विरासत की सियासत पर हक़ को लेकर पहले भी रहे हैं विवाद By अजय कुमार Also on the right are the heritage of the political debate




अजय कुमार
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में चुनाव के लिये अधिसूचना जारी होने के साथ ही अखिलेश सरकार की तेजी पर लगाम लग गया है। अब अखिलेश को सरकार चलाने की बजाये पूरी तरह से चुनावी संग्राम जीतना होगा। उनके सामने बसपा सुप्रीमो मायावती की चुनौती होगी। भाजपा के तेजतर्रार नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम के अन्य सदस्यों से चुनावी दंगल में दो−दो हाथ करने पड़ेंगे। यूपी में कांग्रेस की चुनौती को लेकर भले ही अखिलेश टीम ज्यादा चिंतित न हो, मगर पिता से मुलायम के खिलाफ बगावत करना अखिलेश के लिये असुविधाजनक होगा। कुछ समय के लिये मान लिया जाये कि अगर मुलायम अपने बेटे अखिलेश के खिलाफ यह बयान दे देते हैं कि जिस बेटे को हमने आगे बढ़ाया, सीएम बनाया उसी ने हमारी पीठ में छूरा भोंक दिया तो क्या स्थिति होगी। मुलायम यह भी कह सकते हैं कि जिस बाप से अखिलेश को बैर है उसकी सियासी विरासत पर वह क्यों अपना दावा ठोंक रहे हैं। मुलायम के ऐसे किसी भी बयान का अखिलेश की सियासत पर दूरगामी असर पड़ सकता है। उनका खेल बिगड़ सकता है। 11 मार्च 2017 को जब चुनाव के नतीजे आयेंगे तो यह भी पता चल जायेगा कि कौन कितने पानी में है।

खैर, मुलायम−अखिलेश के बीच जो जंग चल रही है वह भले ही लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनी हो, लेकिन हमारी सियासत की यह विडंबना है कि पूरे देश में इस तरह के नजारे अक्सर देखने को मिल जाते हैं। बस, थोड़ा−बहुत स्वरूप बदला होता है। कभी कोई बेटा अपने बाप की सियासी विरासत पर दावा ठोंकता है तो कभी कोई शिष्य अपने गुरु की सियासी पूंजी पर कब्जा जमा लेता है। विरासत की सियासत में तमाम राजनैतिक दल कभी पीछे नहीं रहे हैं। विरासत की इस जंग ने महापुरुषों और बड़े−बड़े नेताओं, स्वतंत्रता सेनानियों से लेकर भगवान तक को बांट दिया है। इसीलिये कांग्रेस महात्मा गांधी से लेकर सरदार पटेल तक पर अपनी दावेदारी ठोंकती है। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी तो उसके (कांग्रेस) हैं ही। बसपा बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम को, समाजवादी नेता डॉ. लोहिया, जय प्रकाश नारायण, राजनारायण को अपना बताते हैं तो भाजपा भगवान राम और कृष्ण से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, केशव बलिराम हेडगेवार, सावरकर आदि तमाम नेताओं के करीब अपने आप को देखती है। कोई दल किसी महापुरूष या कद्दावर नेता पर अपनी दावेदारी ठोंकता है तब तो कोई खास कोहराम नहीं सुनाई देता है लेकिन जब दावेदारी व्यक्तिगत स्तर पर ठोकी जाती है तो मुलायम−अखिलेश की जंग के रूप में सामने आती है। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर को लेकर भी उनके पुत्रों के बीच विवाद हुआ था। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और उनके पुत्र जिसे तिवारी अपना बेटा ही नहीं स्वीकार कर रहे थे, दोनों के बीच लम्बी कानूनी लड़ाई चली थी, अंत में रोहित शेखर की जीत हुई थी।

35 साल की अनुप्रिया पटेल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोकप्रिय कुर्मी नेता सोनेलाल पटेल की बेटी हैं। अपना दल के संस्थापक सोनेलाल का 2009 में निधन हो गया था। पिता की मौत के बाद मां−बेटी के बीच राजनीतिक विरासत को लेकर जंग हुई। इस जंग में मां कृष्णा पटेल के साथ पार्टी थी तो बेटी अनुप्रिया को मिला मोदी−शाह का साथ। नतीजा ये कि अनुप्रिया आज केंद्र में मंत्री हैं और मां कृष्णा उनकी ताजपोशी के विरोध में एनडीए से अलग होने तक की धमकी दे रही हैं। इन दोनों का भी झगड़ा चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंच गया है।

आम तौर पर खामोश रहने वाले पूर्व अमेठी रियासत के राजा और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह के महल 'भूपति भवन' का नजारा भी कुछ वर्ष पूर्व बदला−बदला सा नजर आया था। पारिवारिक विवाद के चलते महल पर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया था। हजारों की तादाद में गांव की जनता अपना काम छोड़कर महल के बाहर 18 बरस बाद अपनी 'रानी' और उनकी पहली पत्नी 58 वर्षीया गरिमा सिंह को देखने के लिए इकट्ठा हो गई थी। नारों से आसमान गूंज उठा, "रानी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।" दरअसल, पिछले 18 साल से लखनऊ में रह रहीं संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा अचानक एक सुबह अपने पुत्र और पूर्व अमेठी रियासत के वारिस अनंत विक्रम सिंह, पुत्रवधू और छत्तीसगढ़ के अकलतारा राजघराने की बेटी शांभवी, पौत्र अधिराज सिंह, बड़ी बेटी और झाबुआ राजघराने की बहू महिमा सिंह, छोटी बेटी और डूंगरपुर राजघराने की बहू शैव्या सिंह को लेकर रामनगर इलाके में मौजूद अमेठी रियासत के महल भूपति भवन पहुंच गईं।

संजय सिंह की दूसरी पत्नी और अमेठी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व विधायक अमीता सिंह के प्रतिनिधि और महल की देखरेख करने वाले कर्मचारियों को जब गरिमा के जबरन महल में दाखिल होने की सूचना मिली तो ये लोग भी हथियार लेकर वहां पहुंच गए। अनंत से उनकी झड़प भी हुई। इसी बीच गरिमा के महल में आने की सूचना मिलते ही अगल−बगल के लोग उनके समर्थन में आ गए। अचानक उनके बचाव में भीड़ को आता देख अमीता के आदमी हवाई फायरिंग करते हुए भाग निकले। इसके बाद अनंत ने अमेठी थाने में अमीता के 12 समर्थकों को नामजद करते हुए मारपीट, महिलाओं के साथ अभद्रता और उन्हें बंधक बनाने का मुकदमा दर्ज करा दिया। अगले दिन अमीता के समर्थकों ने भी अनंत समेत नौ लोगों पर लूटपाट और महल पर अवैध कब्जे का मुकदमा दर्ज कराया। दोनों तरफ से मुकदमा दर्ज होने के साथ ही अमेठी रियासत के इतिहास में यह पहला मौका था, जब विरासत से जुड़ा विवाद चारदीवारी से निकलकर बाहर सड़क पर आ गया।

इसी प्रकार पितृत्व विवाद में फंसने के बाद 2014 में रोहित शेखर को अपना बेटा मानने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वरिष्ठ कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी ने रोहित की मां उज्ज्वला शर्मा से विधिवत विवाह कर लिया था। 89 वर्षीय तिवारी ने लखनऊ स्थित अपने आवास पर उज्ज्वला से विधिवत विवाह कर लिया। उज्ज्वला रोहित शेखर की मां है, जिन्होंने तिवारी से पितृत्व के दावे को लेकर अदालत की लड़ाई लड़ी थी और उसमें उन्हें जीत हासिल हुई थी। उसके बाद तिवारी ने रोहित को सार्वजनिक रूप से अपना बेटा मान लिया था। पितृत्व विवाद सुलझने के बाद उज्ज्वला शुरुआती गतिरोध के बाद हाल में तिवारी के लखनऊ स्थित घर में रहने लगी थीं। तिवारी तीन बार उत्तर प्रदेश के जबकि एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वह विदेश मंत्री का पद भी संभाल चुके हैं। वह वर्ष 2007 से 2009 के बीच आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी रहे, लेकिन सेक्स स्कैंडल में फंसने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। आजकल नारायण दत्त तिवारी प्रयासरत हैं कि किसी तरह से रोहित शेखर सियासत में स्थापित हो जाये। हो सकता है कि आगामी चुनाव में रोहित ताल ठोंकते दिखाई दें।

बात कांग्रेस की कि जाये तो यह परिवार भी इंदिरा गांधी की मौत के बाद विरासत की जंग से बच नहीं पाया था। इंदिरा गांधी ने अपने पुत्र संजय सिंह की मौत के बाद संजय की पत्नी और बेटे वरूण गांधी को घर से बेदखल कर दिया था, लेकिन इंदिरा की मौत के बाद मेनका गांधी ने इंदिरा की विरासत हासिल करने की काफी कोशिश की पर वह सफल नहीं हो सकीं। पिता−पुत्र से हटकर सियासी गुरुओं और शिष्यों के बीच की लड़ाई भी यूपी की सियासत में चर्चा बटोरती रही। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण की सियासी विरासत पर उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह तो दावेदारी ठोकते ही थे वहीं मुलायम सिंह यादव भी अपने आप को चरण सिंह की सियासी विरासत का हकदार मानते थे। इसको लेकर कई बार मुलायम और अजित सिंह के बीच तकरार भी देखने को मिल चुकी है। इसी तरह की चर्चा मान्यवर कांशीराम और मायावती को लेकर हुआ करती थीं। मायावती पर अक्सर आरोप लगता था कि उन्होंने कांशीराम के अंतिम समय में उन्हें परिवार वालों तक से नहीं मिलने दिया था। मायावती को संदेह रहता था कि कांशीराम किसी और को अपना उत्तराधिकारी न घोषित कर दें।

जहां तक मामला मुलायम और अखिलेश के बीच झगड़े का है तो आज भले ही कुछ लोगों को यह अच्छा न लग रहा हो कि बेटा अखिलेश अपने वृद्ध पिता के साथ नाइंसाफी कर रहा है, लेकिन कहते हैं कि हम आज जो बोते हैं, कल वो ही काटना पड़ता है। अखिलेश ने अपने पिता मुलायम को जिस तरह से हटाकर उनकी कुर्सी पाने की चाल चली है, ठीक वैसी ही चाल मुलायम भी अपने सियासी कैरियर में कई बार चल चुके हैं। जिस भी नेता ने मुलायम की मदद की उन्होंने उसको दांव दिया। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर और राजीव गांधी तक से मुलायम ने दोस्ती की और जब दोस्ती निभाने का मौका आया तो मुलायम साथ निभाने की बजाये उन्हें दांव देकर खुद आगे बढ़ गए।

1989 के विधानसभा चुनाव में जनता दल पूर्ण बहुमत से सत्ता में आया था। अजित सिंह और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। मुलायम ने वीपी सिंह की मदद ली और मुख्यमंत्री बन गए। जिन चौधरी चरण सिंह ने उन्हें आगे बढ़ाया था, मुलायम ने उनके ही बेटे अजित को सियासी दंगल में पटखनी दे दी। वीपी के सहारे मुलायम सीएम तो बने लेकिन उनको भी सूबे में पांव पसारने का मौका नहीं दिया। एक अपवाद को छोड़ दें तो वीपी सिंह प्रधानमंत्री रहते कभी उत्तर प्रदेश नहीं आ सके। इसी तरह 1990 में मुलायम ने मुसलमानों को खुश करने के लिये अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा दी। मुलायम के खिलाफ हिन्दू जनमानस में जबर्दस्त आक्रोश पनप रहा था तो मुलायम को इससे अपना मुस्लिम वोट बैंक मजबूत होता दिख रहा था। तब मुलायम के सहयोगी अजित सिंह जनता दल से अलग हो गए और जनता दल 'ए' बना लिया। मुलायम की सरकार अल्पमत में आ गई। मुलायम दिल्ली पहुंचे और धर्मनिरपेक्षता के खतरे में पड़ने की दुहाई देकर राजीव गांधी से मदद मांगी। राजीव ने साथ दे दिया। इसका असर ये हुआ कि मुलायम तो आगे चलकर मुसलमानों के रहनुमा बन गए और कांग्रेस यूपी से विदा हो गई।

बात 1991 की भी करना जरूरी है। 1991 में जब चुनाव का मौका आया तो मुलायम के पास सिंबल नहीं था। उन्होंने चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा और करीब तीन दर्जन सीटें जीतीं। इसके बावजूद मुलायम ने कभी चंद्रशेखर को नेता नहीं माना और 1992 में चन्द्रशेखर को झिड़क कर समाजवादी पार्टी बना ली। मुलायम ने आगे चलकर बसपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। उन्होंने 1995 में वही दांव मायावती के साथ भी चलने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने मायावती का साथ दे दिया। एक बार तो चुनावी बेला में मुलायम ने हिन्दुत्व के प्रतीक माने जाने वाले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को भी अपने साथ शामिल कर लिया, इससे नाराज होकर आजम खान सपा छोड़कर चले गये लेकिन जब नतीजे सपा के पक्ष में नहीं आये तो मुलायम सार्वजनिक मंचों से कहने लगे कि कल्याण सिंह तो कभी सपा के करीब आये ही नहीं थे।

मुलायम ने एक बार एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के लिये राष्ट्रपति भवन का मार्ग प्रशस्त किया था लेकिन जब 2012 में ममता बनर्जी ने अन्य नेताओं के साथ मिलकर राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को दोबारा राष्ट्रपति बनाने का सियासी दांव चला तो मुलायम कई कदम चलने के बाद अचानक पीछे हट गए और राष्ट्रपति पद के लिये प्रणव दा का समर्थन कर दिया। ममता बनर्जी आज भी मुलायम को इसके लिए दोषी मानती हैं। इस बार लगता है कि इतिहास खुद को दुहरा रहा है। अखिलेश ने अपनी जगह बनाने के लिए मुख्यमंत्री बनने का जो मौका मिला, उसका भरपूर लाभ उठाया। जब देखा कि पिता के साथ रहकर एक सीमा तक ही पार्टी चला सकते हैं और पार्टी के अधिकतर लोग उनके साथ हैं, तो उन्होंने पार्टी पर अधिकार जमा लिया। आज अखिलेश के सामने कोई चुनौती नहीं है। अखिलेश के साथ करीब−करीब पूरी पार्टी ही नहीं जमाना भी खड़ा नजर आ रहा है। उनके सामने उनके पिता असहाय नजर आ रहे हैं। हो सकता है समय के साथ पिता−पुत्र के बीच की खाई पट जाये, मगर सियासत के पन्नों पर तो इसे लिखा ही जायेगा।

 अजय कुमार




Share on Google Plus

0 comments:

Post a Comment