| नरेंद्र कुमार शर्मा |
विनायक नर हरिभावे नाम का बालक कोंकण क्षेत्र के गागोड़ा नामक ग्राम मेें एक ब्राह्मण दम्पत्ति के होनहार सपूत थे जो आगे चलकर विन्या, विनोबा भावे तथा अन्त में सन्त विनोबा भावे के नाम से सुविख्यात हुए। ऐसे महापुरुष की कीर्ति किसी एक स्थान या एक सीमित कालखण्ड के लिए नहीं होती अपितु वह तो सदा प्रसारिता होती है। आचार्य विनोबा भावे एक ऐसे प्रकाश स्तम्भ है जो सदैव प्रकाशमान रहते हैं। कुछ विद्वानों ने तो आध्यात्मिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में इन्हें महात्मा गांधी का उत्तराधिकारी तक कहा है परंतु वास्तविकता में वे इससे भी कहीं आगे थे। महात्मा गांधी की तुलना में तो उनका स्वतंत्र मूल्यांकन हो पाना सर्वथा असहज था।
बनारस हिंदू विश्व विद्यालय में गांधी जी का भाषण सुनकर विनोबा जी बहुत प्रभावित हुए। इस विषय में गांधी जी को पत्र लिखा और उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की। गांधी जी उनसे प्रथम बार अहमदाबाद में मिले यहां से गांधी जी भी उनसे बहुत प्रभावित हुए। विनोबा जी ने गांधी जी के साथ देश के स्वाधीनता संग्राम में बहुत कार्य किया उनकी आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति और समाज से अलग नहीं थी इसी कारण वे आध्यात्मिक होते हुए भी राजनीति में भी पूर्ण सक्रिय थे।
विनोबा जी का धर्म दर्शन के विषय में समर्पण एवं स्वीकार भाव रहता था। उन्होंने समय-समय पर धर्मग्रन्थों की व्याख्या सरल भाषा में की। गीता प्रवचन एवं संत तुकाराम के अभंगों की व्याख्या भी बहुत सरल रूप में की है। इससे उनकी मौलिकता एवं सहजता का साक्षात दर्शन होता है। संत ज्ञानेश्वर एवं संत तुकाराम उनके आदर्श थे।
‘भूदान यज्ञ’ उनका एक ऐसा आंदोलन था कि इसके नाम से ही संत विनोबा भावे का नाम जाना जाने लगा। संत विनोबा की संवेदना से पूरी मानवता, करूणा से सराबोर थी। विनोबा जी का कुशल नेतृत्व, सबको साथ लेकर और स्वयं को सबका मानकर चलने से ऊंचाईयों को छू गया। वे सबके दु:ख-दर्द बांटकर बदले में अपना विश्वास प्रेम एवं स्नेह देकर संत कहलाए। उनके इर्द-गिर्द प्राय: विपन्न, आर्थिक रूप से कमजोर, साधन विहीन, अशिक्षित लोग थे जिन्हें वे कोई मजबूत आधार देना चाहते थे। ताकि वे लोग अपना जीवन यापन परिश्रम के बल पर स्वतंत्र रूप से कर सकें यही से उनके मन में भूदान की बात आ गई। वे चाहते थे कि जमींदारों से थोड़ी-थोड़ी भूमि दान में लेकर बेसहारा लोगों को दे दी जाये ताकि वे भी अपनी जीविका स्वतंत्र रूप से चला सके। परंतु भूमि के वितरण में या दान प्रक्रिया प्रक्रिया में सरकारी कानून का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वे चाहते थे कि भूदान स्वैच्छिक हो। गांधीवादी विचारों के चलते उन्होनें न्यास प्रक्रिया एवं सहकारिता जैसे प्रयोग किए। 1951 में भूदान यज्ञ के प्रारंभ में वे तेलंगाना क्षेत्र के लगभग 200 गांवों में घूमे और उनकी यह पदयात्रा सफल सिद्ध हुई। फलस्वरूप दान में उन्हें लगभग साठ हजार बीघा भूमि प्राप्त हुई। यह उपलब्धि उत्साहवर्धक थी। इसके साथ ही उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इसके बहुत अच्छे परिणाम आये। 1956 तक दान के रूप में लगभग 40 लाख एकड़ तक भूमि मिल चुकी थी।
वास्तव में संत विनोबा भावे ने सर्वोदय समाज की स्थापना की। यह एक ऐसा संघ था जिसके कार्यकर्ता रचनात्मक ढंग से अहिंसात्मक ढंग से देश में सामाजिक परिवर्तन ला रहे थे। भूदान यज्ञ उनकी (विनोबा जी) की जन चेतना, जन सौहार्द एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। उन्होंने लोगों से भूखण्ड दान करने की याचना की ताकि भूमि पाकर निराश्रित लोगों का जीवन भी सुधारा जा सके। विनोबा जी की जन नेतृत्व क्षमता अद्भुत थी इसीलिए वे चम्बल के दुर्दांत दस्युओं को मुख्य जीवनधारा में जोडऩे के लिए आत्म समर्पण के लिए तैयार करने में समर्थ हो सके। सामूहिक नेतृत्व के लिए ही उन्हें 1958 में प्रथम अंतर्राष्ट्रीय रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया।
विनोबा जी का धर्म दर्शन के विषय में समर्पण एवं स्वीकार भाव रहता था। उन्होंने समय-समय पर धर्मग्रन्थों की व्याख्या सरल भाषा में की। गीता प्रवचन एवं सन्त तुकाराम के अभंगों की व्याख्या भी बहुत सरल रूप में की है। इससे उनकी मौलिकता एवं सहजता का साक्षात दर्शन होता है। संत ज्ञानेश्वर एवं संत तुकाराम उनके आदर्श थे। वर्ष 1970 में वर्धा में पवनार आश्रम में स्थायी रूप से रहने लगे। यहीं रहकर गांधीवादी विचारों एवं अपने विचारों पर आधारित कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल को उन्होंने ‘अनुशासन पर्व’ कहा तो विवादों में घिर गये। लोग उनकी कर्मशीलता एवं आध्यात्मिकता पर भी संशय करने लगे। नवम्बर 1982 में काफी रूग्ण अवस्था में आकर आपने अन्न-जल त्याग दिया और स्वैच्छिक मृत्यु का वरण कर लिया। भारत सरकार ने उनके कार्य एवं व्यवहार का मूल्यांकन करने के बाद 1983 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया।
नरेंद्र कुमार शर्मा
राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक



0 comments:
Post a Comment