कश्मीर बन गया है देश के लिए सिरदर्द ! By संजय त्रिपाठी Kashmir has become a headache for the country!




संजय त्रिपाठी  
अगर समय रहते केंद्र सरकार कश्मीर मुद्दे पर कोई सख्त निर्णय नहीं लेती है तो पूरे भारत में कश्मीर के तरह ही आवाज उठने लगेगें । एक समुदाय जो कुछ देशभक्ति या झिझक के कारण भारत के पक्ष में आवाज उठाते हैं, वे भी पाक के समर्थन में बेझिझक हो जायेंगे । 
कश्मीर की आवाम फिलहाल दोराहे पर खड़ी है । शनिवार और रविवार दोनों दिन कश्मीर में ऐसे हालात देखे गए जो देश के दिल को चीर देने जैसा दिखाई दिया । जब आप जिस देश में रहते हैं और उसी का विरोध प्रदर्शन करते हैं तब देश के आम आवाम पर क्या गुजरती है । ऐसी स्थिति में ही यह आवाज और भी बुलंद होता है कि ‘‘ गद्दारों भारत छोड़ो ’’ । यह जायज भी है । कश्मीर में शनिवार और रविवार की स्थिति ने इस नारे को और बल दिया है । 
शनिवार को कश्मीर में दो जनाजे उठे ।  इनमें एक जनाजा अनंतनाग जिला के अचाबल में हुए आतंकवादी हमले में जम्मू-कश्मीर पुलिस के शहीद हुए 6 जवानों में से एक फिरोज अहमद डार का था। एक जनाजा उठा लश्कर-ए-तैयबा के जुनैद मट्टू का जो कि कुलगाम में सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में मारा गया। दोनों के जनाजे में लोग शामिल हुए। फिरोज अहमद डार के जनाजे में तिरंगा दिखाई दिया तो आतंकवादी के जनाजे में पाक का झंडा। इस बीच फिरोज अहमद डार ने 2013 में फेसबुक में जो कुछ लिखा था, वायरल हो रहा था। शहीद डार ने लिखा था कि ”कौन जानता है कि कब्र में जाने के बाद पहली रात हमारे साथ क्या होगा, वहां आप अकेले होंगे, अंधेरा होगा और आप किसी से मदद नहीं मांग सकेंगे। आप पछताएंगे कि आपने अल्लाह के आदेश का पालन नहीं किया, आप अपने कर्मों के साथ वहां कब्र में होंगे अकेले।” डयूटी पर अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करने वाले फिरोज अहमद डार और अन्य 6 पुलिसकर्मियों को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा। इन जनाजों से जम्मू-कश्मीर के दो चेहरे दिखाई दिए, एक देश प्रेम का चेहरा और दूसरा देश विरोधी चेहरा।
बुरहान वानी, सबजार बट और जुनैद मट्टू भी कश्मिरियों के बेटे थे तो आतंकवादियों के हाथों शहीद होने वाले पुलिसकर्मी भी कश्मिरियों के बेटे थे । आतंकवादियों ने जिस तरह से पुलिसकर्मियों की हत्या कर उनके शवों के साथ बर्बरता की है क्या उससे कश्मीर शर्मसार नहीं हुआ है । देखा जाए तो कश्मीर में पिछले वर्ष जुलाई माह में बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने के बाद कश्मीर की हालात दिन - पर - दिन बिगड़ते गए । बाद में उसका उत्तराधिकारी सबजार बट बना गया था जिसे 27 मई को पुलवामा के ़त्राल में साईमोह गांव में एक मुठभेड़ के दौरान मार गिराया गया । अब जुनैद मट्टू को मार गिराया गया है । ऐसे में कश्मीर में शांति की कोई संभवनाएं नजर नहीं आ रही है । जब भी आतंकवादियों को मुठभेड़ या विरोध स्वरूप सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारा जाता है तब मानवाधिकार कार्यकर्ता और कुछ बुद्धिजीवी वर्ग आवाज उठाते हैं, लेकिन वही जब देश पर जान न्यौछावर करने वाले पुलिसकर्मी या सुरक्षा बलों के मौत पर मौन हो जाते हैं । आखिर इसका मतलब क्या है ? कश्मीर में पीडीपी - भाजपा की सरकार है । इसके बाद भी रोजाना यहा कि हालात खराब होती जा रही है , लेकिन सरकार प्रयास के बाद भी कुछ कर नहीं पा रही । ऐसे माहौल में सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन से ही कश्मीर को मुख्य धारा में लाया जा सकता है । 
सबसे चैकाने वाली बात यह है कि कल जब चैम्पियन ट्राफी में भारत की करारी हार और पाक की जीत हुई तब कश्मीर में दिवाली और ईद जैसा माहौल देखा गया । कल जो जीत का जश्न मनाया गया है वह भारत की संप्रभु सत्ता को चिढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं है क्योंकि कुछ दिन पहले ही चैंपियंस ट्राफी के लिए खेले जा रहे क्रिकेट मैचों में भारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत दर्ज हो जाने के बाद इसी घाटी में जश्न तो दूर कहीं एक दीया तक जलाने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी। यह सरासर भारत के लोगों के दिलों को दुखाने की गरज से ही कुछ पाक परस्त  और चुनीन्दा लोगों की शह पर किया गया कारनामा था मगर अफसोस तो तब होता है जब भारत के पैसों पर सारे एशो-आराम फरमाने वाले हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेता ट्वीट करके पाकिस्तानी खिलाडियों की हौसला अफजाई करते हैं और जश्न मनाने को सही ठहराते हैं। जब कश्मीर में ऐसे हालात दिन - पर दिन बढ़ रहे हैं, केंद्र सरकार निसहाय होकर तमाशा देख रही है । ऐसे में देश के अन्य हिस्सों में जब यही आग धधकेगी तब केंद्र सरकार क्या करेगी ? अभी भी समय है सांप को फन उठाने से पहले ही कुचलना होगा । आतंकवाद और मानवता दोनों को एक साथ लेकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता । कश्मीर में जो आग भडकी है उसकी जिम्मेदारी हमारी सरकार की कमजोरी ही रही है । मोदी सरकार ‘ सर्जिकल स्ट्राइक ’ के बाद जो वाहवही लूटी थी, वह घाटी में सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों की लाशों से दफनाने का प्रयास किया जा रहा है । चारों तरफ से अब एक ही मांग उठ रही है कि ‘‘ देश के गद्दारों ’’ को पाक या जह्नुम में ही भेज देना चाहिए । 
संजय त्रिपाठी  




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