सकारात्मकता के पुरोधा थे ‘ स्वामी विवेकानन्द ’ The positives were the mastermind 'Swami Vivekananda'




नरेंद्र कुमार शर्मा 
नोबल पुरस्कार के प्रथम भारतीय विजेता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का स्वामी विवेकानन्द के विषय में यह कथन ‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानन्द को पढिये उनमें सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’ वास्तव में अपने अंदर एक महापुरूष की, एक पुरोधा की, एक सच्चे आध्यात्मिक संत की एक विकास-पियासु स्वप्नदृष्टा की आत्मा का संवरण है उसके क्रिया कलापों का बीज वर्णन है। मात्र उनतालीस वर्ष के जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गये वे आने वाले लम्बे समय तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी मार्गदर्शन करते रहेंगे।
वे केवल एक संत ही नहीं थे, अपितु एक महान देशभक्त वक्ता, विचारक, समाज सुधारक, लेखक और मानव प्रेमी भी थे। विदेश यात्राओं के दौरान वहां के विकास की, प्रगति की तुलना अपने भारत से किया करते थे तो भारत को काफी पीछे देखकर भावुक हो जाते। अपनी वेदना, अपना भाव अपने पत्रों द्वारा यहां अपने शिष्यों को बराबर भेजते रहते थे। वहां से लौटकर उन्होंने आह्वान किया था- नया भारत जाग उठे अलसायी थकान से युवा शक्ति निकल पड़े। कारखाने, हाट बाजार, खेत और खलिहान से, जंगलों, झाडिय़ों तथा पर्वतों से...। और उनकी पुकार का प्रभाव भी हुआ जनता दीवानी होकर निकल पड़ी। स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी जी को जो जन समर्थन मिला वह स्वामी विवेकानन्द के आह्वान का ही परिणाम था। उनका विश्वास था कि भारत वर्ष एक पुण्य भूमि है जहां धर्म एवं दर्शन पनपते हैं। यहां बड़े-बड़े ऋषियों एवं महात्माओं ने जन्म लिया है। यहीं त्याग एवं तपस्या भी जन्मती है और केवल यहीं पर आदिकाल से अभी तक मानव मात्र के सर्वोत्तम आदर्शों एवं मोक्ष का द्वार खुला है। शिकागो में अपने भाषण में अमेरिका वासियों के लिए किया गया संबोधन ‘‘मेरे अमेरिकी भाईयों एवं बहिनों...’’ तो जन मानस के बीच अमिट बन ही गया। इसके अतिरिक्त उनके स्वभाव में जो मानव सेवा, मानव प्रेम भरा था वह भी बेजोड़ रहा है। अपनी राजस्थान यात्रा का वर्णन करते हुए एक ऐसी घटना का उन्होंने बेबाकी से वर्णन किया है। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो अपने दोषों को भी प्रकट करने का साहस कर पाते हैं अन्यथा अपने दोषों को सब ढकने का प्रयास करते हैं। स्वामी जी ने लिखा है- उस दिन मैं प्रात: जल्दी ही उठकर अपनी यात्रा शुरू कर चुका था। लगभग दोपहर में सूर्य ऊपर से आग उगल रहा था और नीचे से रेत गर्म होकर चलने में बाधा डाल रहा था। कुछ दूरी पर एक छायादार वृक्ष देखकर मैं कुछ विश्राम करने के लिए उस पेड़ के नीचे पहुंच गया। वहां बड़ी राहत महसूस हुई। वृक्ष के नीचे ही एक अन्य व्यक्ति अर्धनग्न अवस्था में विश्राम कर रहा था। वह चिलम पी रहा था। मेरा मन भी हुआ कि चिलम के दो कश लगाकर कुछ विश्रान्ति पाऊं। क्षणिक सोच विचार के बाद मैंने भी चिलम लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया...। वह व्यक्ति मेरा साधुवेश देखकर अचकचा गया और मेरे हाथ बढ़ाने के बावजूद चिलम न देकर कुछ पीछे हट गया..। मैं चकित था कि लोग पानी व चिलम तो साझा कर लेते हैं आंखों से मैंने उसे फिर संकेत किया तो वह बोला ‘‘आप तो महात्मा प्रतीत होते हैं... और मैं अछूत हूं... आपको चिलम कैसे दे सकता हूं। उसकी बात सुनकर मैंने तुरंत अपना हाथ खींच लिया और मन ही मन उसका धन्यवाद कर पुन: तेजी से अपने रास्ते पर चल पड़ा। कुछ दूर चलकर मुझे आभास हुआ कि मैंने गलती की है मेरी आत्मा धिक्कार उठी- तू कैसा साधु है...? तू कैसा महात्मा है..? लोग तुझे स्वामी क्यों कहते हैं...? भेदभाव तो तेरे मन में अभी तक है। अछूत है तो क्या मानव नहीं है! वह भी तो उसी परमात्मा की संतान है जिसने मुझे रचा है। मेरे पैर यकायक पीछे की ओर लौट गए। मैं फिर उसी वृक्ष के नीचे गया। छाया में बैठा और उस व्यक्ति से बलात चिलम लेकर कश लिए। इस घटना में स्वामी जी ने स्पष्टवादिता में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आपने ‘कर्मयोग’ में कर्म करने का बहुत प्रभावी ढंग से वर्णन किया है। क्रोधी सन्यासी, सद्गृहस्थ महिला, सद्गृहस्थ पुरूष द्वारा अपना-अपना कर्म करते रहने को, भगवद्र्शन एवं अन्य उपलब्धियों से बेहतर बताया है। इसी से उन्होंने ‘कर्मयोग’ की रचना की और लोगों का आह्वान किया कि- ‘जागो... उठो... और तब तक मत रूको जब तक सफलता न मिल जाए।’’
1. स्वामी विवेकान्नद के प्रादुर्भाव के समय भारतीय शिक्षा को विदेशियों ने अपने स्वार्थानुसार एक ऐसा चोला पहना दिया था जिससे भारतवर्ष की पीढिय़ों को अंधकार में चलने को विवश कर दिया। स्वामी विवेकानन्द उस शिक्षा प्रणाली से आहत थे। अत: उन्होंने इसके विरोध में अपना ‘शिक्षा दर्शन’ प्रस्तुत किया जिसके अनुसार-शिक्षा बालक का चहुंमुखी विकास करने का साधन होनी चाहिए। 
2. शारीरिक रूप से बलिष्ठ बनाने वाली शिक्षा होनी चाहिए।
3. शिक्षा पर बालक एवं बालिका दोनों का समान अधिकार होना चाहिए।
4. धार्मिक शिक्षा आचरण एवं संस्कारों द्वारा दी जाए न कि पुस्तकों द्वारा।
5. शिक्षक एवं छात्रों में निकटता/निजता का सम्बन्ध होना चाहिए।
6. देश की आर्थिक प्रगति हेतु तकनीकि शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए। 
7. सामाजिक एवं राष्ट्रीय शिक्षा-परिवार से प्रारम्भ होनी चाहिए।
8. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक विषयों का समावेश होना चाहिए।
9. शिक्षा गुरूगृहों (विद्यालयों/विश्व विद्यालयों) में होनी चाहिए।
10. शिक्षा सर्वसुलभ होनी चाहिए और इसका प्रचार-प्रसार भी होना चाहिए।
प्रतिवर्ष 12 जनवरी अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस को स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन मनाया जाता है। उनके सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। सभी तंत्र उनके नियमों को लागू करने में अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं और आज हो रही प्रगति किन्हीं अर्थों में स्वामी विवेकानंद की देन भी कही जा सकती है। 

- नरेंद्र कुमार शर्मा 
राष्ट्र पुरस्कृत शिक्षक




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