संपादकीय
उत्तर प्रदेश में एक बार फिर चुनावी समर के लिए सभी पार्टियां अपनी तैयारी जोर - शोर से शुरू कर दी है । लगता है कि अगामी चुनाव में भी भाजपा राम के साथ - साथ अब कृष्ण को ही अपना हथियार बनाने की तैयारी कर रही है, लेकिन इस बार ब्राह्मण वोट को अपने तरफ साधने के लिए राज्य में सतारूढ़ सपा पार्टी भी राम नामक हथियार पर सिर्फ भाजपा की ही कब्जा नहीं अपनी भी कब्जा़ दिखाना चाहती है । एक तरफ केंद्र सरकार वहां रामायण संग्रहालय बनाने जा रही है तो दूसरी तरफ सपा सरकार ने रामकथा पर एक इंटरनेशनल थीम पार्क बनाने का फैसला किया है । हालांकि दोनों पार्टियां इस बात से इंकार कर रही है कि इन फैसलों के पीछे उनकी कोई चुनावी रणनीति है । सोचने वाली बात है कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों को अब चुनाव के दौरान ही राम और कृष्ण की याद क्यों आई ? जहां सपा सरकार रामकथा पर थीम पार्क बनाने केे लिए 22 करोड़ की बजट खर्च कर रही हैं, वहीं केंद्र सरकार रामायण संग्रहालय बनाने के लिए 225 करोड़ रूपए। आखिर कारण क्या है कि दोनों एक दूसरे से होड़ कर इतना रूपया राम रूपी हथियार में धार चढ़ाने के लिए खर्च कर रही हैं । देखा जाए तो कुछ समय पहले देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के अयोध्या दौरे ने एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा गरमा दिया है । उमा भारती के साथ विनय कटियार ने राम मंदिर निर्माण के लिए लोकसभा में कानून पास किए जाने की मांग कर डाली है । बसपा, कांग्रेस, द्रुमक तीनों पार्टियां भाजपा सरकार के संग्रहालय संबंधी कदम में धर्म की राजनीति से घालमेल करने की कोशिश के रूप में देख रही है तो सपा इसमें अपने लिए अवसर की तलाश कर रही है । अब तो भाजपा राम के सथ - साथ कृष्ण को भी दोधारी तलवार के तरह इस्तमाल करने की तैयारी में लगी है ताकि दोनों तरफ का निशाना अचूक बन सके । अयोध्या के बाद मथुरा - वृंदावन इलाके को भी चमकाने का प्रयास किया जा रहा है । केंद्र सरकार ने यूपी सरकार को मथुरा - वृंदावन के लिए हाल ही में 15 करोड़ की राशि मंजूर की है । इससे पहले भी केंद्र ने इस मद में यूपी को लगभग 29 करोड़ रूपये जारी कर चुका है । सरकार ने पैसा जारी करने के साथ ही यूपी सरकार से कहा है कि दूसरे फेज के काम में तेजी लाई जाए । उधर बसपा की मायावती का कहना है कि अयोध्या का विकास तो ठीक है, लेकिन ऐन चुनाव के मौके पर भाजपा को रामायण संग्रहालय और राम मंदिर तथा सपा की राज्य सरकार को रामायण थीम पार्क की याद क्यों आने लगी । दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता आरपीएन सिंह कहते हैं कि भाजपा को हर पांच साल बाद भगवान राम याद आते हैं । सपा के रामकथा पर इंटरनेशनल थीमपार्क के पीछे 2014 के लोकसभा चुनाव का कड़वा अनुभव भी हो सकता है । लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा दोनों क्षेत्रिय पार्टियों को भारी नुकसान हुआ इसके पीछे भाजपा का हिन्दुत्व एजेंडा मुख्य माना गया था । सपा को लग रहा है कि मुस्लिम वोट पर तो उसकी पकड़ है ही अब एक जाति समुदाय से उपर उठकर ठाकुर और ब्राह्मणों को अपने तरफ खींचा जाए ताकि इस चुनाव में वैतरणी पर हो सके । सपा भाजपा के पाले में खींच रहे वोटों को अपने तरफ लाने के जुगत में रामकथा थीम पार्क के साथ ही कृष्ण जन्मस्थली इलाके को भी भुनाने में लगी है । भाजपा के लिए हालांकि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा बेअसर हो गया लगता है, लेकिन चुनाव से पहले इसे भुनाने के लिए हर बार कोई - न - कोई जुगत जरूर भिड़ाती है । राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के एजेंडा का एक हिस्सा है। परन्तु गैर भाजपा दलों को यह लगता है कि भाजपा अब राम मंदिर के मुद्दे पर फिर उत्तर प्रदेश में सरकार नहीं बना पायेगी । जबकि भाजपा इसी को अगामी चुनाव में भी अपना धारदार हथियार के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रही है । एक बार फिर विकास का नारा लगाने वाले नरेन्द्र मोदी लखनऊ में दशहरे के मौके पर ‘ जय श्रीराम ’ का नारा लगा कर यह जता दिए है कि भाजपा न तो राम को भूली है और न ही राम मंदिर को, बल्कि अगामी चुनाव में भाजपा का मुख्य हथियार राम और कृष्ण ही हो सकते हैं । सपा भी इसमें अपने फायदे का मायने तलाशने में लगी है । यानी धर्म की घालमेल से अगामी चुनाव को अलग नहीं कर सकते ।
संजय त्रिपाठी




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