संपादकीय - न्यायालय की गरिमा पर विरोधी स्वर Editorial - Opposition voice over court's dignity




नुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरूद्ध भारत बंद का आयोजन प्रतिकात्मक रूप् से उचित तो माना जा सकता है, लेकिन इस दौरान जो हिंसा हुई इसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। आप अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है तो इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की जाय। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आज के समय में ऐसा कोई पार्टी, दल, संगठन या समुदाय कर भी नहीं रहा है। अब तो सब लोग सिर्फ सड़को पर उतर कर हो - हल्ला में ही ज्यादा यकिन कर रहे है। इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब कई संगठन या समुदाय कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़को पर उतरा है और आम जनता व देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। अभी कुछ ही हपते पहले सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पद्मावत की रिलीज के लिए आदेश दिया था, लेकिन इसे लेकर कुछ संगठनों का विरोध इतना उग्र हो गया कि कई राज्य सरकारों को उसके आगे झूकना पड़ा। इस तरह से हम देखे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होता। जरा सोचे इस बंद से किसे लाभ हुआ? इस तरह से कोई भी संगठन या समुदाय अपनी जायज व नजायज किसी तरह की मांग को लेकर सड़को पर उतर जायेंगे, तब वहां लोकतंत्र को कैसे बचाया जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण ही जनता को अपनी बात रखने का मौका मिलता है, जबकि तानाशाही व्यवस्था में ऐसा नहीं था। ऐसी स्थिति में हमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी समझने की कोशिश करनी होगी। दुनियाभर के नागरिक अधिकार संगठन हमेशा से यह कहते रहे हैं कि अगर किसी भी गैर - नृशंस अपराध में सिर्फ एफआईआर के आधार पर गिरफ्तारी का प्रवधान है, तो उसका दुरूप्योग होगा ही। ऐसा दहेज विरोधी कानून में भी देखने को मिला है। ऐसा दुरूपयोग एससी - एसटी ऐक्ट के कुछ मामलों में भी हुआ है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों की ताजा 2016 की रिपोर्ट के अनुसार गैर दलितों के 3.5 प्रतिशत केस झूठे, जबकि दलितों पर अत्याचार के 15 प्रतिशत के झूठे है। एससी-एसटी एक्ट के कुल मामले 40 हजार 8 सौ एक है और इनमें झूठे या गलत तथ्य वाले केसों की संख्या 6 हतार 2 सौ 16 है। इसी तरह आईपीसी के सामान्य केस के कुल मामले 29 लाख 75 हजार 7 सौ ग्यारह है, इनमें 10 लाख 5 हजार 5 सौ 46 मामले झूठे या गलत तथ्य वाले है। ऐसा माना जा रहा है कि इसी को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च के अपने फैसले में बदलाव किया है। आकड़े बता रहे हैं कि एक दशक पूर्व तो ये तकरीबन 21 फीसदी तक हुआ करते थे। 2006 में दलितो द्वारा इस कानून के तहत कुल 27 हजार 70 मामले दर्ज करवाए गए थे। इनमें से 5 हजार 664 मामले झूठ्र मिले थे। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट आखिर किस तरह का निर्णय ले यह तो बहस और जिरह की बात है, लेकिन केंद्र सरकार ने दंगो का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट में अपने फैसले पर रोक लगाने की मांग की, तब कोर्ट ने फिर कहा - हमें जेल में बंद निर्दोषों की चिंता है, इसलिए पुलिस की शक्तियों पर रोक लगाई है। अब प्रश्न उठता है कि इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ हमस ड़कों पर उतरते रहेंगे तो इसका अंत क्या होगा? 14 लोगों की मौत 100 से ज्यादा घायल और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान इसका कौन जिम्मेदार हैं । क्या इसकी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर डाली जाय? फिर जरा भविष्य के उस समय के विषय में सोचे जब सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अयोध्या विवाद पर क्या होगा, जब कोर्ट का फैसला हिन्दू या मुस्लिम किसी एक के पक्ष में होगा। क्या तब के केंद्र सरकार इसे संभाल पायेगी। यह भी याद रखने की जरूरत है कि शांतिपूर्ण आंदोलन कहीं ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि वे अपने संयम और अनुशासन से दूसरे तबकों की भी सहानुभूति या समर्थन हासिल कर पाते हैं। हाल में हुए किसानों के दो आंदोलन इसके प्रमाण हैं। एक हुआ राजस्थान के सीकर में, जिसमें किसानों के समर्थन में शहर के व्यापारी और दुकानदार, यहां तक कि डीजे वाले भी आ गए। और दूसरा आंदोलन हुआ महाराष्ट्र में। मुंबई के लोगों को आवाजाही में दिक्कत न हो, इसका खयाल कर महाराष्ट्र के किसानों ने मुंबई के आजाद मैदान पहुंचने तक कूच रात में किया। दोनों आंदोलनों का संदेश दूर तक गया। ऐसे में जहां यह जरूरी है कि दुरुपयोग की गुंजाइश को कम से कम किया जाए, वहीं यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को अपमान, भेदभाव, उत्पीड़न और अत्याचार से बचाने के लिए किए गए विशेष प्रावधान कायम भी रहें।



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