संपादकीय
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| संजय त्रिपाठी |
हम और हमारा देश 21 वीं सदी के तरफ अग्रसर हैं । टेक्निकल युग में हम जी रहे। छोटे से बड़े सबके हाथ में हाईफाई कैटेगरी के मोबाईल, टेबलेट, लैपटाॅप व अन्य ऐसी मशीनें हैं जो हर कार्य संभव बना रही हैं । आज के युग में मानव चन्द्रमा ओर मंगल की दूरी नापने में सफल हो गया, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी । हर असंभव अब संभव बनता जा रहा है । हर सुविधाओं के चकाचैंध दुनिया में हम लोग जी रहे है । लेकिन आज भी हम लोगों के दिमाग में अंधविश्वास, भूत - प्रेत, डायन - चुडैल तथा दैव प्रकोप अपना जगह बनाये हुए हैं । सिर्फ आम जन ही नहीं जो आम जन के सुरक्षा में तैनात हैं, वे भी कोई निर्णय पर नहीं पहुंच पाते जिसका नतिजा होता है लोगों में असुरक्षा का माहौल और अफवाहों का बाजार गर्म होना ।
आज कल देश के कई हिस्सों में औरतों की चोटी काटने का मामला सामने आ रहा है । सिर्फ यह एनसीआर में ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों से भी इसकी खबरें आ रही है । कुछ क्षेत्रों में चोटी काटने की घटना इस कदर लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी हो गया है, जिसके कारण छोटी - छोटी बच्चियां स्कूल या धर के बाहर जाने से घबडा रही हैं । औरतें भी सहमी हुई अपने कार्य को अंजाम दे रही है । चारो तरफ दहशत का माहौल व्याप्त होता जा रहा है । चार सूबों राजस्थान, यूपी, हरियाणा और दिल्ली के तेज - तर्रार पुलिस अफसर इसकी छानबीन करने तथा चोटी काटने वाले को पकड़ने के लिए काम कर रहे हैं । इस अफवाह के कारण आगरा में एक 65 वर्षीय महिला को चोटी काटने वाली चुडैल समझ कर लोगों ने पीट -पीट कर मार डाला । दिल्ली, हरियाणा में यह घटना सबसे ज्यादा घटित हो रही है । हरियाणा में भी एक औरत को लोगों द्वारा मारे जाने की घबर आ रही है । एक सप्ताह के अंदर अब तक सैकड़ों औरतों की चुटियां कटने का मामला प्रकाश में आ चुका है । जिस भी महिला की चोटी काटी जा रही है वह घटना के बाद बेहोश हो जाती या घबड़ा जाती । पहले भी इस तरह की घटनाएं सामने आइ हैं, लेकिन सरकार या प्रशासन द्वारा ठोस कारण न ढूढ पाने के कारण आज भी ऐसी घटनाओं से जूझना पड़ रहा है ।
हम लोग जब बच्चपन के दौर से गुजर रहे थे यानि 70 के दशक में जब गांवों में लकड़सुंघवां का हल्ला हुआ था । कई छोटे - छोटे बच्चे लकड़सुंघवा के शिकार हुए थे । लोग अपने - अपने बच्चों को बाहर नहीं निकलने देते कि लकड़सुंघवा आयेगा और लकड़ी सुंघा कर उसे बोरी में भर कर ले जायेगा । इसी तरह 2001 में गाजियाबाद और दिल्ली के कुछ हिस्सों में काला बंदर का आतंक कई महिनों तक छाया रहा । पुलिस बदहवास की स्थिति में थी । दर्जनों लोगों की मौत बंदर के दहशत या घटना के शिकार हाने से हो गई । लोगों का कहना था कि बंदर काला है ओर अपने हाथों में लोहे का पंजा पहनता है । उस समय भी लोग दहशत की छाया में जी रहे थे । रात को लोग पहरा देना शुरू कर दिए । कुछ दिनों बाद काला बंदर का आतंक धीरे - धीरे खत्म हो गया । इसी तरह एक और मामले का अफवाह भी फैला था, मुंहनोचवा का । खासतौर से इसकी घटना सबसे ज्यादा पूर्वी - उत्तर प्रदेश और बिहार में सुनने को मिला था । लेकिन पूर्व में घटित इन सभी घटनाओं के कारण और निवारण का ठोस उत्तर जनता को पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा नहीं मिला । यह पता नहीं चल पाया कि आखिर काला बंदर था कौन और कैसे कार्य कर रहा था ?
कंप्यूटर युग और नई टेक्नोलाॅजी युग में होने के बाद भी हम या हमारी सरकार, सुरक्षा के जिम्मेदार हमारी पुलिस प्रशासन सही व ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाती , जिसके कारण लोगों में अफवाह का बाजार गर्म होता है । साथ ही लोग अंधविश्वास, भूत - पे्रत, जादू - टोना में विश्वास करने पर मजबूर होते हैं । इस बार प्रशासन चोटी काटने वाला कौन है ? चोटी क्यों काट रहा ? ऐसे तमाम प्रश्नों को जनता के सामने स्पष्ट करें तभी आगे भी अफवाहों का बाजार खत्म हो पायेगा ।
संजय त्रिपाठी
संपादक
सर्वोदय शांतिदूत




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