संपादकीय
रूसी कहावत - ‘ पुराना दोस्त दो नए दोस्तों से बेहतर ’ का कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात में उल्लेख कर यह जता दिया कि रूस और भारत साथ - साथ हैं । भारत और रूस के बीच हुए रक्षा और कारोबार संबंधी अहम समझौतों ने दोनों के रिश्तों में गर्माहट ला दी है । दोनों देशों ने मिलकर आतंकवाद से लड़ने का संकल्प दोहराया । भारत और रूस की दोस्ती जग जाहिर हैं जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में मिल का पत्थर सावित हुआ है । हालांकि हाल ही में ऐसा लगने लगा था कि भारत के खिलाफ चीन- रूस और पाकिस्तान की एक धुरी तैयार हो रही है । इसका मुख्य कारण था उरी में सेना के शिविर पर हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान की धरती पर पकिस्तान और रूस के पहले संयुक्त सैनिक अभ्यास की खबर । इस खबर के बाद भारत को चिंतित होना लाजमी था । ऐसे में भारत के सामने चिंता का मुख्य कारण यह था कि अगर रूस और पाकिस्तान की नजदीकी बढती है तो हमारी सुरक्षा को खतरा हो सकता है, क्योंकि हमारे अधिकतर सुरक्षा उपकरणों की तकनीक रूस की देन है । ऐसे समय में मोदी ने कुटनीतिक चाल से काम लेते हुए जहां रूस से बड़े समझौते किए हैं, वहीं उसके साथ फिर से विभिन्न स्तर पर सहयोग को बढावा दिया है । जरा अपनी आजादी के बाद से रूस के संबंध पर एक नजर मारते हैं तो यह देखने को मिलता है कि भारत का रूस से संबंध बेमिसाल रहा हैं । आजादी के बाद हमें औधोगिक विकास के तरफ अग्रसर करने में रूस का अहम योगदान रहा है । स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र में पहला स्टील का कारखाना लगाने के लिए अमेरिका के तत्कालिन राष्ट्रपति आइजनहावर को पत्र लिखकर उनसे भारत की मदद करने की गुहार लगाई । अमेरिका के राष्ट्रपति आइजनहावर ने पं0 नेहरू को जवाब दिया कि स्टील जैसा उत्पादन क्षेत्र अत्यंत पूंजी निवेश मूलक है । भारत जैसा गरीब देश इसमें सक्षम नहीं हो सकता, इसलिए उसे अमेरिका से तैयार स्टील का आयात कर अपनी जरूरत पूरी करनी चाहिए । इसके बाद पं0 नेहरू ने रूस से संपर्क साधा और रूस ने भिलाई से लेकर पं0 बंगाल के दुर्गापुर तक स्टील कारखाना लगाने के लिए तकनीकि तथा वित्तीय मदद तक दी । इसके बाद सामरिक क्षेत्र से लेकर परमाणु क्षेत्र तक दोनों में गहरा सहयोग शुरू हो गया । रूस ने भारत के प्रगति और विकास के क्षेत्र में हर तरह का सहयोग तो किया ही साथ ही मुसीबत के वक्त पर भी उसने दोस्ती निभाई है । पाकिस्तान के साथ जब - जब संघर्ष की नौबत आई है रूस हमारे साथ खड़ा रहा है । एक वाक्यां का उल्लेख कर रहे हैं इस पर जरा गौर करें - 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान की तब का भाग बंगाल में वहां कि जनता ने बंग्लादेश मुक्ति संधर्ष का आंदोलन छेड़ा उस समय मानवीय आधार पर भारत ने मदद करते हुए अपनी सेना ढाका में भेजा । उस समय पकिस्तान की मदद के लिए अमेरिका ने बंगाल की खाड़ी में अपना सातवा जंगी बेडा उतार कर परमाणु युद्ध का खतरा पेदा कर दिया । उस दौरान रूस ने भारत के पाले में उतर कर अमेरिका को चेतावनी दी थी कि आगर सातवें बेड़े से जरा सा धुंआ भी उठा तो रूस पूरे बेड़े को ही मिट्टी में मिला देगा, बाद में इसका परिणाम चाहे कुछ भी हो । अंत में रूस की धमकी के बाद अमेरिका को पीछे हटना पड़ा था, और बंग्लादेश का एक राष्ट्र के रूप में उदय हुआ था । आज अमेरिका भारत का सबसे बड़ा सहयोगी बना है, लेकिन इसके पीछे उसकी सबसे बड़ी सोची - समझाी चाल है क्योंकि वह भारत के मार्केट पर अपनी पकड़ बना कर रखना चाहता है । रूस से समझौता हमारी कुटनीति का एक प्रमुख आयाम है जो आज के दौर में उभ्रते भारत को विश्व में एक अलग ही पहचान देगा । भारत और रूस के बीच 16 समझौते हुए जिसमें 200 कामोव हेलीकाॅपटर और एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम एस 400 का समझौता बेहद अहम माना जाएगा । रूस हमारा पुराना दोस्त है और हमेशा ही बना रहेगा क्योंकि नए चावल के जगह पुराने चावल का ही पथ बनाया जाता है । आतंकवाद के क्षेत्र में रूस ने भारत के हां में हां मिलाकर पाकिस्तान को करारा चोट दिया है वहीं रूसी कंपनियों के संगठन ‘ रोस्टेक स्टेट काॅरपोरेशन ’ के सीईओ सर्गेई केमेजोव ने कहा है कि मास्को ने इस्लामाबाद के साथ इस तरह का कोई समझौता नहीं किया है, जिसके तहत पाकिस्तान को हथियार या मिलिट्री एयरक्राफ्ट दिया जाएगा । पीछे रूस और पाकिस्तान के साथ जो मेलजोल दिखाई दे रहा था वास्तविक में वह आतंक पर ही आकर सीमट जाता है । रूस कभी भी आतंक का समर्थन नहीं कर सकता क्योंकि भारत के तरह वह भी अतंक से गहरा चोट खाया है । हमारी दोस्ती पहले के तरह ही सलामत रहे, ताकि अगली पीढी भी इसे यादगार बना सके ।
संजय त्रिपाठी
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| Editorial, India and Russia Relations |



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