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संजय त्रिपाठी
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नोटबंदी के बाद अब आम जन इस कद्दर नोटों के जाल में इलझता जा रहा है, जिसके कारण बहुत लोग प्रधानमंत्री मोदी और बैंकों को कोस रहे हैं । हालांकि नोटबंदी के दौरान सबसे ज्यादा कष्ट सहने के बाद भी लोग एक नई उम्मीद की आशा में आज भी नोटबंदी को सही ठहराने में लगे हैं । गांव, कस्बों में तो नोटबंदी ने मोदी को हीरो बना दिया है । अभी सरकार और आरबीआई हर तरह से नोटबंदी को आमजन के लिए फायदेमंद बता रही है । लेकिन देखा जाए तो आये दिन आरबीआई और बैंकों के नए फरमानों ने अब आम जन को थोड़ा बहुत सोचने के लिए मजबूर किया है । जो भी अब बैकों व आरबीआई के इन नए फरमानों का शिकार हो रहा है वह दिल भरकार मोदी को कोस रहे है । लोगों को अब समझ में आ रहा है कि आरबीआई और बैंक हर तरह से आम जनता को परेशान कर रहे है, साथ ही उसका आर्थीक, मानसीक शोषण भी कर रहे हैं । अभी दो दिन पूर्व आरबीआई ने एक फरमान जारी किया कि एटीएम से निकले नकली नोट बदला नहीं जायेगा । उपभोक्ता का पैसा बैंक पूरी तरह से मशीन के माध्यम से जांच कर लेता है, लेकिन जब एटीएम से पैसा निकलता है तो उसका कोई जांच - पड़ताल का तरीका नहीं है, ग्राहक के लिए नकली व असली की कोई गरांटी नहीं है । अभी नोटबंदी के बाद चूरन वाला नोट, नकली व बिना नंबर वाले नोटों के निकलने का सिलसिला जारी है । कई शहरों में इस तरह के नोट निकले हैं, जिसके कारण उपभोक्ता के खाता से उतनी रूपए निकल जा रही हैं, जितना उसे नकली नोट एटीएम से प्राप्त हुए है । दिल्ली में एक व्यक्ति ने एटीएम से 8 हजार रूपए निकाले, जिसमें 3 दो हजार के चूरन वाले नोट थे । इस तरह उसे 6 हजार रूपए नकली मिले और उसके खाते से 8 हजार रूपए निकल गए । इस तरह देखा जाए तो उसके साथ 6 हजार रूपए की घोखाधड़ी की गई । अब प्रश्न उठता है कि आरबीआई यह नकली नोट बदलेगी नहीं, और बैंक आरबीआई का हवाला देकर उस उपभोक्ता क साथे कोई सहयोग कर नहीं पायेगी । ऐसे में इस घोखधड़ी की रिपोर्ट वह सरकार, बैक या आरबीआई किसके खिलाफ लिखाए । बाजार में भी आम लोगों को नकली नोट मिल जाता है । उसे यह पता भी नहीं होता कि उसके पास कोई नकली नोट है, क्योंकि अगर नकली नोट का पता चल जाए तो कोई एक या दो किसी से नकली नोट लेगा क्यों ? जब वह बैंक में जमा कराने जाता है तब बैंककर्मियों द्वारा बताया जाता है कि इसमें कितने नोट नकली है । कई बार बैंककर्मी उस व्यक्ति को पुलिस के हवाले कर देते है । इस तरह की घटना के हम खुद भी एक शिकार हैं, जिसके कारण आज भी पुराने 500 और 1000 के दो नोट मेरे पास रखे हुए हैं । बैंक ने इन दोनों नोटों को नकली करार दिया था । नोटबंदी तो देश में नकली नोट का प्रचलन, आतंकियों पर बंदिश लगाने जैसे कई मुद्दों को लेकर की गई थी, फिर भी नोटबंदी के दौरान से लेकर अब कितने नकली नोटों के खेप पकड़े जा चुके है । आखिर सरकार और आरबीआई इसे रोकने के लिए क्या ठोस पहल कर रही है ? आम जनता को यह जानने का हक है कि जो नकली नोट बाजार या एटीएम से उन्हें प्राप्त हो रहे हैं, उसमें उनका क्या दोष है ? आखिर उन्हें इस रकम को लेकर जो चपत लग रहा है , उसका जिम्मेदार कौन है ? एक तरफ आम जनता को इस तरह कि परेशानी झेलनी पड़ रही है तो दूसरी तरफ बैंकों ने अपनी आमदनी को दिन - दूना, रात - चैगुना बढ़ाने के लिए कैश ट्रांजेक्शन के अलावा कुछ और भी चार्ज लगाए हैं । क्या आप जानते हैं कि एचडीएफसी , आईसीआईसीआई , एक्सिस और एसबीआई जैसे बैंकों ने अपने खाताधारकों के लिए न सिर्फ कैश ट्रांजेक्शन (नकद निकासी, जिसमें कैश जमा करना और निकालना दोनों शामिल हैं) को लेकर नए नियम बनाए हैं बल्कि कुछ और चार्ज भी लगाए हैं? जी हां. कहा जा रहा है कि नकदी के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने के लिए बैंकों द्वारा ऐसी पहल की जा रही हैं. आपको एक बार फिर से बता दें कि तय सीमा से अधिक बार कैश ट्रांजेक्शन करने पर आपको अतिरिक्त फीस देनी होगी.। अब एसबीआई के एटीएम से महीने में पांच ट्रांजेंक्शन फ्री, अगले हर ट्रांजेक्शन पर 10 रूपए लगेगे । बैंक अपनी इच्छा से उपभोक्ता से नगद जमा और निकासी पर ट्रांजेंक्शन चार्ज लगा रही है । दूसरी तरफ अपनी जमा रकम निकालने में भी बैंक उपभोक्ता को बंदिश के दायरे में ला रही है । नोटबंदी के समय यह भी सवाल उठा था कि अगर किसी व्यक्ति ने आय कर चुकाने के बाद कोई रकम जमा की है, तो उसे पूरा अधिकार होना चाहिए कि उसे वह किस रूप में खर्च करे। उसे खर्च करने का तरीका बताने की कोशिश सरकार को क्यों करनी चाहिए या फिर बैंकों को उसके खर्च करने के तरीके को नियंत्रित करने का अधिकार क्यों होना चाहिए? अपना ही जमा पैसा अगर कोई व्यक्ति निकालना चाहता है तो उसे बगैर किसी ठोस तर्क के ऐसा करने से क्यों रोका जाना चाहिए? यह ठीक है कि बैंकों का कारोबार अपने ग्राहकों के जमा पैसे से ही चलता है, इसलिए हर खाते में न्यूनतम रकम रखने की शर्त रखी जाती है। फिर बैंक जो सेवाएं उपलब्ध कराते हैं, उनके बदले भी उन्हें शुल्क मिलना चाहिए, मगर ग्राहकों के लिए अपना पैसा निकालने की सीमा तय करके डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की कोशिश उन पर ज्यादती ही कही जाएगी। तमाम अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि भारत जैसे देश में, जहां अधिसंख्य लोग तकनीकी संसाधनों के संचालन से अनभिज्ञ हैं, डिजिटल लेन-देन को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है। एक आंकाड़ा के माध्यम से बताया गया है कि देश में नोटबंदी से पहले 90 प्रतिशत ट्रांजेक्शन नगद में होते थे और 10 प्रतिशत डिजिटल । डिजिटल ट्रांजेक्शन के एवज में सरकार और बैंकों ने पिछले साल 6 हजार 750 करोड़ रूपए शुल्क वसूले थे । इस साल डिजिटल लेनदेन 30 प्रतिशत तक होने का अनुमान है । यानी प्लास्टिक मनी का इस्तमाल करने वाले लोगों से इस साल करीब 26 हजार करोड़ रूपए की वसूली होगी । इससे सरकार और बैकों को अतिरिक्त कमाई भी होगी । 31 मार्च से कार्ड का इस्तेमाल और मंहगा हो सकता है । डेबिट कार्ड से 1 हजार रूपए तक की खरीदारी पर 0.25 प्रतिशत , 1001 - 2000 रूपए के लिए 0.5 प्रतिशत और 2,000 रू0 से ज्यादा के लेनदेन पर 1 प्रतिशत एमडीआर वसूला जा रहा है । रिजर्व बैंक का यह आदेश 31 मार्च तक के लिए है । उसके बाद बैंक रेट बढ़ा सकते हैं । तब ट्रांजेक्शन और मंहगा होगा । सोचना यह है कि सरकार तथा बैंक कई माध्यमों से आम जनता से रकम हड्डपने में लगी है, और आम जनता सिर्फ लोगों से तो शिकायत करती है, लेकिन सरकार व बैंक के खिलाफ आवाज उठाने से डर रही है । इसी का नतीजा है कि बैंक और सरकार आम जनता का कई माघ्यमों से शोषण कर रहा है । खास तौर से मोदी सरकार और आरबीआई को इस तरफ ध्यान देना चाहिए कि देश की जनता नोटबंदी के दौरान कई तरह की दिक्कतों को सामना कर चुकी है अब उसे कई तरह के कैश ट्रांजेक्शन और नकली नोट के नाम पर ज्यादा परेशान न करे । अभी यह मुद्दा एक चिंगारी के रूप में सुलग रहा है, इसे धधकती आग में बदलने से पहले सरकार को पहल करनी चाहिए ।
संजय त्रिपाठी




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