शिक्षक दिवस पर विशेष: डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन Special on Teacher's Day: Dr. Sarvepalli Radhakrishnan




नरेंद्र कुमार शर्मा 
स्टालिन की गणना रूस ही नहीं बल्कि विश्व के क्रूर शासकों में की जाती है। डा. राधाकृष्णन जिन दिनों रूस में भारत के राजदूत थे उन दिनों स्टालिन युद्ध की आग से झुलस रहे थे। डा. राधाकृष्णन ठहरे घोर मानवतावादी और स्टालिन प्रबल युद्ध समर्थक। उसी कालखण्ड में डा. राधाकृष्णन ने उपनिषदों का अनुवाद एवं व्याख्या का कार्य पूरा किया था और वर्ष में प्राय: तीन बार आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में व्याख्यान देने भी जाते थे। उनका अधिकांश समय राजनयिक होते हुए भी मानवता की सेवा में निकल जाता था। औपचारिक भेंट के बाद वे स्टालिन से नहीं मिल पाए। यह स्टालिन को अच्छा नहीं लगा। डा. राधाकृष्णन ये जानकर रूसी पुरोधा स्टालिन से मिलने गए तो कुछ अस्वस्थ थे और अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे। डा. राधाकृष्णन का आकर्षक व्यक्तित्व और श्वेत परिधान देखकर वे चमत्कारिक ढंग से उठ बैठे। स्टालिन के चेहरे की क्रूरता गायब थी और सौम्यता झलक रही थी। वे हतप्रभ होकर बोले, ‘आप यहां मेरे पास ही बेठिए... मैं बहुत क्लान्त हूं...’ डा. राधाकृष्णन स्वाभाविक ढंग से मुस्कुराए और स्टालिन की समीप ही बैठ गए। स्टालिन ने पुन: अपनी वेदना प्रकट की और अनुरोध किया ‘मेरे मस्तिष्क पर आप अपना हाथ रख दीजिए मुझे परम शांति मिलेगी’ डा. राधाकृष्णन ने सहज भाव से उनके मस्तिष्क पर हाथ रखा तो उन्हें वास्तव में सुखद अनुभूति हुई और भविष्य के लिए मार्गदर्शन की इच्छा प्रकट की। डा. राधाकृष्णन ने केवल इतना ही कहा- ‘युद्ध की अभीप्सा त्याग दीजिए... और मानव मात्र की सेवा का व्रत ले लीजिए’ तभी स्टालिन ने कहा ‘आप पहले व्यक्ति है जिन्होंने मुझे क्रूर नहीं समझा और सहज रूप से बात की है आप केवल संकीर्ण देशभक्त ही नहीं है अपितु मानव सेवा के सच्चे प्रहरी है’। ऐसे महापुरुष के विषय में ये जानना भी आवश्यक है।
डा. राधाकृष्णन का जन्म चैन्नई से लगभग 80 किमी. दूर उत्तर पश्चिम में, तिरूतानी नामक कस्बे के एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। इनके माता-पिता साधारण एवं धर्मभीरू थे। बालक राधाकृष्णन की प्रारंभिक शिक्षा तिरूतानी तथा तिरूपति में हुई। दोनों ही स्थान तीर्थस्थल हैं। भीड़भाड़ से दूर रहने वाले राधाकृष्णन को अगम स्वभाव वाला मानने लगे थे। 1905 से 1909 तक आपने ईसाई मिशनरी द्वारा चलाए जा रहे वूरही कालेज तथा मद्रास क्रिश्चयन में शिक्षा प्राप्त की। यहां पर उनका जीवन उतार-चढ़ाव के बीच गुजरा। एक छात्रवृत्ति पाने के लिए ईसाई धर्मग्रन्थ न्यू टेस्टामेंट (बाइबिल) की परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ी। वहीं ईसाई मिशनरी द्वारा की जाने वाली हिंदू आस्था तथा व्यवहार की तीखी आलोचनाएं सहन करनी पड़ी। यद्यपि उस समय राधा कृष्णन इन आलोचनाओं का मुंहतोड़ जवाब देने की स्थिति में नहीं थे। तदापि उस असहजता ने हिंदुत्व के विशद अध्ययन के लिए उन्हें विवश कर दिया।
सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ने एक छोटे नगर के स्कूल से अपना शिक्षक जीवन आरंभ किया। अपने सतत् अध्ययन एवं अध्यापन को निरंतर रखते हुए जनपद, प्रदेश, राष्ट्र एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक एक सम्मानित शिक्षक के रूप में पहुंचे। ऐसा क्या था उनकी शिक्षण कला में कि भारतीय तथा विदेशी विश्वविद्यालयों में उनके व्याख्यान कराने की प्रतिस्पर्धा रहती थी? विश्व विद्यालय उनको आमंत्रित करने में ही गौरवानुभव करते थे। डा. राधाकृष्णन अंग्रेजी के प्रकाण्ड विद्वान, संस्कृत के सुविज्ञ ज्ञाता तो दर्शनशास्त्र के उद्भट व्याख्याता थे। जब वे अपनी कक्षाओं में पढ़ाने जाते तो नियमित छात्रों के अतिरिक्त अन्य कालेजों के ज्ञान पिपासु छात्रों को भी पाते थे। विचलित हुए बिना अपने सौम्य व्यवहार एवं विद्वत शैली से उनकी ज्ञान पिपासा को तृप्त करते। मैसूर हो या कलकत्ता, आंध्र हो या चैन्नई, बनारस हो या दिल्ली विश्वविद्यालय.... डा. राधाकृष्णन जहां भी रहे वहीं के छात्रों ने आपके सम्मान में सदैव ‘पलक पांवड़े’ बिछाए। लगभग चालीस वर्षों के अध्यापन से ‘शिक्षक’ उनके तन-मन में रम गया था। तभी उन्होंने अपना जन्मदिन शिक्षकों को समर्पित कर दिया और उसे शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। यह शिक्षक समाज के लिए गौरव की बात है और शिक्षक समाज का यह दायित्व बनता है उन महापुरूष के प्रति कृतज्ञ रहें और पूरी निष्ठा के साथ अपने कार्य का निर्वहन करें। शिक्षक दिवस पर इन महान चिंतक, लेखक, व्याख्याता, पूर्ण मानवतावादी, युग पुरूष एंव समर्पित शिक्षक के जीवन को निकट से देखकर स्वयं को कृतार्थ करें।
तत्कालीन भारत के शिक्षाविदों, दार्शनिकों तथा विचारकों ने भारतीय संस्कृति शैक्षिक पद्धतियों तथा मूल्यों के उन्नयन के लिए प्रयास किए थे वे भारतीय पुरातन संस्कृति के क्षरण के प्रति जागरूक थे। उस समय के चिंतक स्वामी विवेकानन्द, रविन्द्रनाथ टैगोर, मदनमोहन मालवीय, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी एवं श्रीमती एनी बेसेन्ट आदि प्रमुख थे। इसी समय डा. राधाकृष्णन का प्रादुर्भाव भी हुआ, जिन्होंने अपने अथक प्रयासों से नवोदित भारत की शिक्षा एवं दर्शन को एक नयी सुगंध प्रदान की। इनके प्रयासों से भारत तथा पाश्चात्य देशों के बीच तुलनात्मक अध्ययन हो सका एक वैचारिक सेतु का निर्माण संभव हो सका जिसके फलस्वरूप धार्मिक तथा दार्शनिक विचारों का पारस्परिक अध्ययन संभव हो सका।
अप्रैल 1909 में डा. राधाकृष्णन मद्रास प्रेसीडेंसी कालेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक नियुक्त हो गए। तब ही से वे भारतीय दर्शन एवं आध्यत्म के गहन अध्ययन में लगा गए और समय पर विभिन्न सम्मानित पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित कराते रहे। इन लेखों के प्रकाशन का एकमात्र उद्देश्य हिन्दू धर्म (आध्यात्मिकता) के वैराग्य को दर्शाना था। 1918 में मैसूर विश्व विद्यालय में चार प्रोफेसर्स की नियुक्ति हुई उनमें एक डा. राधाकृष्णन भी थे। अपने पूर्व के अध्ययन के आधार पर इन्होंने धर्म की नैसर्गिकता को जान लिया था। आपका कहना था कि ‘‘दर्शनशास्त्र हमें अध्यात्मक के नैसर्गिक या नितान्तता के सिद्धांत की ओर ले जाता है।’’ अमेरिकन फिलॉसफीकल सोसायटी के प्रकाण्ड आशावादी बो सांक्वेट के साथ मिलकर आपने एक पुस्तक ‘‘द राइन ऑफ रिलीजन इन कॉन्टेम्पोरेरी फिलॉसफी’’ की रचना की जो भारत सहित अमेरिका तथा ब्रिटेन के विश्व विद्यालयों में भी पढ़ाई जाती है।
1921 में डा. राधाकृष्णन कलकत्ता विश्व विद्यालय में मानसिक एवं नैतिक विज्ञानवेत्ता के पद पर नियुक्त किए गए जो कि वहां के कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी का एक सपना था। प्रोफेसर जे.एस. म्योरहेड ने डा. राधाकृष्णन को भारतीय दर्शन को विधिवत एवं सुरुचि पूर्ण पठनीय ढंग से लिखने के निमंत्रण दिया। डा. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को पूरे मनोयाग से दो खण्डों में तैयार किया। 
1931 में आपको आंध्र विश्व विद्यालय का उपकुलपति नियुक्ति किया गया यहां उन्होंने विश्व विद्यालय के चहुंमुखी विकास के लिए अनेक योजना बनाई। अनेक नए संकाय स्थापित किए। पं. मदन मोहन मालवीय के अनुरोध पर 1939 में डा. राधाकृष्णन, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के उपकुलपति बने। यहां भी आपने विश्व विद्यालय की सम्पूर्ण प्रगति के लिए संकल्प लिया और उसे पूरा भी किया। वहां आप भगवद्गीता पर नियमित व्याख्यान करते तथा विकास कार्यों की सतत समीक्षा भी करते। महाराजा बड़ौदा के सहयोग से यहां आपने एक पीठ की स्थापना भी की तथा महाराजा बड़ौदा एवं अन्य राजा महाराजाओं के सहयोग से विश्व विद्यालय को एक सुदृढ़ आर्थिक आधार प्रदान किया। स्वतंत्र भारत में 1949 में पं. नेहरू के आग्रह पर आपने रूस में भारतीय राजदूत का पद स्वीकार कर लिया। 1952 में ही आपको स्वतंत्र भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति नियुक्त किया गया। राज्यसभा की कार्यवाही का कुशल संचालन करते हुए अपने सहयोगियों (सदस्य राज्यसभा) से कहा करते थे ‘‘मनुष्य को कठिनाईयों में भी मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए।’’
और फिर 12 मई 1962 को जीवन के एक और उच्च शिखर, भारत के राष्ट्रपति पद पर विराजमान हुए। विश्वभर से शुभकामनाओं का तांता लग गया। विश्व विख्यात दार्शनिक बर्टेंड रसेल ने अपनी शुभकामनाओं में कहा- ‘‘डा. राधाकृष्णन का भारत का राष्ट्रपति होना-दर्शनशास्त्र का सम्मान है, शिक्षक का सम्मान है और मैं एक दार्शनिक होने के नाते बेहद प्रसन्न हूँ।’’ प्लेटो ने पूर्व में ही कहा - राजा को दार्शनिक होना चाहिए। डा. राधाकृष्णन ने अपने कुछ विचार मानवता के लिए, विद्यालयों के लिए, शिक्षकों के लिए, राष्ट्र के लिए प्रस्तुत किए। जिनके अनुसार ‘‘मानव को एक होना चाहिए। सभी राष्ट्रों को विश्व शांति की स्थापना के प्रयास ईमानदारी से करने चाहिए। सभी छात्रों का एक वैश्विक पाठ्यक्रम होना चाहिए। जिसमें विश्व शांति तथा विश्व एकता की शिक्षा दी जाए। मानव मात्र को एक ईश्वर परम पिता की संतान मानना चाहिए। 
इससे संबंधित एक प्रसंग अवश्य सुनाया करते- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हिटलर के यातना शिविर से जान बचाकर आये एक अमेरिकन स्कूल के प्रिंसीपल ने अपने शिक्षकों को पत्र लिखकर बताया कि ‘‘यातना शिविर में मनुष्यों को बालकों को वृद्धों को अमानवीय यातनाएं देकर मारने वाले सभी शिक्षित थे सभी विशेषज्ञ (डाक्टर, इंजीनियर, तकनीशियन) थे। उनके कृत्यों को देखकर मुझे शिक्षा के प्रति संदेह होने लगा है। मेरी आपसे प्रार्थना है, कि आप अपने छात्रों को मानवता की, मनुष्यता की शिक्षा दें ताकि वे मानव को दैत्य न बनने दें।’’ उपरोक्त प्रसंग को बताने में ही उनका हृदय द्रवित हो जाता था।
विद्यालय, पवित्र नदियों के संगम की भांति, शिक्षकों और छात्रों के पवित्र संगम होने चाहिए। इनमें किसी भी प्रकार की अशुचिता, कल्मषता, कलुषता नहीं होनी चाहिए। शिक्षक सुयोग्य होने चाहिए और वे अपना सर्वश्रेष्ठ ज्ञान पिपासु छात्रों को दें। ऐसे छात्रों का निर्माण करें जो राष्ट्र का हित, समाज का हित प्रथम उद्देश्य के रूप में करें। यह तभी संभव होगा जब शिक्षक निस्पृह एवं सुयोग्य होगा। क्योंकि शिक्षकों के श्रेष्ठ मार्गदर्शन द्वारा ही पृथ्वी पर दैवी सभ्यता, विश्व ज्ञान आलोक की स्थापना संभव है।’’
अत: आज शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) के अवसर पर हम सभी डा. राधाकृष्णन जी को कोटिश: नमन् करते हुए उनकी शिक्षाओं, उनके आदर्शों, उनके जीवन मूल्यों को अपने जीवन में आत्मतसात करते हुए एक सुंदर, सभ्य, सुस्ंकारित एवं शांतिपरक समाज के निर्माण के हेतु प्रत्येक छात्र को ‘सर्वगुण सम्पन्न’ के रूप में ढालने का संकल्प लें।

 नरेंद्र कुमार शर्मा 
( राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक )



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