संपादकीय
एक तरफ पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों से भारत को विचलित करने के प्रयास में लगा है तो दूसरी तरफ अरूणाचल प्रदेश को चीन भी विवादित नाम देने का प्रयास कर रहा है । इसके पीछे जिस तरह पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर को अपने हक के लिए विश्व के समक्ष विवादित भूमि दर्शाने में लगा हुआ है ठीक उसी तरह चीन भी अरूणाचल प्रदेश को अपना बताने के उदेश्य से एक विवादित क्षेत्र बताने में लगा है । जब भी भारत के तरफ से वहां राष्ट्रीय व विदेशी स्तर पर कोई गतिविधियां की जाती है चीन के पेट में दर्द होने लगता है । अभी 22 अक्टूबर को अरूणांचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू के निमंत्रण पर अमेरिका के राजदूत रीचर्ड वर्मा तवांग गए थे और वहां एक समारोह में हिस्सा भी लिया था । वर्मा ने अपने इस दौरे की तस्वीरे ट्वीटर पर साझा की थी । तस्वीर सार्वजनिक होते ही चीन विफर पड़ा । उसके पेट में दर्द होना शुरू हो गया । उसने अमेरिकी राजदूत के अरूणाचल जाने के मामले को भारत के साथ सीमा विवाद में अमेरिकी दखलअंदाजी करार देते हुए कहा कि इसके बूरे नतीजे हो सकते हैं, इससे मुश्किल से सीमा पर कायम हुई स्थिरता और शान्ति भंग हो सकती है । हालांकि चीन की इस प्रतिक्रिया पर विदेश मंत्रालय ने दो टूक जवाब दिया है । जवाब में मंत्रालय ने कहा है कि अरूणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहां दौरे के लिए अमेरिका के राजदूत को भारत सरकार ने अनुमति दी थी । गौर करे तो चीन को सिर्फ अमेरिका के राजदूत का ही नहीं, वह तो भारत के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और कोई भी विशिष्ट व्यक्ति के उस प्रदेश में दौरा से भी हलकान होने लगता है । उसने पिछले साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अरूणाचल प्रदेश के दौरे पर भी नाराजगी जताई थी । लेकिन चीन का इस बार की प्रतिक्रिया जिसमें उसने शांति भंग की धमकी दी है यह पहले से कही ज्यादा तीखी है । इसके पीछे सीमा विवाद के पृष्ठभूमि के अलावा पिछले दिनों दोनों देशों के बीच आई तलखी भी मुख्य वजह हो सकती है । पाकिस्तान का साथ देने तथा भारत को कई मामलों में विश्व स्तर पर सहयोग न करना भी चीन की एक अहम सोची - समझी रणनीति का हिस्सा है । उसने पाकिस्तान के संगठन जैश - ए - मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित करने की भारतीय कोशिशों में तकनीकि अडंगा लगाया । उरी घटना के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के बाद चीन का पाक को समर्थन देने के कारण ही भारतीय जनता चीन का आर्थिक विरोध करना शुरू किया है । चीन और भारत दोनों देशों के सीमा से सटे नब्बे हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके पर चीन अपना दावा जताता है, जिसका अधिकांश हिस्सा अरूणाचल प्रदेश का है । दूसरी ओर भारत का कहना है कि विवाद अड़तीस हजार वर्ग किलोमीटर के अक्साई चीन को लेकर है , जिस पर चीन ने 1962 में कब्जा कर लिया था । सीमा विवाद सुलझाने को लेकर दोनों देशों के बीच उन्नतीस दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात । सीमा विवाद संबंधी बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए एक सैद्धांतिक ढांचे पर सहमति बनी थी और कुछ मानक तय हुए थे। इसमें यह तय हुआ था कि सीमा पर शांति बनाए रखी जाएगी और गलतफहमी या किसी शिकायत की सूरत में दूसरे पक्ष से संपर्क स्थापित कर मामले को सुलटा लिया जाएगा। लेकिन चीनी सैनिकों का कई बार का अतिक्रमण बताता है कि चीन ने इस सैद्धांतिक सहमति को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया। चीन अरूणाचल प्रदेश में भारतीय गतिविधियों पर हमेशा प्रतिक्रिया जाहीर करता रहता है जिससे वह विवादित भूमि का ढांचा विश्व के सामने रख सके। चीन की शांति भंग जैसा चेतावनी एक उकसाने वाला कदम है और ऐसे प्रतिक्रिया से चीन को बाज आना चाहिए । अभी तो भारतवासी सिर्फ चीनी वस्तुओं को वहिष्कार ही किए है जब चीन का वहिष्कार करना शुरू कर देगे तो उसका परिणाम क्या होगा कुछ माह में ही चीन को पता चल जायेगा । चीन ऐसी भूल में न रहे क्योंकि अब भारत 1962 का भारत नहीं बल्कि 21 वीं सदी का भारत है ।
संजय त्रिपाठी




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