गठबंधन से कांग्रेस आलाकमान खुश, कार्यकर्ता निराश Combine the Congress high command happy, frustrated workers



समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को लेकर कयासों के बादल छंट चुके हैं। बस अब समय और स्थान का फैसला होना बाकी रह गया हैं, जहां सपा−कांग्रेस गठबंधन की घोषणा होगी। इस गठबंधन का राष्ट्रीय लोकदल सहित अन्य कुछ छोटे−छोटे दल भी हिस्सा हो सकते हैं। दोनों तरफ से कहा तो यह जा रहा है कि साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ यह गठबंधन है, लेकिन हकीकत यह है कि अखिलेश को सत्ता विरोधी और समाजवादी कुनबे के कारण होने वाले नुकसान का डर सता रहा था तो कांग्रेस को चिंता इस बात की थी कि अगर उत्तर प्रदेश की जनता ने एक बार फिर राहुल बाबा को नकार दिया तो उनके लिये 2019 में दिल्ली दूर हो जायेगी।

आश्चर्य होता है कि एक तरफ तो राहुल गांधी पूरे देश में पीएम मोदी के खिलाफ हुंकार भरते रहते हैं, उन्हें ताने और चुनौती देते हैं लेकिन जब जनता के बीच जाकर चुनावी मुकाबले की नौबत आती है तो राहुल कभी नीतीश−लालू की 'गोद' में बैठ जाते हैं तो कभी उन्हें अखिलेश और मायावती का साथ रास आने लगता है। 1996 में बसपा के साथ खड़ी कांग्रेस बीस वर्षों के बाद समाजवादी पार्टी के साथ गलबहियां कर रही है। 1996 में बसपा ने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कांग्रेस के लिये करीब सवा सौ सीटें छोड़ी थीं और इस बार सपा उसको और भी कम सीटें लड़ने के लिए दे सकती है। यानी करीब सौ सीटों पर ही कांग्रेस को संतोष करना पड़ सकता है। यह और बात है कि राहुल गांधी इसमें भी अपनी जीत देख रहे हैं। मायावती ने कांग्रेस के साथ अन्य तमाम वजहों के अलावा इसलिये भी गठबंधन नहीं किया कि उन्हें 1996 में इस बात का अहसास हो चुका था कि बसपा से गठबंधन का फायदा कांग्रेस को तो मिल गया लेकिन बसपा को नहीं मिल पाया। बसपा के वोटरों ने तो मायावती के कहने पर कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया था लेकिन जहां बसपा के प्रत्याशी थे वहां कांग्रेस के वोटरों ने भाजपा और सपा की झोली में वोट डाल दिया।

यूपी में जब से चुनावी आहट की शुरूआत हुई है तभी से राहुल गांधी किसी न किसी दल से समझौते की बांट जोह रहे थे, मायावती ने कांग्रेस के युवराज के मंसूबों को परवान नहीं चढ़ने दिया तो मुलायम भी कांग्रेस को लेकर सख्त रवेया अख्तियार किये हुए थे। कांग्रेस की किस्मत अच्छी थी, अगर सपा में फूट न होती तो मुलायम कांग्रेस को सपा के करीब भी भटकने नहीं देते। सपा−कांग्रेस गठबंधन पर लगे रहे कयासों की पुष्टि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद की दावेदार शीला दीक्षि‌त कर चुकी हैं। चुनाव आयोग से पक्ष में फैसला आने के बाद गठबंधन के सवाल पर अखिलेश भी कहने लगे हैं कि जल्द ही ‌इस पर फैसला हो जायेगा।

गठबंधन तो हो जायेगा, लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि इससे विरोधियों की ताकत पर कितना प्रभाव पड़ेगा। अखिलेश को समाजवादी पार्टी का नाम और सिंबल मिलने के बाद संभावना इस बात की बढ़ गई है कि सपा की लड़ाई की वजह से जो मुस्लिम वोटर बसपा की तरफ झुकाव दिखा रहे थे, उनमें बिखराव हो सकता है। इससे बसपा को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। इतना ही नहीं जो सीटें गठबंधन के तहत कांग्रेस के लिये छोड़ी जायेंगी उसमें भी सियासी समीकरण बिगड़ सकते हैं।

बात कांग्रेस की कि जाये तो यूपी में 27 साल से कांग्रेस सत्ता से दूर है और उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। संगठन में भी ताकत नहीं दिखती है। लिहाजा अब गठबंधन पार्टी की जरूरत बन गया है। गठबंधन को मजबूरी और जरूरी बताने वाले कांग्रेसी बिहार की स्थिति से यूपी की तुलना करते हैं। वह कहते हैं कि बिहार में कहने को तो हम कम ही सीटों पर जीते, लेकिन गठबंधन के सहारे ही सही उनके कुछ विधायक मंत्री तो बन गए। गठबंधन की मजबूरी गिनाते हुए कांग्रेस का थिंक टैंक कहता है कि 1989 में सत्ता से बाहर जाने के बाद कांग्रेस पहली बार 1996 में टूट गई थी। टूटने की वजह भी सत्ता की चाहत थी। विधायक जो चुनकर आए थे, उन्होंने सत्ता के लालच में कांग्रेस से अलग होकर एक नई पार्टी ही बना ली थी और सरकार के साथ हो गए थे। कांग्रेस अब दोबारा ऐसी स्थिति नहीं चाहती है।

बात 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस−बसपा गठबंधन की कि जाये तो तब समझौता होने की वजह से कांग्रेस से टिकट की मांग कर रहे काफी लोगों को बैठा दिया गया। 403 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 126 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसके 33 विधायक ही चुनकर आये थे। फिर भी दम तोड़ती कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन यह सिक्के का एक ही पहलू है। तमाम सीटों पर अच्छा उम्मीदवार होने के बाद भी गठबंधन की वजह से कांग्रेस यहां से अपना प्रत्याशी नहीं उतार सकी थी। इसका असर यह हुहा कि ऐसे विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन ठप हो गया। पार्टी टूट गई थी। सबको पता था कि सत्ता कि लिए गठबंधन किया गया। इसका असर 1996 के लोकसभा चुनाव में भी दिखा जब कांग्रेस को यूपी में पांच सीटें ही मिल पाई थीं। इसकी वजह थी कि संगठन हताशा। उम्मीदवार गठबंधन की वजह से निराश थे, अबकी बार भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नजर आ रही है।

गठबंधन से कांग्रेस के बड़े नेता तो खुश हैं लेकिन जमीन पर काम करने वाले कांग्रेसी जो चुनाव लड़ने का मन बनाये हुए थे, उनमें हताशा घर कर गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर खुद भी स्वीकारते हैं कि गठबंधन से कार्यकर्ता निराश होते हैं। बीते दिनों गुलाम नबी आजाद ने कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की थी कि टिकट तो सभी चाहते हैं, लेकिन सबको मिलता नहीं है। ऐसे में जिसको टिकट मिले उसे सब मिलाकर जिताएं। जानकारों की मानें तो कार्यकर्ता इसके बाद खुद को पार्टी का विश्वस्त नहीं बनाए रख पाते हैं। जब गठबंधन होता है उसमें सबसे ज्यादा नुकसान कार्यकर्ताओं का ही होता है। यही कार्यकर्ता पार्टी बनाता है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ बड़े नेताओं के नाम से पार्टी जानी जाती हो लेकिन पार्टी की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं।

दरअसल, 2009 के बाद से कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है। कांग्रेस के हाथ से राज्यों की सत्ता छिटक रही है। लिहाजा यूपी में सत्ता में होना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। कांग्रेस सत्ता में तो आना चाहती है। इसके अलावा एक मकसद भाजपा को यूपी की सत्ता से दूर रखना भी है। कांग्रेस की दुर्दशा के कारणों पर नजर डाली जाये तो जटिल जातीय समीकरण वाले इस सूबे में कांग्रेस के पास अपना परंपरागत वोट बैंक नहीं बचा है। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम अब कांग्रेस के वोटर नहीं रह गये हैं। पिछले 27 सालों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है और क्षेत्रीय दलों की स्थिति लगातार मजबूत हुई है। पहले मुलायम और अब अखिलेश एवं मायावती यूपी की सियासत के अहम चेहरे बन गये हैं। अब अखिलेश यादव भी उसी तर्ज पर आगे बढ़ रहे हैं। कांग्रेस भी जान रही है कि बिना गठबंधन के यूपी का किला फतेह करना मुश्किल होगा।

यूपी में 27 साल कांग्रेस बेहाल

1989 में 410 में 94 सीटें कांग्रेस जीतीं।
1991 में 413 में 46 सीटें जीतीं।
1993 में 421 में 20 सीटें ही जीतीं।
1996 में बीएसपी से गठबंधन किया 126 में 33 सीटें जीतीं।
2002 में 402 में 25 सीटें मिलीं। 
2007 में 393 में 22 सीटें मिलीं।
2012 में 355 में 28 सीटें मिलीं।

 अजय कुमार




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