योगेश्वर कृष्ण परजन्य ब्रह्मचारी थे। उनके जीवन में कितनी भी कठिनाईयां आयीं लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया। उनका पूरा जीवन सुगंधा की तरह था जिससे संसार के प्राणियों को सदां सुगंधि आती रही। उन्हें गोपाल भी कहा जाता है अर्थात गौ को पालने वाला , रक्षक। गौ कहते हैं इंद्रियों को, गौ नाम उस पशु का भी है जो दूध देती है, गौ नाम सूर्य की किरणों का है, गौ नाम चंद्रमा की कांति का है तथा गौ नाम पृथ्वी का भी है।
श्री कृष्ण की पत्नी का नाम रूक्मिणीं था। वे रोजाना प्राणायाम किया करते थे तथा सुवह शाम दोनों प्रहर यज्ञ करते थे। उनके एक पुत्र प्रधुम्न हुआ । पुत्र के जन्म के पश्चात महाराज कृष्ण ने पत्नी से कहा कि हे देवि मैं ब्रह्मचारी बनने जा रहा हूं और वे अपने जीवन का अनुसंधान करने चले गये। बारह बर्ष तक अनुसंधान करने के बाद वे लौटे। कहा यह जाता है कि जन्म जमांतर के इस येागी ने जो अनुसंधान किया वैसा द्वापर के बाद किसी ने नहीं किया। उनके एक- एक रोम से एैसी ज्योति उत्पन्न होती थी कि जैसे सूर्य की किरणें।
एक दिवस जव वे यज्ञ पर अध्ययन कर रहे थे तव रूक्मिणीं ने आ गई और उनसे पुछा कि हे भगवन आप क्या कर रहे हैं ? उन्होंने कहा कि हे देवि में यज्ञ पर विचार विनिमय कर रहा हूं। मैंने यज्ञ से जो सुगंधि की है उस सुगंधि में कितनी तरंगें हैं और कितनी गति है मैं उसका अध्ययन कर रहा हूं। तव रूक्मिणीं ने कहा कि भला ये भी कोई विचार है ? मैं यह जानना चांहती हूं कि मेरे हृदय में और विचार में कितनी तरंगें हेैं। कृष्ण ने कहा कि देवि तुम्हारे हृदय में कितनी तरंगें हेैं यह गणना की जा सकती है। लेकिन जव तक तुम्हारे अंदर अभिमान है तव तक यज्ञ स्वरूप को नहीं जान सकतीं। इसके बाद कहा जाता हे कि रूक्मिणीं यज्ञ करने लगीं तथा दोनो को अनुसंधान करते -करते रात बीत जाती थी और उनका अनुसंधान चलता रहता था।
एक बार रूकिमणी ने कहा कि स्वामि मैं ब्रह्मचर्य को जानना चाहती हूं। यह ब्रह्मचर्य क्या है? क्या हम भी ब्रह्मचारी बन सकते हैं? तव भगवान कृष्ण ने कहा कि हे देवि इस संसार में सभी ब्रह्मचारी बन सकते हैं। जो अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते वे ब्रह्चारी नहीं कहलाते।
सत्यपाल सिंह चैेहान।




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