मूर्ती तोड़कर भगत सिंह और भारत के साम्राज्यवाद-विरोधी नेताओं की विरासत को खत्म करने की कोशिश
नई दिल्ली, ( विशेष संवाददाता ) क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) त्रिपुरा में भगत सिंह के प्रेरणास्रोत, लेनिन की मूर्ती भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़े जाने की कड़ी भर्त्सना करता है| ज्ञात हो कि रूसी क्रांति के नायक लेनिन, भगत सिंह के प्रेरणास्रोत थे और भगत सिंह अपनी शहादत के कुछ लम्हों पहले तक उनकी जीवनी पढ़ रहे थे| लेनिन की मूर्ती का तोड़ा जाना भगत सिंह की इस विरासत को झुठलाने की एक कोशिश है|
ज्ञात हो कि भारत के आज़ादी के आन्दोलन के नायक 1917 की रूसी क्रांति खासकर लेनिन से काफी प्रभावित थे| लेनिन ‘साम्राज्यवाद-विरोधी लीग’ बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण थे, जिसका हिस्सा भारत के स्वतंत्रता सेनानी भीकाजी कामा और नेहरु भी थे| भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष में सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत सोवियत संघ द्वारा जारशाही रूस के सभी उपनिवेशी राज्यों को आज़ाद करने और उनको आत्म-निर्धारण का अधिकार देने का कदम था| इसके अतिरिक्त, भूतपूर्व सोवियत संघ भारत को आज़ादी के बाद वित्तीय मदद और समर्थन देने वाले कुछ देशों में था| भारत द्वारा उद्योग, साइंस, तकनीक और अन्तरिक्ष कार्यक्रम में तरक्की के पीछे एक बड़ा कारण सोवियत संघ द्वारा मिली मदद थी| साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय पटल में भी सोवियत संघ को भारत का सबसे बड़ा दोस्त माना जाता था|
आज लेनिन की मूर्ती को तोड़ने वाले लोगों के पास हमारा इतिहास झुठलाने का एजेंडा है क्योंकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका कोई भी योगदान नहीं था| लेनिन साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के बड़े नायकों में थे और दुनिया में समाजवाद के नारे को फैलाने के पीछे उनका बड़ा योगदान था| भारत में आज कॉर्पोरेट की खुली लूट के समर्थकों के लिए लेनिन की मूर्ती तोड़ना एक ज़रूरी कदम है, क्योंकि लेनिन इस तरह की लूट के खिलाफ विरोध का एक ज्वलंत चिन्ह हैं| ऐसी ताकतों के लिए महात्मा गाँधी का हत्यारा, नाथूराम गोडसे ही एक प्रेरणास्रोत है| इस तरह लेनिन की मूर्ती तोड़कर, यह ताकतें आज तालिबान की पंक्ति में आ गयी हैं, जिसने शांति के प्रतिक महात्मा बुद्ध की मूर्ती को अफ़ग़ानिस्तान की बामियान घाटी में तोड़ा था|
ज्ञात हो कि राजनीतिक बदलेबाज़ी विचारों की लड़ाई नहीं है| लेनिन की विरासत आधुनिक भारतीय राजनीति से परे नहीं थी और उसकी प्रगतिशील धारा को हमेशा प्रेरित करती रही है| तिलक, नेहरु, असफ अली से लेकर पेरियार, अम्बेडकर, टैगोर और प्रेमचंद जैसे भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों ने लेनिन की क्रांतिकारी और साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत को अपना माना है| इस तरह बदले की राजनीति का फैलना अभी हाल ही में पेरियार की मूर्ती तोड़ने के प्रयास से भी आँका जा सकता है, जब भाजपा के एक नेता की ऐसा करने की धमकी देने के बाद ऐसा हुआ| केवाईएस इसको भारतीय इतिहास को झुठलाने का एक प्रयास मानता है और आने वाले दिनों में इस तरह की सभी कोशिशों के खिलाफ अपना आन्दोलन तेज़ करेगा|



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