माता Mother By सत्यपाल सिंह चैहान



माता का समाज में सबसे बड़ा स्थान माना गया है। उसके कई कारण हैं। तीन मातायें होती हैं. एक जननी माता जो भौतिक माता होती है,दूसरी पृथ्वी माता जो यहां उत्पन्न हो जाने पर पालन पोषण करती है तीसरी प्रभु माता जो हमंे मोक्ष प्रदान करती है। वेद का ऋषि कहता है कि जिस गृह में माता का अपमान हाकता है,पुत्र माता का निरादर करता है,वह गृह-गृह न रह कर श्मशान भूमि बन जाता है।
      माता के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है और आज हम भी यही प्रयास कर रहे हैं कि माता के महत्व पर प्रकाश डाला जाय। पिछले अंकों में माता सीता, माता कौशल्या , माता शबरी,माता कुंती, माता गार्गी तथा माता अहिल्या के जीवन के विषय के कुछ अंश पाठकों के बीच लाने का प्रयास किया गया था। हमारे देश की एक नहीं अनेक ऐसी मातायें हुई हैं जिनका जीवन तपस्या और वलिदान से भरा पड़ा है। माता मंदालसा हों या यशोदा,या गौ माता या धरती माता आदि सभी का जीवन समर्पण और बलिदान मानवता के लिये यादगार रहा है।
       लेकिन यह भी सत्य है कि जो माता अपने पुत्र या पुत्री का नेतृत्व नहीं कर सकती तो वह माता कहलाने की अधिकारी नहीं है। वैदिक संस्कृति कहती है  कि जव माता के गर्भ में बालक का जन्म होता है तो वह राष्ट्र की महान सम्पत्ति बन जाता है। उस पर अकेले उस माता का अधिकार नहीं होता। नाम - करण संस्कार से उसे उस माता का बालक कहा जाता है। कर्तव्य की वेदी पर वह बालक उस माता का बालक नहीं होता बल्कि वह राष्ट्र का पुत्र होता है। एैसे विचार वाली माताओं के हृदय में शांति और कर्तव्यवाद के विशेष अंकुर हाते हैं तव उस माता के पुत्र ही देश और दुनियां में अपना ही नहीं अपनी जननी और राष्ट्र माता का नाम रोशन करते हैं।
     माता मंदालसा ने अपने पुत्रों को गर्भ में ही ब्रह्मवेत्ता बना दिया था। वे ही मातायें उच्च हैं जिन्होंने आत्रेय,मार्कंडेय, नचिकेता, उद्दालक,सोमपान, विश्वामित्र,अगस्त्य, विभांडक, वशिष्ठ,गरूण,राम,कृष्ण,दयानंद आदि महापुरूषों को जन्म दिया। कीड़ों की भांति बालक को जन्म देने वाली माताओं का गर्भस्थल भी कलंकति हो जाता है। इसलिये वेद कहता है कि हे माता तू उस पुत्र को जन्म न दे जिससे संसार में  कोई लाभ न हो , किसी कीड़े मकोड़े को जन्म न दे। हे माता तू ऋषि बालक को जन्म दे। तू एैसे बालक को जन्म दे जो तेरे गर्भाशय को ऊंचा बनाता चला जाये। हे माता तू श्रंृगार में परिणित तो हो लेकिन लिप्त न हो। 
          वैदिक संस्कृति कहती है कि जव कोई कन्या गृहस्थ की अधिकारी होने से पहले (शादी से पहले) गृहस्थ में प्रवेश कर जाती है तव वह मनोकामनाओं की चंचलता मंे रहती है । ऐसे में तब वह उंॅचे आदर्श वाले बालक को जन्म नहीं दे सकती। उससे पैदा हाने वाली संतान चंचल होती है और वह संतान युवा अवस्था में आकर  कन्याओं के ऊपर आक्रमण करती है। यदि हमारा समाज कन्याओं के ऊपर होने वाले आक्रमणों को लेकर गंभीर है तब उसे इस तथ्य को नजर अंदाज नहीं करना होगा। यहां यह बात गौर करने वाली है कि गृहस्थ संबंधी यह बात केवल माता तक सीमित नहीं है इसके लिये पुरूष पिता भी बराबर का हिस्सेदार है। लेकिन आज हमारा लेख केवल माता पर सीमित है।
शेष अगले अंक में।  

सत्यपाल सिंह चैहान                      




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