं। महा पुरूशों की महिमा अलौकिक हुआ करती है। उसका जीवन अलौकिक होता है तथा उनके नेत्र और सभी इंद्रियों की प्रतिभा अलौकिक होती हेैं उसकी अलौकिकता को कोई नश्ट नहीं कर सकता।
बालक कृश्ण बचपन से ही बड़े तीब्र बुद्धि के थे वे अपने सभी कार्य बड़ी बुद्धिमत्ता से किया करते थे। जितना उनका जीवन बलिश्ठता और चातुर्य का था वहीं उतना ही योगिक था। कहने का तात्पर्य यह है कि वे सोलह कलाओं को जानते थे। शेाडष (16) कला अर्थात ज्ञान में पारंगत। शेाडष कला क्या होती है ? इसे अगले अंक में जानेंगे।
सत्यपाल सिंह चोहान।
इसीलिये कंस एक-एक करके देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुई 6 संतानों की हत्या अपने सेवकों से कराता गया। लेकिन जव सातवे गर्भ की स्थापनपा माता देवकी के गर्भ में हुई तो महाराज कंस के अत्याचारों के कारण समाज में बड़ी क्रांति आयी अैार चारों ओर देवकी के सातवें गर्भ से पैदा होने वाले बालक को बचाने के लिये समाज में चिंता होने लगी। चारों ओर देवकी के अजन्मे बालक की रक्षा के लिये प्रभु से प्रार्थना होने लगी और उसे बचाने के लिये उपाय सोचे जाने लगे। इस प्रार्थना का असर हुआ । तय यह हुआ कि जिस दिन बालक का जन्म होवे उसे लेकर यमुना पर आ पहुंचे और बालक की अदला बदली कर लें।
एक बार जव माता देवकी की यषोदा से मुलाकात हुई तो यषेादा ने देवकी से कहा ‘भेाजक प्रचेः अक्रतानम् पुत्रोः गर्तानि पुत्र अन्य कृतानि अकतिति’ अर्थात उन्होंने कहा कि मैं गर्भवती हूं। मेरे यदि पुत्री होगी तो मैं तुम्हें अर्पित कर सकती हूं और तुम अपने पुत्र को मेरे यहां अर्पित कर देना। दौनों का इसी तरह का संकल्प हो गया था। जव कारागार में कृश्ण का जन्म हुआ तो प्रभु की कृपा से कारागार के सभी सेवक गहरी निद्रा में सो गये और देवकी और वासुदेव के सभी बंधन खुल गये। बालक कृश्ण के जन्म होते ही वासुदेव उसे एक स्वच्छ पात्र में लेकर यमुना की ओर गये तथा बालक को यषोदा के यहां छोड. आये । लौटते हुए वे यषोदा के यहां जन्मी कन्या को अपने साथ ले आये। सुवह होते ही कृश्ण को बालक के पैदा होने की सूचना दी गयी। कंस आया और उसने देवकी से पूंछा कि पुत्र हुआ है या पुत्री। पुत्री के जन्म लेने की सूचना के बाबजूद भी कंस ने उसे अपने हाथों में लिया और उसकी हत्या कर दी।
अगले दिन कंस महाराज के यहां नारद आये और देवर्शि नारद ने पूछा कि कहिये भगवन कैसे हैं, तो कंस ने कहा कि देवकी के यहां कन्या हुई थी ,मैंने स्वयं उसे नश्ट कर दिया। देवर्शि नारद बोले कि हे महाराज कंस आपकी मृत्यु का कारण तो पैदा हो गया है और वह यषोदा माता के यहां चला गया है। वह नश्ट नहीं हो सकेगा। तव कंस ने नाना क्षत्रियो को इकट्ठा किया और कहा कि जाओ उसे नश्ट करके आओ। लेकिन वह कैसे नश्ट हो सकता हैं। महा पुरूशों की महिमा अलौकिक हुआ करती है। उसका जीवन अलौकिक होता है तथा उनके नेत्र और सभी इंद्रियों की प्रतिभा अलौकिक होती हेैं उसकी अलौकिकता को कोई नश्ट नहीं कर सकता।
बालक कृश्ण बचपन से ही बड़े तीब्र बुद्धि के थे वे अपने सभी कार्य बड़ी बुद्धिमत्ता से किया करते थे। जितना उनका जीवन बलिश्ठता और चातुर्य का था वहीं उतना ही योगिक था। कहने का तात्पर्य यह है कि वे सोलह कलाओं को जानते थे। शेाडष (16) कला अर्थात ज्ञान में पारंगत। शेाडष कला क्या होती है ? इसे अगले अंक में जानेंगे।
सत्यपाल सिंह चोहान।



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