नई दिल्ली ( विशेष संवाददाता ) सजायाफ्ता नेताओं को जीवन भर चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग पर हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। हाइकोर्ट ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर विचार करते हुए दिया है। याचिका में जनप्रतिनिधि कानून के कुछ मौजूदा प्रावधानों को चुनौती देते हुए किसी अपराध में दोषी ठहराए गए नेताओं को आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की गई है।
इसमें कहा गया है कि किसी भी लोक सेवक या न्यायाधीशों को एक सप्ताह के लिए भी सजा हो जाती है तो उनको नौकरी से निकाल दिया जाता है तो नेताओं को भी सजा होने पर जीवन भर के लिए चुनाव लड़ने पर रोक क्यों नहीं लगाई जाए। चीफ जस्टिस जी रोहिणी और जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की पीठ ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय और संसदीय कार्य मंत्रालय को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा है। पीठ के समक्ष अधिवक्ता अश्वनि उपाध्याय की ओर से यह याचिका दाखिल की गई है।
याचिका में जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 8 और 9 को असंवैधानिक ठहराने की मांग की गई है। इस अधिनियम की धारा 8 और 9 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि आपराधिक घटना में दोषी ठहराए जाने के छह साल बाद व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता उपाध्याय ने कहा कि किसी को अयोग्य घोषित करने के लिए कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के लिए अलग-अलग नियम नहीं अपनाए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा है कि ऐसे में जनप्रतिनिधि अधिनियम की धारा 8 और 9 (संसद व विधानसभा) से अयोग्य घोषित करने का प्रावधान न सिर्फ असंवैधानिक है बल्कि लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन भी है। याचिका में कहा गया है कि जब कार्यपालिका और न्यायपालिका में किसी को दोषी ठहराया जाता है तो उसे जीवनभर के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है, ऐसे में विधायिका यानी चुनाव लड़ने के लिए नेताओं के लिए अलग नियम कैसे अपनाए जा सकते हैं।
हाईकोर्ट में दाखिल इस याचिका में चुनाव लड़ने वाले नेताओं की न्यूनतम योग्यता तय करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि देश में चपरासी बनने के लिए भी न्यूनतम योग्यता तय है जबकि उनको सिर्फ कोई लिखा पढ़ी का कार्य नहीं करना है तो फिर सांसद और विधायक बनने के लिए योग्यता क्यों नहीं जबकि उन्हें कानून बनाना होता है। अधिवक्ता उपाध्याय ने जनप्रतिनिधि कानून की के धारा- 8 को रद्द करने की मांग की है। इस धारा के तहत ही नेताओं के चुनाव लड़ने किसी शैक्षणिक क योग्यता नहीं होने का प्रावधान है।



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