
अजय कुमार
उत्तर प्रदेश में सियासी भगदड़ मची हुई है। तमाम दलों के नेता सुरक्षित 'ठिकानों' की तलाश में सुबह−शाम अपनी निष्ठा और चोला बदल रहे हैं। बस एक ही चाहत है 2017 में वह या उनके परिवार अथवा चाहने वालों की विधानसभा में तादात ज्यादा से ज्यादा बढ़ जाये। एक दौर ऐसा भी था जब नेताओं की विचारधारा ही उनकी पूंजी हुआ करती थी लेकिन आज के समय में अधिकांश नेताओं ने अपनी विचारधारा 'खूंटी' पर टांग दी है। सत्ता का सुख पाने के लिये अब नेतागण राजनैतिक बयार का रूख भांप कर पाला बदलते हैं। पहले समय में सफेदपोश चुनावी बेला में पाला बदलते थे, लेकिन जब से तमाम दलों में चुनाव से काफी पहले (साल−डेढ़ साल पूर्व) प्रत्याशी घोषित करने का चलन बढ़ा है तब से नेताओं के पाला बदलने की 'गति' में भी परिर्वतन हो गया है।
जैसे ही टिकट के दावेदारों को पता चलता है कि आलाकमान उनकी अनदेखी कर
रहा है या टिकट नहीं दे रहा है तो ऐसे नेता झट से 'नई मंजिल' तलाश लेते
हैं। नेताओं के पाला बदल के खेल से जनता के बीच जो सियासी संदेश जाता है
उससे उन दलों को तो फायदा होता है जिसकी पार्टी में दूसरे दलों से नेता टूट
कर आ रहे होते हैं लेकिन खामियाजा उस दल को भुगतना पड़ता है जिसके नेता
साथ छोड़कर 'दुश्मन' के गले मिल जाते हैं। वहीं सियासी दल अपने हिसाब से
अपने फायदे के लिये पाला बदल के खेल का आकलन करते हैं। इसका असर भी चुनाव
पर पड़ता है। जो मतदाता हवा का रूख भांप कर वोटिंग करते हैं वह अक्सर इसमें
बह जाते हैं। यह वो मतदाता होते हैं जो अपना वोट खराब होता नहीं देखना
चाहते हैं। भले ही ऐसे मतदाताओं का प्रतिशत कम हो लेकिन जहां एक−एक वोट के
लिये मारामारी होती है, वहां अक्सर ऐसे वोटर निर्णायक साबित होते हैं।
इस हिसाब से कहा जाये तो प्रदेश में चुनावी बिसात पर भाजपा मजूबत नजर आ
रही है, वहीं कुछ माह पूर्व तक सत्ता की प्रबल दावेदार समझी जाने वाली
बसपा को बड़ा नुकसान होता दिख रहा है। किसी भी दल में पार्टी से बड़ा नेता
नहीं होता है लेकिन सच्चाई यह भी है कि कुछ नेताओं के इधर−उधर आने−जाने से
वोट बैंक की सियासत पर काफी प्रभाव पड़ता है। आज की तारीख में इस पीड़ा से
बसपा सबसे ज्यादा दो−चार हो रही है। कई बड़े नेताओं की बगावत से बसपा
सुप्रीमो मायावती का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला चरमरा गया है। पहले
स्वामी प्रसाद मौर्य, उसके बाद आरके चौधरी और अब ब्रजेश पाठक का भी मायावती
से मोह भंग हो गया। बसपा से नाता तोड़ने वाले ब्रजेश पाठक की पहचान बहुजन
समाज पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर होती थी। वहीं स्वामी
प्रसाद मौर्य ओबीसी थे तो आरके चौधरी दलित नेता थे। इन तीन नामों के अलावा
भी कई बड़े बसपा नेताओं ने इस बीच पार्टी छोड़ी थी। इनमें बाला प्रसाद
अवस्थी, अब्दुल मन्नान, जुगुल किशोर, रोमी साहनी सहित कई नाम शामिल हैं।
2007 में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो पार्टी की इसी सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय मिला था। दलित, मुसलमान और ओबीसी के साथ सवर्ण वोटरों को भी पार्टी के साथ जोड़ने में राष्ट्रीय महासचिव ब्रजेश पाठक को भी अहम माना जाता था। हालांकि, सतीश चंद्र मिश्र अब भी बीएसपी के साथ हैं लेकिन ब्रजेश के जाने को बड़ा झटका माना जा रहा है। दरअसल, आजकल मायावती के कई दांव उलटे पड़ते नजर आ रहे हैं। दलितों के अतिरिक्त मोह के चक्कर में सवर्ण नेताओं की पार्टी से बेरुखी बढ़ती जा रही है। भाजपा नेता दयाशंकर सिंह के परिवार की महिला सदस्यों पर अपमाजनक टिप्पणी से क्षत्रीय समाज मायावती से नाखुश हो गया है। इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो सवर्णों की बसपा से नाराजगी का कारण बन सकती हैं।
2007 में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो पार्टी की इसी सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय मिला था। दलित, मुसलमान और ओबीसी के साथ सवर्ण वोटरों को भी पार्टी के साथ जोड़ने में राष्ट्रीय महासचिव ब्रजेश पाठक को भी अहम माना जाता था। हालांकि, सतीश चंद्र मिश्र अब भी बीएसपी के साथ हैं लेकिन ब्रजेश के जाने को बड़ा झटका माना जा रहा है। दरअसल, आजकल मायावती के कई दांव उलटे पड़ते नजर आ रहे हैं। दलितों के अतिरिक्त मोह के चक्कर में सवर्ण नेताओं की पार्टी से बेरुखी बढ़ती जा रही है। भाजपा नेता दयाशंकर सिंह के परिवार की महिला सदस्यों पर अपमाजनक टिप्पणी से क्षत्रीय समाज मायावती से नाखुश हो गया है। इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो सवर्णों की बसपा से नाराजगी का कारण बन सकती हैं।
बात ब्रजेश पाठक के बसपा छोड़ने के कारणों की कि जाये तो पाठक
राज्यसभा जाने की उम्मीद लगाए थे। मगर उन्हें टिकट नहीं मिला, जिससे वह
नाराज चल रहे थे। ऐसे में उनके भाई राजेश पाठक और साले अरविंद त्रिपाठी
उर्फ गुडडू त्रिपाठी को हटाए जाने के बाद यह नाराजगी और बढ़ गई थी। आज की
तारीख में बसपा के अंदर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र
अकेले बड़े ब्राह्मण नेता हैं ऐसे में उनका कद और बढ़ सकता है। बसपा
सुप्रीमो के लिये परेशानी का कारण यह भी है कि अभी भी कई और बड़े नेताओं के
बगावत करने की खबरें आ रही हैं। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय और जयवीर
सिंह का नाम इस चर्चा में जोरों पर चल रहा है। ब्रजेश पाठक की बगावत की
चर्चा तो खासकर हो रही है। 21 अगस्त को आगरा में बसपा की जो रैली हुई थी
ब्रजेश उसके संयोजक थे। उनकी ओर से बाकायदा रैली के लिए निमंत्रण पत्र भी
भेजे गए थे, लेकिन दूसरे ही दिन 22 अगस्त को उन्होंने भाजपा का दामन थाम
लिया। भाजपा में शामिल होने के बाद जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका
कहना था कि वे जिस पार्टी में जब तक रहते हैं, तब तक वे तन मन धन से रहते
हैं। वैसे, ब्रजेश बसपा के सबसे बड़े ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्र के
खास माने जाते थे। बात भाजपा की कि जाये तो बसपा का ब्राह्मण चेहरा माने
जाने वाले ब्रजेश पाठक को साथ लाकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं।
चुनावी मौसम में नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला सपा−कांग्रेस में
भी दिखाई दे रहा है, लेकिन ऐसा नहीं जैसा बसपा में देखने को मिल रहा है।
कांग्रेस में तो पहले से ही चुनाव जीतने की हैसियत रखने वाले नेताओं का
टोटा है, इसलिये इस दल के नेताओं की अन्य दलों में कोई खास 'मांग' भी नहीं
है। बात समाजवादी पार्टी की कि जाये तो यहां पार्टी छोड़ने की हिम्मत रखने
वाले नेताओं की तुलना में उन नेताओं की संख्या काफी अधिक है जो पार्टी
छोड़ने की घुड़की से काम चला लेते हैं। सपा में तो पार्टी से अधिक परिवार
में कलह−कलेश दिखाई दे रहा है। यहां से अक्सर कलह और उसके बाद सुलह की
खबरें मीडिया को मिलती रहती हैं। सपा प्रमुख के भाई शिवपाल यादव की इस्तीफा
देने की धमकी के बाद ऐसी ही धमकी देने वाले नेताओं में ताजा नाम अमर सिंह
का जुड़ गया है जो पार्टी में अपनी अनदेखी से नाराज हैं। अमर सिंह की कुंठा
ठीक उसी समय सामने आई जिस वक्त सपा प्रमुख मुलायम सिंह अपने पूरे परिवार
के बीच सुलह कराने के लिये परिवार के सदस्यों के साथ बैठक कर उन्हें नसीहत
दे रहे थे कि अगर किसी के मन में मतभेद या मनभेद है भी तो उसे सार्वजनिक न
करें। कुछ दिनों पूर्व समाजवादी पार्टी में मतभेद की खबरें तब आई थीं जब
लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव ने मैनपुरी में इस्तीफा देने की घोषणा कर
दी थी।
लब्बोलुआब यह है कि विधानसभा चुनाव नजदीक आते देख न केवल नेताओं के
पाला बदलने की गति में तेजी आई है, बल्कि चुनावी बयार में और तरह के भी तीर
छोड़े जाने का सिलसिला जारी है। दलबदल के साथ दूसरे दल और उसके नेताओं का
दामन दागदार दिखाने के लिये आरोपों की बौछार तेज हो गई है। पुराने मामले जो
ठंडे बस्ते में पड़े हुए थे उस पर फिर से सियासी पॉलिश चढ़ाई जा रही है।
अखिलेश सरकार ने उन स्मारक घोटालों की फाइलें फिर से खोल दी हैं जिसकी
छींटे मायावती पर पड़ सकते हैं और जो 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की
हार का कारण बने थे। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरन समाजवादी
पार्टी ने लखनऊ और नोएडा में बने बसपा स्मारकों में व्यापक धांधली का आरोप
लगाया था। तब सपा के सत्ता में आने पर इन घोटाले की जांच और दोषियों को
सख्त सजा के वादे किये गए थे। मुलायम सिंह, शिवपाल यादव आदि पार्टी के सभी
बड़े नेताओं ने तमाम चुनावी सभाओं में स्मारक घोटाले के आरोपियों को सरकार
बनते ही जेल में डालने की घोषणाएं की थीं, जिस कारण यह एक बड़ा चुनावी
मुद्द बना था। सपा सरकार के चार वर्षों के ठंडे रूख के बाद ही अब भाजपा इसे
सपा−बसपा दोनों के खिलाफ हथियार बनाना चाहती है। इसलिए साढ़े चार साल बाद
यह घोटाला फिर खबरों में है। भाजपा अब तक कार्रवाई का हिसाब मांग रही है तो
राज्य सरकार ने भी जवाब देने की तैयारी कर ली है। यह मसला इसलिये और भी
उछला क्योंकि हाल ही में लखनऊ हाईकोर्ट ने भी अखिलेश सरकार से पूछा था कि
वह इस मामले में क्या कर रहे हैं। वहीं जनता की अदालत में जाने से पहले
समाजवादी पार्टी स्मारक घोटाले में कुछ ठोस करना चाहती है।
गौरतलब है कि स्मारक घोटाला लगभग 14 अरब रूपये का था और जनवरी 2014 को
बसपा नेताओं नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा सहित 19 अधिकारियों
के खिलाफ लखनऊ में एफआईआर दर्ज हुई थी। तत्कालीन लोकायुक्त ने तीन आईएएस
अफसरों सहित कुल 199 लोगों की घोटाले में पहचान की थी लेकिन ढाई साल बाद भी
कोई कार्रवाई नहीं हो सकी तो इसका कारण था बाबू सिंह कुशवाहा के सपा के
साथ प्रगाढ़ रिश्ते हो गये थे। इसी आधार पर भाजपा बसपा और सपा में मीठें
संबंधों की दुहाई देती रहती है।



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