खुल्लम - खुला - पकौड़े पर मार By संजय त्रिपाठी hitting on pomber



बरसात के मौसम में ही पकौड़े की चर्चा होती थी। अब तो सर्दी में भी पकौड़े की बहार आ गई है जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। सोशल मीडिया पर आज कल खुब पकौड़ा की ट्रेन्डिंग और ट्रोलिंग की जा रही है। सबसे ज्यादा सर्दी के मौसम में युवाओं द्वारा पकौड़े पर चर्चा की जा रही है, वह भी सोशल मीडिया पर। बरसात में बड़े - बुढ़े पकौड़े पर ज्यादा जोर लगाते है। चाय के बाद अब देश में पकौड़ा चर्चा में है। 2014 में चाय चर्चा में था, जो आज तक अपना स्थान बनाये हुए है। अब तो देश में हर स्तर पर ‘ चाय पर चर्चा ’ आम बात हो गई है। कुछ दिनों से पकौड़ा भी अपना स्थान बना रहा हैं। जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पकौड़े बेचने को रोजगार से जोड़ दिया है, तब से पकौड़ा छाया हुआ है। युवाओं ने नरेन्द्र मोदी को इसके लिए सबसे ज्यादा धन्यवाद दिया है, क्योंकि भारत में युवाओं के लिए रोजगार का टोटा है, मोदी ने पकौड़े को रोजगार बता कर युवाओं को रोजगार के लिए सरकार के खिलाफ चिल्लाने के वजाय पकौड़े के तरफ अपना ध्यान लगाने का सुझाव दिया है। उधर यूपीए के पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम भीख मांगने को भी रोजगार ही बता रहे है, हालांकि वह मोदी के पकौड़ा बेचने के बयान पर तंज कसते हुए भीख मांगने को रोजगार के श्रेणी में रख रहें हैं। अब तो भारत में रोजगार की संकट खत्म होता नजर आ रहा है। अब युवाओं को रोजगार के लिए दर - दर भटकने के वजाय मोदी और चिदंबरम के बताये रास्ते पर कदम बढ़ा देना चाहिए। तुलसी दास जी ने भी कहा है - ‘‘ कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करई सो तस फल चाखा।’’ पकौड़े का भी भारत में अहम महत्व है। मुझे याद है अपने बचपन का वह दिन जब मैं पिता जी के जेब से पैसे चुरा कर ठाकुरगंज बाजार में जाकर लालमुनी का पकौड़ा खाता था। उस समय पकौड़ा 50 पैसे में 10 मिलते थे। उसके साथ हरी मिर्च भी लेता था। गांव के बड़े - बुढ़े मेरे पकौड़ा खाने के आदत को बहुत ही ताजूब से देखते थे, हालांकि खाते वे भी थे, लेकिन सबसे ज्यादा देखते मुझे थे। इसका मुख्य कारण वे एक बार में 50 पैसे या एक रूपए के पकौड़ा लेकर खा लेते थे। लेकिन मैं 50 - 50 पैसा का ही तीन - चार बार लेकर खाता था। कभी - कभी तो उधार ही खा लेता था और लालमुनी को बोल देता था कि तुम घर पर चीनी या तेल लेने आना तो पिता जी से ज्यादा ले लेना। बेचारा,  लालमुनी करता तो क्या करता? अंत में पिता जी से लेने के लिए तैयार हो ही जाता था। मेरे पिता जी गांव में सरकारी सस्ते गले की दुकान चलाते है।  पहली बार तो पिता जी ने उसे एक लीटर मिट्टी का तेल दे दिया, लेकिन  दूसरी बार तेल तो दे दिया, लेकिन उसी दिन शाम को खड़ाऊं से मेरी ऐसी खबर ली जो कई दिन तक टीस मारता रहा। मेरे पकौड़ा खाने की चर्चा गांव में भी खूब थी। अगर मैं जानता कि मोदी शासन में पकौड़ा भी रोजगार की श्रेणी में आ जायेगा तो मै शिक्षक, पत्रकार बनने के जगह गांव में पकौड़ा की सड़क के किनारे एक दुकान ही खोल लेता। न कोई टैक्स, न कोई झंझट न कोई हिसाब देना। मुझे तो ऐसा लगता है कि चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया, अगली बार पकौड़ा बेचने वाला राष्ट्रपति बनेगा। आपको यकिन हो या न हो देश के प्रसिद्ध पूंजीपति धीरूभाई अंबानी भी सप्ताह के अंत में गीरनार के पहाड़ियों पर शाम के समय पकौड़ा ही बेचा करते थे। इस रोजगार में भी प्रसिद्ध उधोगपति, विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व पाने की क्षमता है। युवाओं को इस तरफ कदम बढ़ाना चाहिए। हो सकता है कुछ दिनों बाद चाय के तरह यह भी वैश्विक पहचान बना ले। कुछ युवको का कहना है कि यह रोजगार भी अच्छा है। लेकिन जब सड़क के किनारे इस रोजगार के लिए झोपड़ी, खोखा डाल दिया जाता है और जैसे ही यह रोजगार जोर पकड़ेगा, योगी सरकार के मुलाजिम आकर झोपड़ी तोड़ देंगे, जैसे आज कल यूपी में हो रहा है। फिर भी देश के बेरोजगार युवाओं को इक्ट्ठा कर रहे है और पहले पकौड़ा की रोजगार शुरू कर सरकार से इसे सरकारी रोजगार बनाने की मांग करेंगे। इंकलाब जिन्दाबाद, पकौड़ा रोजगार को सरकारी मान्यता दो .............. ! 
संजय त्रिपाठी   



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