नई दिल्ली, प्रसिद्ध साहित्यकार व भारतीय ज्ञापपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई का मानना है कि साहित्य से दुनिया को एक सूत्र में बांधा जा सकता है । सूर्य के प्रकाश के तरह ज्ञान का प्रकाश फैलाना साहित्य और साहित्य प्रेमियों के जीवन में एक तपस्या है । आज पूरे विश्व में लोगों में किताबों के प्रति ललक बढ़ा है , इससे यह स्पष्ट होता है कि इलेक्ट्रानिक युग के वावजुद साहित्य स्मृद्ध हो रहा है ।
विश्व पुस्तक मेला - 2016 के एक कार्यक्रम में उनसे हुई मुलाकात के दौरान उनसे हुई साक्षात्कार का मुख्य अंश -
सवाल - देश में हिन्दी साहित्य किस मुकाम पर है ?
जवाब - साहित्य अपने पूरे सवाब पर है , देख नहीं रहे कि विश्व पुस्तक मेला में आज कितनी भीड़ है, यह भीड़ लोगों का साहित्य के प्रति प्रेम के कारण ही है । भले ही इलेक्ट्रानिक मीडिया का युग आ गया है , लेकिन लोगों में अभी भी किताबों की रूचि बरकरार है । इसी का नतीजा है कि विश्व पुस्तक मेला पहले दो साल में लगा करता था , अब हर वर्ष लग रहा है । एक सप्ताह के मेले में दिन - प्रति - दिन लोगों की संख्या बढ़ रही है । इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि किताबों की ग्लैमर कभी कम नहीं होगी ।
सवाल - आज के साहित्य और पहले के साहित्य में क्या अंतर नजर आ रहा हैं ?
जवाब - आज का साहित्य तेज रफ्तार में भाग रहा है । नई - नई सोच उभर रही है , युवा लेखकों की संख्या दिन दूना रात चैगुना बढ़ रही है । यह साहित्य और आज के पीढ़ी के लिए सबसे रोचक पहलू है । हमारी पहली पुस्तक साहित्य से जुड़ने के करीब 20 - 22 वर्ष बाद प्रकाशित हुई थी , लेकिन आज युवा साहित्य से जुड़ने के साथ ही प्रकाशन से जुड़ जा रहे है , कुछ युवा लेखक बड़े स्तर पर ख्याति प्राप्त कर लिए है । यह लोगों में साहित्य के प्रति लगाव के कारण ही सम्भव है । पहले के किताबें लोगों को ज्ञान के साथ - साथ एक नया अयाम दिया करती थी, लेकिन आज की किताबें नये युग में नये कलेवर में आ रहे है ।इस तरह लोगों का लगाव किताबों के प्रति बढ़ा है इसे देखकर मैं खुद हैरान हूं । इसके लिए आज के साहित्यकार और प्रकाशक दोनों को धन्यवाद देना चाहिए ।
सवाल - आज के समय में साहित्यकारों के सामने सबसे बड़ी परेशानी क्या है ?
जवाब - साहित्य तो स्मृद्ध हो रहा है , लेकिन साहित्यकारों की स्थिति आज भी पहले के तरह ही है । आज भी साहित्यकारों को कई तरह की परेशानियों से जूझना पड़ रहा है । इस तरह कि रिवाज बन गई है कि साहित्यकारों को अपनी रायल्टी के लिए कई बार दर - दर भटकना पड़ता है । साहित्यकरों के साथ पारदर्शिता और ईमानदारी अपनाना पडे़गा तभी उनके साथ सही न्याय हो पायेगा।
सवाल - आप भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक है कुछ अपनी संस्था के विषय में बतायें ।
जवाब - ‘ भारतीय ज्ञानपीठ ’ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्रान्ति का प्र्याय है , जो हर वर्ष अपने पाठकों के लिए , प्रच्य इतिहास, जैन साहित्य , समकालीक साहित्य की विविधवर्णी किताबें प्रकाशित करता है , । इतना ही नहीं ‘ मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला ’ के अन्तर्गत संस्कृत, प्राकृत , पालि , अपभ्रंश तमिल, कन्न्ड़ , हिन्दी और अंग्रेजी में दर्शन , न्याय , नीतिशास्त्र , आचारशास्त्र , कर्मकांड, व्याकरण , ज्योतिष , काव्यशास्त्र आदि विषयें की किताबें पाठको तक कम कीमत में पहुचाता है । भारतीय ज्ञानपीठ हर वर्ष भारतीय भाषाओं के क्रमशः किसी एक - एक लेखक को ‘ ज्ञानपीठ पुरस्कार ’ तथा ‘ मूर्तिदेवी पुरस्कार ’ से सम्मानित करता है । अब तक 50 ज्ञानपीठ पुरस्कार ( 55 साहित्यकार ) और 27 मूर्तिदेवी पुरस्कार प्रदान किये जा चुके हैं । दस युवा लेखक ‘ नवलेखन पुरस्कार ’ से सम्मानित हुए हैं । उन्होंने बताया कि इस वर्ष का पुस्तक मेला वर्षा की भेंट चढ़ गई । हर वर्ष की भांति इस वर्ष पुस्तक प्रेमियों की संख्या कम रही , फिर भी मेला सफल रहा क्योंकि साहित्य लेखक और विचारकों की संख्या पहले से बढ़ी है । इस वर्ष ज्ञानपीठ प्रकाशन ने कई पुस्तक का प्रकाशान कर साहित्य प्रेमियों के बीच लाया है जिसकी अच्छी मांग रही । प्रियदर्शी ठाकुर ‘ ख्याल ’ की गजल संग्रह ‘ यादों की गलियारे में ’ , डा0 आभा नविन निरज की ‘ आरती पुर्नजागरण के प्रमुख विचारक ’ , मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित ‘ स्वामी विवेकानन्द की जीवनी ’ , ओम नागर की डायरी ‘ निब के तीरे से ’ , संतोष चैबे का संगीत पर आधारित उपन्यास ‘ जल तरंग ’ सहित कई पुस्तकों को बाजार में उतारा गया है ।
सवाल - क्या इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से साहित्य लेखन तथा प्रकाशनों पर कोई असर पड़ा है ?
जवाब - हां , इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है । साहित्यिक पाठकों को अब किताबें इंटरनेट से उपलब्ध हो जा रही है । वहीं आज के दौर में लोगों के पास समयाभाव के चलते लोग साहित्य के तरफसे विमुख तो हो रहे हैं , लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखाई दे रहा है । हालाकि युवा वर्गो में साहित्य के प्रति होड़ तो है , लेकिन आज की लाइफ व्यस्त होने के कारण लोगों का झुकाव कम हुआ है । आज - कल साहित्यिक किताबों के जगह लोगों का झुकाव सौदर्य , हेल्थ, फैंसन आदि के तरफ हुआ है । लेकिन इसे आज कल की फिल्मी गानों की संज्ञा ही दी जा सकती है , पुराने गाने आज भी चलते हुए लोगों को रास्ते पर खड़ा होकर सुनने के लिए मजबूर कर देते है । बहुत जल्द लोगों का झुकाव साहित्य के तरफ पहले जैसा ही होगा ।
संजय त्रिपाठी



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