आतंकवाद पर राजनीति करना हमारे देश में नयी बात नहीं है। अभी सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये आतंकवादियों को मार गिराने पर राजनीति हो ही रही थी कि मध्य प्रदेश में प्रतिबंधित संगठन सिमी के आठ फरार सदस्यों के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर नया विवाद शुरू हो गया है। मध्य प्रदेश सरकार जहां अपनी पुलिस की पीठ ठोंक रही है वहीं कांग्रेस, एआईएमआईएम, आम आदमी पार्टी और कुछ अन्य दलों के नेताओं ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए न्यायिक जाँच की मांग की है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुठभेड़ पर सियासत करने वाले नेताओं को लताड़ते हुए कहा है कि वोट बैंक की राजनीति करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा है लानत है ऐसी राजनीति पर और ऐसे राजनेताओं पर। विवाद को शांत कराने के लिए उन्होंने केंद्र सरकार से मामले की जांच एनआईए से कराने का अनुरोध किया है जिसे स्वीकार कर लिया गया है।
मुठभेड़ पर सवाल उठाने वालों से सवाल यह है कि इस मुठभेड़ को क्यों विवादित बनाया जा रहा है? सवाल उठाने वालों को उस पुलिस वाले की शहादत क्यों नहीं दिखती जिसकी जेल में हत्या कर सिमी आतंकी भागे थे? जिन सिमी सदस्यों पर देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप थे उनके पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर कुछ राजनीतिक दल दुःखी क्यों हैं? दुर्भाग्यपूर्ण है कि पुलिसकर्मी की शहादत पर बयान देने से पहले यह दल मारे गये आतंकियों के साथ सहानुभूति दर्शाते दिखे। सवाल उठाने वालों में वही लोग हैं जिन्होंने बाटला एनकाउंटर को भी फर्जी मुठभेड़ बताया था और कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता तो यहां तक कह गये थे कि इस घटना के बाद उनकी पार्टी प्रमुख की आंखों में आंसू आ गये थे।
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने सवाल उठाने में तो देरी नहीं की लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने ही सिमी को प्रतिबंधित संगठन की सूची में डाला था। उन्हें सिमी की गतिविधियों और उसकी मंशा के बारे में अच्छे से पता है इसलिए आतंक पर राजनीति करने से उन्हें बचना चाहिए। लेकिन उनसे ऐसी कोई उम्मीद करना बेमानी है क्योंकि वह हर उस घटना को विवादित बनाने में माहिर हैं जिसमें सुरक्षा बलों या पुलिस ने कोई बड़ी कामयाबी हासिल की हो। दिग्विजय सिंह ने बाटला एनकाउंटर मुठभेड़ के बाद शहीद मोहन चंद शर्मा को श्रद्धांजलि दी या नहीं इसके बारे में शायद ही कोई जानता हो लेकिन दुनिया यह जरूर जानती है कि वह बाटला एनकाउंटर में मारे गये आतंकवादियों के आजमगढ़ स्थित घरों में जाकर जरूर शोक और सहानुभूति जताकर आये थे। ओसामा बिन लादेन को 'ओसामाजी' कहने वाले एकमात्र शख्स भी शायद दिग्विजय सिंह ही हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे देश में पुलिस मुठभेड़ों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं और कई बार ऐसी मुठभेड़ें फर्जी भी पाई गई हैं। मध्य प्रदेश में भी जो कुछ हुआ उसके बारे में कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो पुलिस की कहानी से अलग दृश्य दर्शा रहा है और मात्र सात घंटों में सिमी सदस्यों के पास अच्छे कपड़े और हथियार कहां से आ गये इसको लेकर भी सवाल है। पुलिस ने सभी तथ्यों को जांच में शामिल करने की बात कहते हुए मुठभेड़ में मौतों पर आलोचनाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि दोनों तरफ से भारी गोलीबारी हुई जिसमें सिमी सदस्य मारे गए और उसके बाद उनके पास से चार देशी बंदूकें और कुछ धारदार हथियार बरामद किए गए।
मध्य प्रदेश की किसी जेल से पहली बार सिमी सदस्य भागे हों ऐसा नहीं है बल्कि इससे पहले 1 अक्तूबर 2013 को प्रदेश के ही खंडवा की एक जेल से इस संगठन के सात सदस्य भागने में कामयाब रहे थे। इनमें से चार को तीन साल तक छिपे रहने के बाद मुश्किल से पकड़ा गया था और इन तीन साल में ये लोग आतंकवाद और बैंक लूटपाट की घटनाओं में लिप्त थे। अभी जो सिमी के आठ सदस्य भागे थे वह अब क्या कहर बरपाते इसकी कल्पना करना मुश्किल है क्योंकि आतंकवाद का स्वरूप साल दर साल बदलता जा रहा है। एक सवाल मध्य प्रदेश की जेलों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी है कि कैसे इतनी बड़ी संख्या में कैदी आसानी से भाग जाते हैं। भोपाल जैसी अति सुरक्षित जेल से आठ कैदी पुलिसकर्मी की हत्या कर भागने में सफल हो गये यह जेल प्रशासन को संदेह के घेरे में लाता है। संभव है जेल प्रशासन के कुछ लोगों ने मदद की हो, जांच में जो भी इसका दोषी पाया जाये उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए।
बहरहाल, हमारे राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि हर बार किसी पुलिस मुठभेड़ में मारे गये लोगों को उनके धर्म विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाए क्योंकि किसी घटना को ‘वोट बैंक’ की राजनीति से जोड़ देना आतंकवादियों से मुकाबला करने वाले सुरक्षा बलों के मनोबल को प्रभावित करने का प्रयास होता है। मानवाधिकार की बात उठाना जायज है लेकिन उसकी आड़ में अपने लक्ष्य साधने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वैसे, यह मामला अभी इतनी जल्दी ठंडा पड़ने वाला नहीं है क्योंकि सियासी दलों के पास फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।
नीरज कुमार दुबे




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