![]() |
| संजय त्रिपाठी |
गुजरात चुनाव में जिस तरह अंतिम चरण के मतदान के लिए बीजेपी के तरफ से अपनी किला को बचाने के लिए सांप्रदायिक कार्ड का इस्तेमाल किया जा रहा है, यह एक स्वच्छ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। लोकतंत्र में चुनाव के माध्यम से जनता शासक बनती है। चुनाव को जातिगत व धर्म विशेष का रंग देकर अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करना लोकतंत्र के लिए खतरा माना गया है। लेकिन पिछले दो दशक से इस तरह के हथियार चुनाव में सभी पार्टियों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है। गुजरात से ही लालकृष्ण अणवाड़ी की रथ यात्रा ने पहली बार बीजेपी के लिए सत्ता का द्वार खोला। इसी रास्ते का प्रयोग करते हुए 2014 में भी बीजेपी सत्ता के शिखर पर पहुंची। गुजरात में हिन्दुवादी लहर पर सवार होकर ही बीजेपी सत्ता में आई थी। मोदी को उसी समय हिन्दू हृदय सम्राट की संज्ञा दी गई थी। गुजरात में 2002, 2007 और 2012 का चुनाव मोदी के मुख्यमंत्री रहते लड़े गए । गुजरात के 2012 की चुनाव में बीजेपी के जीत के साथ ही 2014 के लोकसभा चुनाव की रणनीति बननी शुरू हो गई थी। एक तरफ यूपीए के दो शासनों की नकामी तथा बड़े पैमाने पर भ्रष्ट्राचार की कलई खुलना बीजेपी के लिए जमीन तैयार की, वहीं पाकिस्तान के तरफ से बढ़ती आतंकी कार्रवाई तथा सांप्रदायिक माहौल मोदी के 56 इंच की सीना तथा हिन्दुओं का सबसे बड़ा पैरवी कार बनाकर लोकसभा में भारी बहुमत दिलाया । बीजेपी गुजरात चुनाव में भी सांप्रदायिक कार्ड खेलने में लगी है। यह निर्णय तो 18 दिसम्बर को ही हो पायेगा कि इस बार वोटर सांप्रदायिक कार्ड को स्वीकार करता है या नहीं । चुनावी प्रचार के अंतिम दौर में जिस तरह मोदी ने पाकिस्तान को चुनावी मुद्दा बनाया है यह सांप्रदायिक ट्रंप कार्ड का ही एक प्रयोग है। प्रधानमंत्री मोदी ने पालनपुर की एक चुनावी रैली में कहा था कि पाकिस्तानी सेना के पूर्व डीजी सरदार अरशद रफीक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते है। इसके बाद से भाजपा और कांग्रेस में बहस चल पड़ी है। मोदी ने पाकिस्तान के माध्यम से अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाये जाने की बात हिन्दू वोटरों को चेतावनी के तौर पर कही है। इसके पीछे गुजरात के वोटरों को बताया गया है कि तुम्हारी गलती से मुस्लिम मुख्यमंत्री बन सकता है। यह क्या है? क्या यह एक सांप्रदायिक कार्ड नहीं है? भारतीय लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता की बात की गई है। अगर देश हिन्दू और मुस्लिम के नाम पर बंट कर वोट करने लगे तो देश और देश का विकास गौढ़ हो जायेगा । बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमीत शाह ने गांधीनगर में सवाल किया कि पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मणिशंकर अय्यर के साथ मीटिंग की। मोदी ने भी यह मुद्दा उठाया था । आखिर कोई मीटिंग चुनाव को लेकर ही की गई है यह कैसे सावित होगा? मोदी द्वारा सानंद की रैली में जिस तरह के बयान दिए गए उससे सांप्रदायिक निहितार्थ ही निकाला जा सकता है। हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता डाॅ0 मोहम्द फैजल ने कहा कि भारत अपनी चुनावी बहस में पाक को न घसीटे और अपने दम पर चुनाव जीते । जिस तरह 56 इंच के सीना और पाकिस्तान पर बड़ी कार्रवाई करने वाले ‘दबंग’ की इमेज में मोदी को लोकसभा चुनाव में पेश किया गया और पूरा चुनाव ही हिन्दुमय बना दिया गया, ठीक उसी तरह गुजरात चुनाव में भी सांप्रदायिक कार्ड के माध्यम से हिन्दुवादी लहर लाने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी स्थिति देश के एक प्रधान पद पर बैठा व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है, यही सबसे बड़ा लोकतंत्र के लिए घातक कदम है। ऐसे कदम पर विश्लेषकों का मानना है कि भागवा पार्टी को महसूस हो रहा है कि पाटींदार और ओबीसी आंदोलन के कारण पहले चरण के चुनाव में ज्यादा कुछ हाथ लगने वाला नहीं है और दूसरे चरण को अपने पक्ष में मोड़ना है तो सांप्रदायिक भावनाओं के जरिये ही इसकी भारपाई की जा सकती है। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद 18 राज्यों में हुए चुनाव में से 13 राज्यों में पाकिस्तान का जिक्र कर इसे बीजेपी के द्वारा चुनावी मुद्दा बनाया गया है। इन 13 में से 7 राज्यों में भाजपा को इसका फायदा हुआ है तथा 4 में इसके नुकसान भी हुए है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में अभी नतीजे बाकी है। आखिर ऐसा क्यो हो रहा है? इसके पीछे मुख्य कारण है कि गुजरात में करीब 90 प्रतिशत हिन्दू वोटर है, जो हर चुनाव में अहम होते है। गुजरात को बीजेपी की हिन्दुत्व राजनीति का प्रयोगशाल माना जाता है। मोदी की हिन्दुत्ववादी छवि ने भाजपा की पूरे देश में घाक जमा दी है। राम मंदिर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता लालकृष्ण अड़वाणी गुजरात के ही है। कांग्रेस इस बार यहां जातीय राजनीति का कार्ड खेल रही है। ऐसी स्थिति में भाजपा ने हिन्दुत्व का कार्ड खेला है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे कार्डो से लोकतंत्र को भारी खतरा है साथ हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए कांटों का रास्ता दे रहे है। ऐसे समय में चुनाव आयेग को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए ।
संजय त्रिपाठी




0 comments:
Post a Comment