पटना : नोटबंदी से राज्य से बाहर काम करनेवाले बिहार के कामगारों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है. काम बंद होने से मजबूरी में उन्हें घर लौटना पड़ रहा है. आठ-10 वर्ष पहले भी दूसरे प्रदेशों में काम करनेवाले बिहार के कामगार बड़ी संख्या में घर लौटे थे, लेकिन उस समय वे बिहार के हालत में जो सुधार आया था, उससे प्रेरित होकर लौटे थे. उन्हें एक उम्मीद बंधी थी कि यहीं पर उनके लिए रोजी-रोटी का बेहतर प्रबंध हो पायेगा.
बिहार के अधिकतर लोग दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मुंबई आदि जगहों पर बड़ी संख्या में बिहार के मजदूर काम करते हैं. वहां वे प्रमुख रूप से साइकिल फैक्टरी, होजरी, निर्माण, हीरा कटिंग के अलावा अन्य लघु व कुटीर उद्योगों में काम करते हैं. अधिकतर को कैश में ही मजदूरी या वेतन मिलता है. नोटबंदी के बाद मांग की कमी के कारण उनकी अचानक फैक्टरी बंद हो गयी है या मालिक ने कैश की कमी के नाम पर काम लेना बंद कर दिया है, जिसके कारण उन्हें घर लौटना पड़ रहा है.
कटिहार जिले के कोरहा ब्लॉक के रौतारा गांव के धर्मेंद्र पिछले पांच वर्षों से आंध्रप्रदेश के करीमनगर में रहते थे. वहां वह एक राइस मिल में पैकिंग के साथ-साथ लोडिंग व अनलोडिंग का काम भी करते थे. नोटबंदी के बाद ठेकेदार ने मजदूरी देना बंद कर दिया, तो उन्हें लौट जाना पड़ा. छह दिसंबर को एर्णाकुलम एक्सप्रेस से पटना जंकशन पर उतरे धर्मेंद्र ने बताया कि ठेकेदार मुझे हर माह 12500 रुपये पारिश्रमिक देता था. इसी से कटिहार में रह रहे मेरे परिवार का खर्च चलता था. नोटबंदी के बाद ठेकेदार ने मजदूरी देना बंद कर दिया. पैसा मांगा, तो कहा कि कुछ दिनों के लिए घर चले जाओ. स्थिति सामान्य हो जायेगा, तो बुला लेंगे. ऐसे में मुझे घर लौटना पड़ा.
500 और 1000 के पुराने नोट दे रहा था मालिक, मना करने पर निकाल दिया काम से
दरभंगा के बेनीपुर प्रखंड के महिनाम गांव के महाकांत प्रसाद गुजरात के सूरत में एक कपड़ा मिल में काम करते थे. इसी के बल पर वह अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे. लेकिन, नोटबंदी ने उनका रोजगार छीन लिया. नोटबंदी के बाद मालिक ने मजदूरी के तौर पर उन्हें 500 व 1000 के नोट दिये. उन्होंने जब इसे लेने से मना किया, तो उसने साफ कह दिया कि लेना है तो लो, वरना जाओ. मजबूरन पुराने नोट लेने पड़े, पर ये नोट महाकांत के लिए कागज के टुकड़े साबित हुए. वहां कोई भी ये नोट लेने को तैयार नहीं हो रहा था. सूरत में उनका कोई बैंक खाता भी नहीं था. आलम यह हो गया कि जेब में नोट रहने के बावजूद वह एक कप चाय तक के लिए तरस गये. आखिरकार महाकांत लौट आये. भूखे-प्यासे सफर किया. घर लौटने के बाद जान में जान आयी. कुछ ऐसी ही समस्या सोनपुर उजान के मनोज कुमार महतो को झेलनी पड़ी. मालिक ने आठ हजार रुपये तो दिये, लेकिन सभी पुराने नोट ही थे. काफी आरजू-मिन्नत के बाद भी कोई लेने के लिए तैयार नहीं हुआ. इस कारण मालिक से तू-तू, मैं-मैं भी हो गयी. मजबूरन काम छोड़ घर लौट जाना पड़ा.



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