नई दिल्ली। सरकार ने 500 और 1000 के पुराने नोटों की बंदी को सही ठहराते हुए सुप्रीमकोर्ट में कहा है कि उसने कानून के दायरे में और जनहित में ये फैसला लिया है। सरकार को ऐसा करने का कानूनन अधिकार है। सरकार की इस कार्रवाई से लोगों को संविधान के अनुच्छेद 300ए में मिले संपत्ति के अधिकार का हनन नहीं होता। सरकार ने सिर्फ जनता के अधिकारों को रेगुलेट (नियमित) किया है उन्हें उससे वंचित नहीं किया है।
सरकार ने यह बात गुरुवार को नोट बंदी के फैसले को चुनौती देने वाली विवेक नारायण शर्मा की याचिका के जवाब में दाखिल हलफनामे में कही है। सरकार ने कोर्ट से याचिका खारिज करने का अनुरोध किया है। मामले में शुक्रवार को सुनवाई होगी।
नोट बंदी मामले में सरकार का यह दूसरा हलफनामा है। नये हलफनामे में नोटबंदी की जरूरत और उद्देश्य बताते हुए एक बार फिर कालाधन बाहर निकालने और नकली भारतीय मुद्रा पर लगाम लगाने की बात कही गई है। फैसले के समर्थन में सरकार ने कालाधन पर बनी एसआइटी की रिपोर्टो का भी हवाला दिया है जिसमें कालेधन पर रोक के लिए नगदी रखने की सीमा 10 या 15 लाख करने की सिफारिश है। सरकार ने कहा है कि आरबीआई कानून के तहत आरबीआई और केन्द्र सरकार को ऐसा करने का अधिकार है।
सरकार ने ये फैसला कार्यकारी आदेश के जरिये नहीं बल्कि संसद द्वारा पास कानून में मिली शक्ति के तहत किया है। आरबीआई कानून की धारा 7 में केंद्र सरकार आरबीआइ गर्वनर से परामर्श करके आरबीआई को जनहित में निर्देश दे सकती है।



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