युवाओं के रोज़गार की सरकार को फ़िक्र नहीं, शिक्षा के बजट में नाम-मात्र की बढ़ोत्तरी
2018 का बजट
नई दिल्ली, ( विशेष संवाददाता ) केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया 2018 का बजट पूर्णतः कॉर्पोरेट के पक्ष में है और युवा, मजदूर और किसान विरोधी है| ज्ञात हो कि सरकार श्रम बाज़ार की मांगों के अनुसार नौकरियों कि संख्या को नहीं बढ़ा रही है, जबकि कॉर्पोरेटो को पऔर भी ज्यादा तोहफे दिए गये हैं| इस कारण नौकरियों के ठेकाकरण में और भी बढ़ोत्तरी होगी| बजट ने बच्चों और युवाओं की आशाओं कि अवहेलना की है| ज्ञात हो कि शिक्षा में सुधार करने के बड़े-बड़े दावों के बावजूद सरकार ने स्कूली शिक्षा के लिए ढांचागत सुधार करने और स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाये गये हैं|
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 8% स्कूल ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों पर खड़े उतरते हैं| हाल ही में एन.सी.ई.आर.टी द्वारा जारी रिपोर्ट में यह साफ़ प्रदर्शित हुआ है कि प्राथमिक शिक्षा की हालत कितनी उदासीन है| 92% स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएं, साफ़ पानी कि व्यवस्था, शौचालय, बिजली इत्यादि कि कमी है| इनमे अधिकांश स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक भी नहीं है (करीब 9.4 लाख शिक्षकों कि कमी है)| शिक्षकों की ट्रेनिंग पर भी कोई विचार नहीं किया गया है, जिसको आपराधिक उपेक्षा ही कहा जायेगा| इसके अतिरिक्त, सरकारी उच्च शिक्षा का निजीकरण करने के लिए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) में सुधार करने की बात की गयी है| कालेजों को भी कम फण्ड देने के लिए उनको सरकार द्वारा दी गयी मान्यता के आधार पर ही मान्य माना जायेगा| ज्ञात हो कि भारत का अधिकांश युवा उच्च शिक्षा से बाहर है (जो बारहवीं पास का 82% है)| सरकार ने उनकी खस्ताहाल स्थिति को सुधारने के बजाये और बदतर बनाएगी|
ज्ञात हो कि इस बजट में सरकार ने मुक्त-शिक्षा विद्यार्थियों के लाखों छात्रों के लिए कुछ नहीं कहा गया है| इन छात्रों की संख्या उच्च शिक्षा में पढ़ रहे छात्रों में सबसे ज्यादा है| साथ ही, केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों और क्षेत्रीय संस्थानों में भी गैर-बराबरी बढ़ाने का रास्ता खोला गया है| हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी (हेफा) स्थापित कर सिर्फ उन्ही संस्थानों को वित्त-पोषित किया जाएगा जो पहले से ही बेहतर हैं, जिस कारण शिक्षा में असमानता और भी बढ़ेगी| यह बजट पूर्णतः युवाओं की उम्मीदों के विपरीत है और साबित करता है कि सरकार सिर्फ बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर आम-जनता को बेवकूफ बनाना चाहती है| लुभावने वादों और जुमलों के बावजूद, बजट सिर्फ खोदा पहाड़ निकली चुहिया|



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